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    धर्म ज्योति-1

    धर्म ज्योति-1
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    इस समय नैतिकता के सिद्धांतों व मानकों को हर समय से अधिक भौतिक हितों और स्वतंत्रता, मानवता प्रेम, न्याय एवं मानवाधिकार जैसे विषयों की भेंट चढ़ाया जा रहा है। आज हम एक ऐसे समय में जीवन बिता रहे हैं जिसमें नैतिक बुराइयां और परिवारों का विघटन न केवल पश्चिमी समाजों या तथाकथित सभ्य समाजों को अपनी चपेट में ले चुके हैं बल्कि अन्य देशों व समाजों पर शिकंजा कसते जा रहे हैं। पश्चिम में नैतिक व मानसिक संकट इतने जटिल हो चुके हैं कि उन्होंने घर एवं परिवार की व्यस्था को चरमरा दिया है और इनके कारण अपने समान मनुष्यों से दूरी, तटस्थता और निष्ठुरता की भावनाएं जन्म ले रही हैं। नैतिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता इस लिए है कि आज मनुष्य जिन समस्याओं में ग्रस्त है उनमें से अधिकांश, मानव प्रतिष्ठा को भुला देने के कारण अस्तित्व में आई हैं। इस समय आध्यात्मिक मान्यताएं, भौतिक हितों की प्राप्ति की विध्वंसक लहरों का शिकार हो चुकी हैं और यदि इन विध्वंसक लहरों को नियंत्रित न किया गया तो मनुष्य को वर्तमान समस्याओं से अधिक जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। इस प्रकार की परिस्थिति व समय में मनुष्य की मुक्ति का मार्ग, धार्मिक व नैतिक व शिक्षाओं की ओर उन्मुख होना है। यही कारण है कि ईश्वर के अंतिम पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने ईश्वर के ओर से स्वयं को पैग़म्बर बना कर भेजे जाने का लक्ष्य नैतिक मूल्यों को उनकी चरम सीमा तक पहुंचाना बताया था और उन्होंने नैतिक मूल्यों व शिष्टाचार के प्रचलन के लिए व्यवहारिक रूप से अथक प्रयास किए।

     

    पश्चिम में नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्यों की गिरावट के बारे में विभिन्न कारणों की ओर संकेत किया जा सकता है। इनमें से एक कारण, पुनर्जागरण के काल के बाद ह्यूमनिज़्म या मानववाद की विचारधारा का प्रचलन है। ह्यूमनिज़्म का अर्थ होता है मनुष्य को ध्रुव मानने वाली व्यवस्था। पश्चिम वालों ने मनुष्य को चर्च की कड़ी धार्मिक शिक्षाओं से मुक्ति दिलाने तथा चर्च की अभिभावकता से बचने के उद्देश्य से ह्यूमनिज़्म की विचारधारा में शरण ली। यह मत तेरहवीं शताब्दी के अंत में दक्षिणी इटली में सामने आया। आरंभ में यह मत एक साहित्यिक आंदोलन के रूप में उभरा और कुछ ही समय बाद इसने राजनैतिक व वैचारिक रूप धारण कर लिया और इटली के बाद फ़्रान्स, स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों तक में अपना प्रभाव जमा लिया। इस मत के समर्थकों ने मुनष्य को इर प्रकार के प्रतिबंधों से मुक्त कराने और उसे केवल अपने आप पर ध्यान देने हेतु प्रेरित करने के उद्देश्य से इस मत का आधार रखा। चर्च के धर्मगुरुओं की वैचारिक जड़ता और अतिवाद के कारण कुछ लोगों धार्मिक शिक्षाओं को नकार कर, मानव बुद्धि को ही सब कुछ मान बैठे और उन्होंने मनुष्य को धार्मिक व ईसाई विचारों व आस्थाओं से अलग कर दिया। उन्होंने मनुष्य को इस सीमा तक ऊपर उठाया कि उसकी बंदगी की विशेषता को भी समाप्त कर दिया। ह्यूमनिज़्म के अनुसार मनुष्य ही सभी तथ्यों व मान्यताओं का आधार व ध्रुव है। वह एक ऐसा जीव है जो अपने अतिरिक्त किसी भी अन्य को उत्तरदायी नहीं है। उसे इस बात का अधिकार प्राप्त है कि वह अपने हितों की प्राप्ति के लिए हर वस्तु से जिस प्रकार चाहे लाभ उठाए। ह्यूमनिज़्म अपने वास्तविक अर्थ में ईश्वर को ध्रुव मानने की आस्था के मुक़ाबले में मनुष्य को ध्रुव मानने की आस्था है।

