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    धर्म ज्योति-3

    धर्म ज्योति-3
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    इस्लाम की नैतिक व्यवस्था, एकेश्वरवाद के दृष्टिकोण पर आधारित है। इस अर्थ में कि यह संसार एक तत्वदर्शितापूर्ण इरादे से अस्तित्व में आया है और सृष्टि की व्यवस्था दया, भलाई और सभी अस्तित्वों को उनकी योग्य परिपूर्णता तक पहुंचाने पर आधारित है। यदि नैतिक प्रशिक्षण और उसके सिद्धांत धर्म व धार्मिक आस्थाओं पर आधारित हों तो प्रशिक्षण संबंधित सभी गतिविधियों की पहली कड़ी और स्रोत ईश्वर होगा। यह बात मानव जीवन के मार्ग को पूर्ण रूप से परिवर्तित कर देती है। इस्लाम की नैतिक व्यवस्था में मनुष्य, संसार को ईश्वर की दया का प्रतीक समझता है। वह सृष्टि की अनुकंपाओं को, ईश्वर द्वारा निर्धारित लक्ष्य तक पहुंचने हेतु अपने लिए साधन मानता है। यह बात कि मनुष्य, संसार के अस्तित्वों के बीच एक चयनित अस्तित्व है और उसके इस चयन के पीछे एक लक्ष्य निहित है, मनुष्य के भीतर एक प्रकार का प्रशिक्षणिक प्रभाव डालती है और उसे आशावान बनाती है।

    इस्लाम धर्म की दृष्टि में नैतिकता का जो स्रोत है वह अन्य मतों व मानवीय दृष्टिकोणों की नैतिक व्यवस्था के स्रोतों से बहुत भिन्न है। इस्लामी विचारधारा में भलाई व बुराई, समाज के ढांचे की स्थापना के लिए केवल एक सामाजिक समझौता नहीं है। यदि इस्लाम में घमंड, द्वेष, ईर्ष्या, झूठ व इसी प्रकार की अन्य बुराइयां निंदनीय व वर्जित बताई गई हैं तो यह केवल इस लिए नहीं है कि इनसे मानव समाज पर नकारात्मक व बुरे प्रभाव पड़ते हैं तथा दूसरों को इनसे यातना होती है बल्कि इसका एक अन्य उद्देश्य यह है कि मनुष्य का पवित्र हृदय इन नैतिक अवगुणों से अंधकारमय होने लगता है और उसकी अंतरात्मा, ईश्वरीय प्रवृत्ति से दूर होकर शैतान की ओर उन्मुख होने लगती है।

    इस्लामी विचारधारा में मानवीय भावनाओं को केवल सुख भोग और आनंदों की प्राप्ति के लिए सीमित समझना और मनुष्य के उच्च रुझानों की अनदेखी करना, उसके वास्तविक मानवीय प्रवृत्ति से विचलित होने के अर्थ में है। इस्लाम, मनुष्य के स्वाभाविक रुझानों व भावनाओं को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करने के साथ ही इस विचार का विरोध करता है कि मनुष्य का अंतिम ध्येय और उसकी वांछित परिपूर्णता, उसका व्यक्तिगत लाभ, सुखभोग या आनंद उठाना है। इस्लाम की दृष्टि में मनुष्य की वांछित परिपूर्णता, ईश्वर का सामिप्य है जिसकी प्राप्ति उसकी भीतरी क्षमताओं और उसके अस्तित्व में पाए जाने वाले शून्यों के भर जाने से संभव है। ईश्वर के सामिप्य को ध्येय बनाने का परिणाम यह है कि मनुष्य अपने व्यवहार और कर्म में ईश्वरीय आदेशों को दृष्टिगत रखे और आध्यात्मिक पारितोषिक प्राप्त करे। इस्लाम लोगों से जिस बात का इच्छुक है वह अनुकंपाओं को छोड़ना नहीं बल्कि उनका सही ढंग से उपयोग करना है। इस्लाम हम से यह नहीं कहता कि हम अनुकंपाओं से लाभ न उठाएं या अपनी स्वाभाविक इच्छाओं की ओर ध्यान न दें बल्कि इस्लाम का आदेश यह है कि इन अनुकंपाओं से एकपक्षीय व ग़ैर ज़िम्मेदाराना ढंग से लाभान्वित न हों।

    जीवन में नैतिकता का महत्व इस दृष्टि से है कि कभी मनुष्य के भीतर उद्दंड आंतरिक इच्छाएं इतनी सशक्त होती हैं कि हर क्षण मनुष्य को अपने पालन के लिए प्रेरित करती रहती हैं और सदैव उसके विचारों को अपने अधीन बनाए रखती हैं। ऐसे समय में नैतिक सिद्धांत मनुष्य की सहायता करते हैं और ख़तरे की घंटी के रूप में काम करते हैं। अलबत्ता इन सिद्धांतों एक अत्यंत शक्तिशाली आधार व सहारा है जिसे ईश्वर पर ईमान कहा जाता है क्योंकि केवल ईश्वर पर ईमान ही मनुष्य के अस्तित्व के कण-कण में समा कर उसे अपने नियंत्रण में ले सकता है। इस आधार पर नैतिक गुणों व परिपूर्णताओं को उसी समय विश्वस्त सहारा मिलता है जब वे ईश्वर पर ईमान के साथ जुड़ी हुई हों।

