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    धर्म ज्योति-6

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    नैतिक आचरण के बारे में बात करने से पहले स्वस्थ मनुष्य के रूप में धर्म में गहरी आस्था रखने वाले मनुष्य के विचारों एवं अनुभूतियों के बारे में विवरण पेश करना ज़रूरी लगता है। इसलिए कि नैतिक सकारात्मक आचरण एवं व्यवहार की उत्पत्ति मनुष्य के विश्वास और उसकी मनोवृत्ति की ही उपज है। अतः हमने पिछली कड़ियों में उल्लेख किया था कि दृढ़ आस्था रखने वाला व्यक्ति ब्रह्माण्ड के प्रति आशावादी सोच रखता है तथा यह सकारात्मक सोच ख़ुद अनेक सकारात्मक अनुभूतियों और परिणामस्वरूप जीवन में सकारात्मक व्यवहार का स्रोत है। उदाहरणस्वरूप आस्था रखने वाला व्यक्ति मानसिक एवं आत्मिक शांति से संपन्न होता है। इस सुख व शांति से मनुष्य के जीवन के समस्त आयाम प्रभावित हो सकते हैं। इस लिए हमने ज़रूरी समझा कि नैतिक विषयों के बारे में बात करने से पहले आस्था रखने वाले व्यक्ति के विचारों एवं अनुभूतियों के बारे में कि जो उसके भीतर सकारात्मक व्यवहार के लिए भूमि प्रशस्त करती हैं समीक्षा करें।

     

    सुरक्षा का एहसास मानसिक भावना है और मनुष्य उसे प्राप्त करने तथा मानसिक विकृति से बचने के लिए अथक प्रयास करता है। क़ुराने मजीद की दृष्टि में नैतिकता के चिन्हों में से एक सुख एवं शांति का एहसास है। सूरए अनआम की 82वीं आयत में ईश्वर कहता है कि जिन लोगों ने दृढ़ विश्वास रखा और अपने विश्वास को बहुईश्वरवाद एवं अत्याचार से दूषित नहीं किया, वे सुरक्षित हैं तथा उन्हें उनका मार्ग मिल गया है। उक्त आयत और अन्य आयतों में सुरक्षा व शांति को दृढ़ विश्वास का परिणाम बताया गया है। सूरए नूर की 55वीं आयत में भी ईश्वर ने सुख व शांति को दृढ़ विश्वास एवं पुण्य का परिणाम क़रार दिया है।

    जैसा कि हमने उल्लेख किया कि क़ुरान में मन की शांति को नैतिक आचरण करने वाले मनुष्यों की विशेषता क़रार दिया गया है। क़ुराने मजीद में दो शब्द इतमिनान अर्थात निश्चिंतता एवं सकीना अर्थात सुकून इस विशेषता को परिभाषित करते हैं। सूरए फ़तह की चौथी आयत में उल्लेख है किः वह है कि जिसने निष्ठावान व्यक्तियों के हृदयों पर शांति अवतरित की ताकि उनकी आस्था में और वृद्धि हो। सकीना ऐसा सुकून है कि जो मनुष्य से हर प्रकार के भय, संदेह और विफलता को दूर कर देता है। ईश्वर ने इस अनुकंपा को कि जो नैतिक विशेषता है निष्ठावान व्यक्तियों से विशेष क़रार दिया है तथा इसी सुकून को आस्था के उच्च चरणों की प्राप्ति हेतु भूमि प्रशस्त करने में प्रभावी मानता है। इससे तात्पर्य यह है कि नैतिक व्यवहार में वृद्धि से मनुष्य के सुकून में भी वृद्धि होत है। यद्यपि इसका मतलब यह नहीं है कि निष्ठावान व्यक्ति को किसी प्रकार की कोई चिन्ता नहीं होती, बल्कि वह केवल भौतिक कारणों से उत्पन्न होने वाली घातक चिंताओं से दूर है। निष्ठावान व्यक्ति कि जो सत्य के मार्ग पर चलता है तथा ईश्वर की कृपा और सहायता को अपने साथ पाता है, जीवन की समस्याओं एवं जटिल घटनाक्रमों और उनके दबाव के मुक़ाबले में डटे रहने हेतु अधिक शक्तिशाली होता है। ईश्वरीय असीम शक्ति एवं अंततः सब कुछ ठीक हो जाने के विश्वास से वह अपने अन्दर शांति के लिए भूमि प्रशस्त करत है। वास्तव में जो वस्तु निष्ठावान व्यक्तियों की मूल चिंता का कारण होती है वह परलोक में उनका भाग्य है कि जो सदैव एवं हमेशा रहेगा। यही कारण है कि निष्ठावान लोग भौतिक कठिनाइयों से उत्पन्न होने वाले दुखों एवं पीड़ा की परवाह नहीं करते बल्कि वे परलोक में एक अच्छे जीवन की कामना के लिए अच्छे कर्म करने की चिंता में रहते हैं।