     

    ह्यूमनिज़्म के मत में मनुष्य को सृष्टि की एकमात्र वास्तविकता माना जाता है और उसे ईश्वर के स्थान पर बिठा दिया जाता है। यह मत आसमानी धर्मों और ईश्वरीय संदेश वहि जैसी हर प्रकार की आध्यात्मिक आस्थाओं एवं विचार को नकार देता है और मनुष्य को प्रकृति का एकमात्र शासक समझता है। ह्यूमनिज़्म के मत में मनुष्य की पहचान का सबसे महत्पूर्ण आधार यह है कि मनुष्य की बुद्धि, ईश्वर व उसके धर्म का स्थान ले लेती है और अध्यात्म को जीवन के मुख्य मंच से पर्दे के पीछे भेज दिया जाता है। ह्यूमनिज़्म के मत में मनुष्य के गंतव्य को उसके भौतिक तथा जीवन के परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाता है। इस विचारधारा में जीवन का लक्ष्य, हर संभव मार्ग से प्राकृतिक अनुकंपाओं से अधिक से अधिक लाभ व आनंद उठाना है। ह्यूमनिज़्म की विचारधारा में लोगों के व्यक्तित्व की उपयोगिता व क्षमता, ईश्वर पर ईमान के बिना ही अस्तित्व में आती है तथा धर्म, मनुष्य की इच्छाओं की पूर्ति का साधन होता है।

     

    फ़्रान्स के प्रख्यात अध्ययनकर्ता रेने गीनूं ने अपनी किताब आधुनिक संसार के संकट में इस संबंध में लिखा है। पुनर्जागरण के काल में एक शब्द सम्मान का पात्र बना और उसे साख प्राप्त हुई। वह शब्द, ह्यूमनिज़्म है अर्थात वह विचारधारा जो मनुष्य को हर बात के मूल्य का मानक समझती है। वस्तुतः इस शब्द का तात्पर्य यह था कि हर वस्तु को केवल मानवीय मानकों में सीमित कर दिया जाए। दूसरे शब्दों में लक्ष्य यह था कि धरती पर वर्चस्व के बहाने आकाश से मुंह मोड़ लिया जाए। वे इसी किताब में एक अन्य स्थान पर लिखते हैं कि जिस बात को पुनर्जागरण का नाम दिया गया है वस्तुतः वह बहुत सी वस्तुओं की मृत्यु थी।

     

    पश्चिमी मनुष्य ने ह्यूमनिज़्म की विचारधारा को स्वीकार करके एक ऐसे संसार की आधार शिला रखी जो कुछ सकारात्मक परिवर्तनों की अनदेखी करते हुए विध्वंसक प्रभावों के साथ ही नैतिक, शिष्टाचारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व मानसिक संकटों से भरा पड़ा है। यह बात किसी से भी छिपी हुई नहीं है कि मनुष्य, ह्यूमनिज़्म के विचारों व विचारधारा के कारण नैतिक पथभ्रष्टता व आध्यात्मिक पतन का शिकार हो गया है। इस पतन ने बहुत से पढ़े लिखे लोगों और तथाकथित बुद्धिजीवियों को भी अपनी चपेट में ले लिया है। आजकल पश्चिम के बहुत से विश्वविद्यालयों, शिक्षा केंद्रों, संचार माध्यमों और प्रचार तंत्रों में पतन का दायरा ईश्वर, प्रलय, पैग़म्बरों, अध्यात्म व नैतिकता के इन्कार से आगे बढ़ कर समलैंगिकों के विवाह तथा इसी प्रकार अन्य घृणित कार्यों को क़ानूनी मान्यता प्रदान किए जाने तक बढ़ चुका है।

     

    ईरान के प्रख्यात विद्वान महमूद हकीमी, पश्चिम रोगी है, शीर्षक के अंतर्गत अपने एक लेख में लिखते हैं। आध्यात्मिक आयामों पर ध्यान दिए बिना तकनीक व उद्योग की प्रगति ने पूरब व पश्चिम को अनेक कठिनाइयों में ग्रस्त कर दिया है। यह सब पश्चिम में मनुष्य पर मशीनवाद के नियंत्रण तथा नैतिक इकाइयों के कमज़ोर पड़ने का परिणाम है। कहने का मतलब यह है कि हम एक ऐसी शताब्दी में जीवन बिता रहे हैं जिसमें मशीनों की विशिष्टताओं की तुलना में मनुष्य की विशेषताओं को तनिक भी महत्व नहीं दिया जाता। मनुष्य को उत्पादन की बड़ी बड़ी मशीनों में एक महत्वहीन पेंच की भांति समझा जाता है। निश्चित रूप से मनुष्य के बारे में इस प्रकार की सोच और उसके इतने अधिक मानवीय व नैतिक गुणों की अनदेखी से मानवता को ऐसे नुक़सान पहुंचे हैं जिनकी क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती और यदि यह स्थिति इसी प्रकार जारी रही तो निश्चित रूप से मानवता पतन के गर्त में पहुंच कर पूर्ण रूप से तबाह हो जाएगी।

