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    नमाज़ी के लिबास की शर्तें

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    1. पाक हो।
    2. ग़स्बी न हो (छीना, हथियाया हुआ न हो)
    3. मुरदार (मृत शरीर के भाग) के अजज़ा का बना न हो।
    4. ऐसे जानवर (पशु) का न हो जिसका गोश्त हराम है।
    5. सोने का न हो।
    6. शुद्ध रेशमी न हो।
    पाँचवीं एवंम छटी शर्त पुरुषों से विशेष है, महिलाओं के लिए नहीं।
    1. लिबास पाक होः
    मसअला 403 नमाज़ में शर्त है कि नमाज़ी का लिबास पाक हो।
    मसअला 404 जो आदमी न जानता हो, नजिस शरीर एवंम लिबास में नमाज़ बातिल है और उस नजिस शरीर या लिबास में नमाज़ पढ़ ले तो उसकी नमाज़ बातिल है। अगर उसकी जेहालत (न जानना) कोताही (लापरवाही) के कारण हो।
    मसअला 405 जो आदमी नजिस शरीर एवंम लिबास में नमाज़ पढ़े और नजासत का पता न हो और नमाज़ के बाद नजासत का पता चले तो उसकी नमाज़ सही है। हाँ अगर पहले से नजासत का ज्ञान हो और भूल जाए फिर उसमें नमाज़ पढ़ ले तो उसकी नमाज़ बातिल है।
    मसअला 406 नमाज़ी को नमाज़ पढ़ते समय शरीर या लिबास के नजिस होने का पता चले तो अगर नमाज़ के टूटे बिना या ऐसा काम किए बिना जो नमाज़ में नहीं करना चाहिए उस नजासत का ख़त्म करना सम्भव हो तो वाजिब है कि ऐसा करे और नमाज़ को समाप्त करे। परन्तु अगर ऐसा करना (नमाज़ की वास्तविक्ता का बचा कर नजासत ख़त्म करना) असम्भव हो एवंम समय भी व्यापक रूप से हो तो वाजिब है कि नमाज़ को तोड़ दे और पाक शरीर एवंम लिबास से नमाज़ दोबारा पढ़े।
    मसअला 407 अगर नजिस लिबास को धुले और उसकी तहारत का विश्वास हो और उसमें नमाज़ पढ़े लेकिन नमाज़ के बाद पता चले कि लिबास पाक नहीं हुआ था तो उसकी नमाज़ सही है लेकिन बाद की नमाज़ों के लिए लिबास का पाक करना वाजिब है।
    मसअला 408 वह लिबास जिसका नजिस होना संदेह जनक हो उसपर तहारत का हुक्ल लागू होगा, और उसमें नमाज़ सही होगी, इसलिए ऐसे ख़ुश्बूदार लिबास में नमाज़ पढ़ना जिन पर लगे हुए इत्र में अल्कोहल (स्प्रिट) मिला हो और इत्र के नजिस होने क विश्वास न हो तो नमाज़ पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं है। यही हुक्म उस असमर्थ, मजबूर आदमी का है जो पेशाब की जगह को कंकरी लकड़ी या किसी और चीज़ से पाक करने पर मजबूर हो और फिर बाद में घर जाए तो उसको पानी से पाक करे अतः अगर उसको पेशाब की नमी से लिबास के नजिस होने का विश्वास न हो तो उस पर उसको पाक करना अथवा बदलना वाजिब नहीं है।
    2. लिबास ग़स्बी न हो (छीना हुआ, हथियाया हुआ)
    मसअला 409 शर्त है कि नमाज़ी का लिबास मुबाह हो (ग़स्बी न हो)
    मसअला 410 अगर लिबास के नजिस होने को न जानता हो या भूल जाए और उसमें नमाज़ पढ़े तो उसकी नमाज़ सही है। यही हुक्म उस सूरत में भी है जब इस बात को न जानता हो कि ग़स्बी लिबास में नमाज़ पढ़ना हराम है। इसलिए एक आदमी एक समय तक ऐसे लिबास में नमाज़ पढ़ता रहे कि जिसमें ख़ुम्स वाजिब हो अगर वह आदमी ख़ुम्स के वाजिब होने को न जानता हो या उसके उपयोग करने हेतु आदेश को न जानता हो तो जो नमाज़ उसने पहले पढ़ी है वह सही है।
    मसअला 411 जब ऐसे माल (धन) से कपड़ा ख़रीदे जिसका ख़ुम्स या जिसकी ज़कात नहीं दी गई है तो उसकी नमाज़ उसमें बातिल है।
    3. लिबास मुरदार के अजज़ा (भाग) का न बना हो
    मसअला 412 शर्त है कि नमाज़ी का लिबास ख़ूने जहिन्दा (उछल कर निकलने वाला ख़ून) रखने वाले मुरदार से न बना हो और एहतियात वाजिब के कारण ख़ून जहिन्दा न रखने वाले मुरदार से भी न बना हो।