    यह सकारात्मक परिणाम ईश्वर के स्मरण से मनुष्य में उत्पन्न होते हैं। यही कारण है कि क़ुराने मजीद में ईश्वर के स्मरण से मूंह फेर लेने के परिणामों की ओर संकेत किया गया है और इसे जीवन में कठिनाइयों का कारण क़रार दिया गया है। क़ुरान के महान व्याख्याकर्ता अल्लामा तबातबाई इस संदर्भ में लिखते हैं कि जिसने ईश्वर को भुला दिया और उसका स्मरण छोड़ दिया, उसके पास दुनिया का हाथ थामने और उससे प्रेम करने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचता। परिणाम स्वरूप भौतिक जीवन एवं उसके विस्तार और उससे लाभ उठाने में व्यस्त हो जाता है। दूसरी ओर भौतिक सुविधाएँ कितनी ही कम या कितनी ही ज़्यादा क्यों न हों, मनुष्य की आत्मित ज़रूरतों की पूर्ति नहीं कर सकतीं। इसलिए कि जो मात्रा भी उसने प्राप्त की है उससे वह संतुष्ट नहीं होता और वह उससे अधिक प्राप्ति के मोह में पड़ा रहता है। यह लालच कम नहीं होता है। परिणामस्वरूप ऐसा व्यक्ति हमेशा परेशान और निराश रहता है तथा मौत एवं रोग जैसी घटनाओं से भयभीत रहता है। अगर यह व्यक्ति ईश्वर को याद करता तथा उसे नहीं भूलता तो निःसंदेह वह जानता कि अनन्त जीवन एवं ऐसा जगत कि जिसका कभी पतन नहीं होगा तथा असीम सम्मान एवं प्रसन्नता उसकी प्रतीक्षा में है और लोक परलोक के मुक़ाबले में व्यर्थ वस्तु के अलावा कुछ नहीं है। परिणामस्वरूप इस जगत में जो कुछ सुविधाएं उसे प्राप्त होतीं वह उनसे संतुष्ट हो जाता तथा जीवन उस पर बोझ नहीं बनता।