     

    हकीमी अपने लेख में आगे चलकर एक अमरीकी पत्रिका के हवाले से लिखते हैं कि इस पत्रिका ने अमरीका में निरंकुशता एवं उच्छृंखलता के प्रचलन का कारण बनने वाले कारकों का इस प्रकार उल्लेख किया है। शैतानी कारकों ने हमारे संसार को घेर लिया है। निरंकुश एवं अश्लील बातों की, जो द्वीतीय विश्व युद्ध के बाद आश्चर्यजनक तीव्रता के साथ प्रचलित हुई हैं, अश्लीलता में वृद्धि हुई है। फ़िल्मों के कारण लोगों में काम वासना को बढ़ गई है और महिलाओं में नैतिक पतन, उनके अंग प्रदर्शन और निरंकुश संबंधों के रूप में सामने आया है। ये बुराइयां हमारे बीच बढ़ती ही जा रही है और इसका अंत निश्चित रूप से ईसाई समाज व सभ्यता की तबाही के रूप में सामने आएगा। अतः यदि हमने बुराइयों के इस तूफ़ान को नहीं रोका हमारा इतिहास भी रोम और उसके बाद की जातियों के इतिहास जैसा ही होगा जो अपनी काम वासनाओं और आंतरिक इच्छाओं की निरंकुश पूर्ति के कारण नाच गाने और शराब व शबाब में डूब गई थीं और उनका नामो निशान तक नहीं है।

     

    वास्तविकता यह है कि पश्चिम अपनी बेजोड़ प्रगति के नशे में एक महत्वपूर्ण तथ्य की ओर से निश्चेत रह गया है और वह यह है कि विज्ञान, तकनीक व उद्योग के क्षेत्र में होने वाली इस प्रगति और इसी प्रकार अपने यथासंभव महत्व के बावजूद इन सारी मशीनों को साधन ही समझा जाना चाहिए। ये सभी साधन मनुष्य की सेवा, उसकी प्रगति व उत्थान तथा उसके भीतर नैतिकता के उच्च मूल्यों को व्यवहारिक बनाने के लिए हैं किंतु हम देख रहे हैं कि मनुष्य की आत्मा को एक साधन एवं मशीन की भांति वर्चस्ववाद एवं हितप्रेम की सेवा के लिए दास बना लिया गया है। इस बात की पुष्टि करते हुए पश्चिम के एक बुद्धि जीवी राबर्ट हेचिन्स कहते हैं।

     

    यद्यपि भौतिक विज्ञान व तकनीक ने प्रगति की है और मनुष्य भौतिक मामलों में शिखर पर पहुंच गया है किंतु दुर्भाग्य से वह अध्यात्म में पतन के मार्ग पर अग्रसर है और दिन प्रति दिन अधिक पतन की ओर बढ़ रहा है। जिस समाज में केवल प्रगतिवाद की दृष्टि से जीवन को देखा जाता है यदि उसमें मनुष्यों को उत्पादन का माध्यम व साधन समझा जाए तो कोई अचरज नहीं है। इसी प्रकार जर्मनी के समाजशास्त्री व मनोचिकित्सक एरिक फ़्रोम इस संबंध में कहते हैं कि पश्चिम विशेष कर अमरीका में हम मनुष्य की सही पहचान खो चुके हैं क्योंकि वस्तुतःऔद्योगिक समाज में लोग, वस्तु में परिवर्तित हो चुके हैं और वस्तु की अपनी कोई पहचान नहीं होती। पश्चिमी सभ्यता ऐसे मार्ग पर चल पड़ी है जिसमें भौतिकता अर्थात निर्जीव वस्तुओं से प्रेम प्रचलित हो चुका है और इसके परिणाम स्वरूप मानव जीवन और उसके महत्व के प्रति एक प्रकार की अरुचि एवं उपेक्षा अस्तित्व में आ चुकी है।