    मसअला 413 अगर नमाज़ी के पास ख़ूने जहिन्दा रखने वाले जानवर के मुरदार का कुछ भाग हो तो उसकी नमाज़ एहतियात वाजिब के कारण बातिल है। लेकिन अगर वह ऐसा भाग हो जिसमें जीवन प्रवाहित नहीं होता जैसे बाल, रोएं, ऊन, सींग हड्डी या इन जैसी कोई चीज़ और वह ऐसे पशु का हो जिसका गोश्त हलाल होता है तो उसकी नमाज़ बातिल नहीं होगी।
    मसअला 414 ऐसा पशु जिसका तज़किया (विधिवत तरीक़ा) संदेहित हो उसका गोश्त ख़ाने और उसकी खाल में नमाज़ का सही होना मुरदार के हुक्म में है। परन्तु वह नमाज़ें जो उसने उस लिबास में हुक्म न जानने की परिस्थिति में पढ़ी हैं वह सही हैं इसी कारण वह प्राकृतिक खाल जिसके सम्बन्ध में पता न हो कि शरअन तज़किया किए गए पशु की है या नहीं तो वह नजिस नहीं है परन्तु उसमें नमाज़ सही नहीं है।
    4. लिबास ऐसे पशु के भाग से न बना हो कि जिसका खाना हराम हो।
    मसअला 415 नमाज़ी के लिबस के लिए शर्त है कि वह ऐसे जानवर से न हो जिसका खाना हराम हो अतः अगर उसकी कोई चीज़ नमाज़ी के लिबास पर लगी हो या शरीर पर हो तो नमाज़ बातिल होगी।
    मसअला 416 अगर नमाज़ी के शरीर एवंम लिबास पर हराम गोश्त का थूक, नाक का पानी, या कोई अन्य नमी हो तो उसकी नमाज़ बातिल उसमें बातिल होगी मगर यह कि वह चीज़ें सूख गयी हों और मुल नजासत ख़त्म हो गयी हो अतः अगर नमाज़ी के लिबास या शरीर पर हराम गोश्त पंक्षियों का बीट (फ़ूजला) हो तो उसमें नमाज़ बातिल है लेकिन जब सूख कर नमाज़ी के शरीर या लिबास से ख़त्म हो जाए तो उसकी नमाज़ सही है।
    मसअला 417 अगर नमाज़ी के लिबास या शरीर पर मनुष्य का थूक, पसीना या उसके बाल हों उसमें नमाज़ पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं है।
    मसअला 418 ऐसे लिबास में नमाज़ पढ़ना जिसमें आशंका हो कि हलाल गोश्त जानवर के चमड़े या भाग से है या हराम से तो कोई आपत्ति नहीं है।
    5. लिबास सोने का न हो।
    मसअला 419 पुरुषों को सोना पहनना हराम है और इसमें नमाज़ बातिल है। हाँ महिलाओं के लिए इसमें कोई आपत्ति नहीं है।
    मसअला 420 पुरुष के लिए सोने की चेन अंगूठी, हार एवंम घड़ी की चेन पहनना हराम है, और एहतियात के कारण इन चीज़ों में नमाज़ पढ़ना हराम है।
    मसअला 421 पुरुषों के सोना पहनने के हराम होने का मापदंड श्रंगार, सजावट का होना नहीं है, बल्कि उनके लिए सोना पहनना हर परिस्थिति में हराम है चाहे अंगूठी हो या गर्दन बन्द हो ज़न्जीर हो या इस जैसी कोई चीज़ जो लोगों की दृष्टि में ख़ुशी की निशानी हो न कि सजावट और श्रंगार के लिए हो यहां तक कि वह दूसरों की निगाह में छिपी हुई ही क्यों न हो हाँ ऑपरेशन करने और दाँत बनाने के लिए पुरुष अगर सोने का उपयोग करे तो इसमें कोई आपत्ति नहीं है।
    मसअला 422 पुरुषों पर सोना पहनना हराम है चाहे अधिक समय के लिए हो या थोड़ी देर के लिए जैसे निकाह के समय थोड़ी देर के लिए अंगूठी पहनना।
    मसअला 423 सफ़ेद सोना अगर ज़र्द सोना हो लेकिन उसको किसी पदार्थ से मिलाकर सफ़ेद कर दिया गया हो तो उसकी अंगूठी पहनना हराम है। हाँ अगर उसमें सोने की मात्रा बहुत कम हो कि आम लोग उर्फ़ में उसे सोना न कहें तो मना नहीं है।
    मसअला 424 प्लेटिनम सोना नहीं है उसपर सोने का आदेश लागू नहीं होगा अतः उसके उपयोग में कोई आपत्ति नहीं है।
    6. लिबास शुद्ध रेशमी न हो।
    पुरुष नमाज़ी के लिए शर्त है कि उसका लिबास शुद्ध रेशमी न हो हाँ रेशम के रुमाल को जेब में रख सकते हैं। और उससे नमाज़ बातिल नहीं होती।