    मूल रूप से नैतिकता, मनुष्य की आंतरिक इच्छाओं को नियंत्रित करने का एक परिप्रेक्ष्य है, नैतिक अच्छाइयां और बुराइयां मनुष्य के विचार व कर्म को नियंत्रित करती हैं ताकि उसकी आत्मा स्वतंत्र हो सके। कहा जा सकता है कि मनुष्य के जीवन में धर्म की एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपयोगिता उसे, उच्च स्वाभाविक इच्छाओं की ओर आगे बढ़ाना है। यही कारण है कि धर्म जिस नैतिक व्यवस्था का रेखांकन करता है उसे स्वतंत्रता की राह में बाधा नहीं समझना चाहिए बल्कि यह व्यवस्था, भौतिक रिश्तों की ज़ंजीरों से मनुष्य की मुक्ति की चाबी की भांति है।

    ईश्वर, मनुष्य की वास्तविक एवं अंतिम परिपूर्णता तक पहुंचने का मार्ग, उसके द्वारा स्वेच्छा और अपने चयन से किए गए सद्कर्मों को बताता है। इसी कारण हर वह कर्म इस्लाम की दृष्टि में वांछित एवं भला है जो मनुष्य के कल्याण को सुनिश्चित बनाए और इसी प्रकार हर वह काम बुरा व नैतिक अवगुण समझा जाता है जो मनुष्य को इस लक्ष्य से दूर कर दे। क़ुरआने मजीद के सूरए नहल की आयत क्रमांक 97 में ईश्वर कहता है। जो कोई ईश्वर पर ईमान रखता हो, चाहे वह पुरुष हो अथवा स्त्री, और भले कर्म करे तो निश्चित रूप से हम उसे पवित्र व प्रिय जीवन के साथ जीवित रखेंगे और उन्होंने जो भले कर्म किए हैं उन्हें उससे अच्छा पारितोषिक प्रदान करेंगे।

    इस आयत के अनुसार पवित्र जीवन, सही जीवन शैली अपनाने और भले कर्म करने का परिणाम है जिसका लोक-परलोक में मनुष्य को लाभ मिलता है। दूसरे शब्दों में भला कर्म इसी संसार में भी व्यक्ति को कल्याण तक पहुंचाता है। समाज में नैतिक सिद्धांतों के पालन का इतना महत्व है कि न केवल इससे न केवल सामाजिक संबंधों को बेहतर बनाने में सहायता मिलती है बल्कि यह मनुष्य के शरीर व मानस के स्वास्थ्य को भी सुनिश्चित बनाता है। हम सब जानते हैं कि बहुत से रोगों का स्रोत मानस से होता है। इस प्रकार के रोग, आयु को कम और मृत्यु को निकट कर देते हैं किंतु नैतिक गुणों का पालन और शिष्टाचार, मानसिक रोगों को समाप्त कर देता है और परिणाम स्वरूप शरीर स्वस्थ व प्रफुल्लित रहता है तथा मनुष्य की आयु में वृद्धि होती है। यही कारण है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम कहते हैं, सद्कर्म व शिष्टाचार, घरों को आबाद और आयु में वृद्धि करता है।

    हर व्यक्ति के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन में नैतिक गुणों के पालन की भूमिका, एक चमकते हुए सूर्य की भांति है जो व्यक्ति व समाज को प्रफुल्लता प्रदान करता है और सच्चाई, निष्ठा, प्रेम और बंधुत्व का प्रसार करता है ताकि सभी लोग अपनाइयत के वातावरण में जीवन बिता सकें। प्रेम की छाया में एकता व सामाजिक संबंध अधिक सुदृढ़ होते हैं और सामाजिक रिश्तों की मज़बूती से समाज के सभी सदस्य एक दूसरे के सहयोग से अपने आस-पास के वातावरण को आबाद करने का प्रयास करते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि शिष्टाचार, ईश्वर तथा उसके बंदों के प्रेम को आकृष्ट करता है और सहनशीलता व पौरुष का कारण बनता है। हर नैतिक कर्म, नैतिक सोच, नैतिक ज्ञान और नैतिक प्रयास का परिणाम होता है। यदि इनमें से कोई एक भी न हो तो नैतिक प्रशिक्षण पूरा नहीं होता। अनेकेश्वरवादी विचार व आस्थाएं, ईश्वरीय आदेशों व क़ानूनों से अनभिज्ञता, व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन के स्पष्ट क्षितिज का न होना, पाश्विक भावनाओं, पद, धन व सत्ता के प्रेम, क्रोध और वासना का वर्चस्व, मनुष्य के भीतर नैतिक प्रगति के मार्ग की सबसे बड़ी रुकावटें हैं। अपने जीवन के आरंभ व अंत की ओर से निश्चेतना और इसी प्रकार ईश्वर के प्रिय बंदों की शिक्षाओं से अनभिज्ञता भी नैतिक प्रगति के मार्ग की बाधाओं में से है। कभी कभी कमज़ोर इच्छा शक्ति और निर्णय लेने की क्षमता का अभाव भी मनुष्य द्वारा नैतिक शिक्षाओं के पालन के मार्ग में बाधा बनता है।