    स्वस्थ मनुष्य में पाए जाने वाले अन्य नैतिक चिन्हों में से एक आतंरिक प्रसन्नता एवं ख़ुशी है। निष्ठावान व्यक्ति निराशा एवं विनाशकारी दुख व पीड़ा से सुरक्षित रहता है। ख़ुशी का अर्थ है प्रसन्नता एवं उत्साह से भरपूर। यह अवस्था अस्वस्थता, आलस एवं सुस्ती के विपरीत है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) निष्ठावान व्यक्ति की इस विशेषता के बारे में कहते हैं कि निष्ठावान व्यक्ति मार्गदर्शन के मार्ग में प्रसन्न एवं उत्साहपूर्ण होता है। इस पवित्र कथन से यह परिणाम निकाला जाता है कि नैतिक व्यक्ति सक्रिय एवं प्रयासरत तथा इसके मुक़ाबले में अनैतिक व्यक्ति उत्साहहीन होता है। आत्मिक प्रसन्नता के मुक़ाबले में निराशा होती है। निराशा एक ऐसी अवस्था है कि जो गहरे दुख एवं पीड़ा के कारण उत्नन्न होती है। यह अवस्था शारीरिक ऊर्जा एवं गतिविधि को कम कर देती है तथा बेहद थकन का कारण बनती है। इस्लामी ग्रंथों में निराशा को एक मानसिक रोग क़रार दिया गया है। निराशा के भयानक रूप लेने में महत्वपूर्ण कारण मनुष्य के सोचने का ढंग है। स्वयं, दूसरों ईश्वर तथा भविष्य के प्रति नकारात्मक सोच, सकारात्मक तथ्यों की उपेक्षा, अंधविश्वास एवं ख़ुद को कोसना सब के सब निराशा बढ़ाने में प्रभावी होते हैं। इसी कारण इस्लामी ग्रंथों में ज्ञान को सुधारने तथा बौद्धिक विश्वासों पर बल दिया गया है। निश्चित रूप से निराश व्यक्ति की सोच में परिवर्तन से उसके अटपटे व्यवहार, भावना एवं एहसास में भी बदलाव आता है।

    निराशा के उपचार के लिए एक प्रभावी तरीक़ा मनुष्य के हृदय में आशा की ज्योति जगाना है। आशा व्यक्ति के नैतिक लक्षणों में से है तथा यह उसकी प्रसन्नता, सक्रियता एवं प्रोत्साहन का कारण बन सकती है। यद्यपि हर वस्तु से आशा लगाना नैतिकता नहीं है। इसलिए कि झूठी आशाएं एवं व्यर्थ चीज़ों की उम्मीद मनुष्य के मनोरोग में वृद्धि का कारण बनती हैं। यदि धार्मिक शिक्षाओं पर न्यायपूर्ण दृष्टि डालेंगे तो हमें स्वीकार करना होगा कि समस्त ईश्वरीय शिक्षाएं, मनुष्य को भविष्य के प्रति आशा के साथ एक सार्थक जीवन की ओर मार्गदर्शित करती हैं। धार्मिक शिक्षाओं में जिसे आंतरिक सुख व शांति का मूल आधार ठहराया गया है वह यह है कि मनुष्य को ईश्वर की कृपा से निराश नहीं होना चाहिए। इसलिए की निराशा अधिकांश मानसिक एवं आत्मिक समस्याओं की जड़ है।

    प्रलय के प्रति आशा, ईश्वरीय कृपा एवं अनुकंपा के प्रति आशा तथा ईश्वर द्वारा क्षमा एवं दया की आशा ऐसा तथ्य है कि जो मनुष्य को मुक्ति एवं उत्कृष्टता की ओर ले जाता है तथा उसे शक्तिमान, सक्रिय एवं ख़ुशहाल बनाता है। इसके विपरीत, ईश्वर की दया से निराशा अनैतिक मनुष्यों की विशेषता है कि जो बहुत बड़ा पाप माना जाता है।

    इस लिए नैतिकता की दृष्टि से स्वस्थ मनुष्य विशेष प्रकार के सुख व शांति का स्वामी होता है तथा उसके चेहरे पर दुख और पीड़ा कम ही देखने में आती है। भविष्य के बारे में उसे कोई भय और डर नहीं होता। कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपना आपा और अपनी सुध नहीं खोता। सावधान एवं तार्किक रहता है और जो कुछ मिल जाता है उस पर संतुष्ट रहता है। सकारात्मक सोच रखने वाले मनुष्य व्यवस्थित और नियमित होते हैं तथा पूरे उत्साह एवं भरपूर ऊर्जा से कर्म करते हैं। यह समस्त ईश्वर पर दृढ़ विश्वास एवं जीवन में आशावादी दृष्टिकोण के परिणाम हैं कि जो धार्मिक विश्वासों की छाया में निष्ठावान मनुष्यों के व्यवहार एवं विचारों में प्रकट होते हैं।