    मसअला 425 वह स्थान जहां नमाज़ी के शरीर एवंम लिबास का पाक होना शर्त नहीं है।
    1. शरीर या लिबास फोड़े एवंम ख़ून से नजिस हो।
    2. शरीर या लिबास जो दिरहम बग़ल्ली (दाहिने हाथ की बड़ी उंगली या ऊपरी पोर जिसे अन्गुश्ते शहादत भी कहते हैं) से कम ख़ून से नजिस हो।
    3. वह नजिस लिबास जिसमें नमाज़ पढ़ी जा सकती है जैसे मोज़ा इत्यादि, जो शर्मगाह (गुप्तांग) को नहीं छिपा सकता हो।
    7. जो आदमी नजिस शरीर एवंम लिबास के साथ नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो।
    1. शरीर या लिबास जो फोड़े या ज़ख़्म के ख़ून से नजिस होः
    मसअला 426 अगर नमाज़ी का लिबास या शरीर फोड़े या ज़ख़्म के ख़ून से नजिस हो जाए और अगर उसको पाक करना या बदलना कठिन हो या उस आदमी के लिए सख़्त परेशानी का कारण हो तो ठीक होने तक उसमें नमाज़ पढ़ना जायज़ है। यही आदेश उस पाक चीज़ का या दवा का है जिसमें ख़ून मिला हो।
    मसअला 427 ऐसे फोड़े और ज़ख़्स का ख़ून जो तेज़ी से ठीक हो रहा हो और सरलता से पाक करना सम्भव हो पिछले मसअले के आदेशानुसार नहीं आएगा अर्थात इससे नजिस हुए शरीर या लिबास में नमाज़ बातिल है।
    2. दिरहम बग़ल्ली से कम ख़ून के साथ नजिस शरीर या लिबासः
    मसअला 428 जब नमाज़ी का लिबास या शरीर दिरहम बग़ल्ली के ख़ून के अलावा किसी और ख़ून से नजिस हो तो अगर उसकी मात्रा अन्गुश्ते शहादत के जोड़ (दाहिने हाथ की बड़ी अंगली का पहला पोर) से कम है तो उसमें नमाज़ पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन अगर उससे अधिक हो तो उस में नमाज़ सही नहीं है।
    मसअला 429 दिरहम बग़ल्ली अर्थात उंगली के जोड़ से कम ख़ून की शर्तः
    1. वह ख़ून हैज़ का न हो, अगर हैज़ का हो तो उसमें नमाज़ बातिल (बेकार) होगी। चाहे वह बहुत थोड़ा ही क्यों न हो। और एहतियाते मुस्तहेब है कि निफ़ास और इस्तेहाज़ा का ख़ून भी न हो।
    2. वह ख़ून निम्न चीज़ों में से न होः
    नजिसुल ऐन हैवान (ज़मीनी कुत्ता और सुअर) वह काफ़िर जो किताबी नहीं है, और हराम गोश्त जानवर या मुरदार।
    3. वह ख़ून नमी के साथ न मिला हो मगर यह कि मिलकर बिलकुल ख़त्म हो जाए। कुल मिला कर अन्गुश्ते शहादत के जोड़ से अधिक न हो, इस प्रकार यह ख़ून नमाज़ के सही होने में बाधित नहीं है। परन्तु इसके अलावा किसी और परिस्थिति में हो तो एहतियात के कारण उसमें नमाज़ सही नहीं होगी।
    मसअला 430 अगर लिबास या शरीर ख़ून से नजिस न हो लेकिन वह ख़ून से नजिस हो चुकी किसी चीज़ से नजिस हो जाए और वह नमाज़ में माफ़ न हो तो उसमें नमाज़ सही नहीं होगी।
    3. ऐसा नजिस लिबास जिसमें नमाज़ हो सकती है जैसे मोज़ा इत्यादि जो शर्मगाह (गुप्तांग) को नहीं छिपा सकता।
    मसअला 431 ऐसे नजिस लिबास में नमाज़ पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं इसलिए कि वह शर्मगाह को नहीं छिपा सकता जैसे मोज़ा, टोपी इत्यादि, यही आदेश अंगूठी और पट्टे (बेल्ट) का भी है।
    मसअला 432 अगर छोटा सा नजिस रुमाल किसी के पास हो जो शर्मगाह को न छिपा सके उसमें नमाज़ पढ़ने में कोई आपत्ति नहीं है। यही हुक्म नजिस चाबी, बैग और छुरी को साथ रखने का भी है।
    4. जो आदमी नजिस लिबास या शरीर के साथ नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो।
    मसअला 433 अगर ठंडक अथवा पानी न मिलने के कारण नजिस लिबास या नजिस शरीर के साथ नमाज़ पढ़ने पर मजबूर हो तो नजिस लिबास या शरीर में उसकी नमाज़ सही होगी।
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