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    नमाज़े जमाअतः (आयतुल्लाह ख़ामेनई की नज़र में)

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    सवाल 548: इमामे जमाअत नमाज़ में क्या नियत करे ? जमाअत की नियत करे या फुरादा की?
    जवाब: अगर जमाअत की फ़जी़लत हासिल करना चाहता है तो वाजिब है के इमामत व जमाअत का इरादा करे और अगर इमामत के इरादे के बग़ैर नमाज़ शुरू कर दे तो उस की नमाज़ में और दूसरों के लिये इस की इक़तेदा करने में कोइ हर्ज नहीं हैं।

    सवाल 549: फ़ौजी मरकज़ों में नमाज़े जमाअत के वक़्त के जो दफ़तरी काम के वक़्त क़ायम होती है, कुछ कारकुन काम की वजह से नमाज़े जमाअत में शरीक नहीं हो पाते हालांकि वो इस काम को दफ़तरी औक़ात के बाद या दूसरे दिन भी अंजाम दे सकते हैं तो क्या इस अमल को नमाज़ को अहमियत न देने से ताबीर किया जायेगा?
    जवाब:  अव्वल वक़्त और जमाअत की फ़ज़ीलत हासिल करने के लिये बेहतर ये है के दफ़तरी उमूर को इस तरह मुनज़्ज़़म करे जिससे वे लोग इस इलाही फ़रीज़े को कम से कम वक़्त मे जमाअत के साथ अंजाम दे सकें ।
    सवाल 550: उन मुसतहब आमाल, जैसे मुसतहब नमाज़ या दुआ-ए-तवस्सुल और दूसरी दुआओं के बारे में आप की क्या राय है जो सरकारी इदारों में नमाज़ से पहले या बाद में दर्मियाने नमाज़़ में पढ़ी जाती हैं के जिन में नमाज़े जमाअत से भी ज़्यादा वक़्त इस्तेमाल होता है?
    जवाब: वो मुसतहब आमाल और दुवायें जो नमाज़े जमाअत के जो इलाही फरीज़ा और इस्लामी शआर में से हैं, के साथ अंजाम पाते है, अगर दफ़तरी वक़्त के ज़ाया होने और वाजिब कामों की ताख़ीर के मुजिब हों तो इन में हर्ज है।
    सवाल 551:  क्या इस जगह दूसरी नमाज़े जमाअत क़ायम करना सही है जहां क़रीब ही नमाज़ गुज़ारों की बड़ी तादाद के साथ एक और नमाज़े जमाअत बरपा हो रही हो, इस तरह के इस की अज़ान और अक़ामत की आवाज़ भी सुनाई दे?
    जवाब:  ऐसी दूसरी जमाअत के क़ायम करने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन मोमिन के शायाने शान ये है के वो एक ही जगह जमा हो और एक ही जमाअत में शरीक हो ताके नमाज़े जमाअत की अज़मत में चार चाँद लग जायें।
    सवाल 552: जब मस्जिद में नमाज़े जमाअत क़ायम होती है तो उस वक़्त कुछ लोग फ़ुरादा नमाज़ पढते हैं उस अमल का क्या हुक्म है।
    जवाब:  अगर ये अमल नमाज़े जमाअत को कमज़ोर करना और उस इमामे जमाअत की तोहीन और बेइज़्ज़़ती शुमार किया जाये कि जिस पर लोग ऐतमाद करते हैं तो जाईज़ नहीं है।
    सवाल 553:  एक मुहल्ले में कई मस्जिदें हैं और सब में नमाज़ बा जमाअत होती है और एक मकान दो मस्जिदों के दर्मियान है इस तरह के एक मस्जिद उस से दस घरों के फ़ासले पर है और दूसरी दो ही घरों के बाद है और उस घर में भी नमाज़े जमाअत होती है इस का क्या हुक्म है?
    जवाब:  ज़रूरी है के नमाज़े जमाअत इत्तेहाद व भाई चारगी के लिये क़ायम किया जाये ना के इख़तेलाफ़ व जुदाई की फ़िज़ा फैलाने का ज़रीया बनाया जाये और मस्जिद से मिले हुऐ घर में नमाज़े जमाअत क़ायम करने में कोई हर्ज नहीं है बशर्त ये के वो इख़तेलाफ़ व जुदाई का सबब न हो ।
    सवाल 554: क्या किसी शख़्स के लिये जाईज़ है कि वो मस्जिद के मुसतक़िल इमाम कि जिस को मस्जिदों के काम की ताईद हासिल है कि इमामे जमाअत के बग़ैर इस मस्जिद में नमाज़े जमाअत क़ायम करे?
    जवाब: नमाज़े जमाअत क़ायम करना इमाम रातब (जो मस्जिद का मुस्तक़िल इमाम है) कि नमाज़े जमाअत पर मौकूफ नहीं है लेकिन बेहतर ये है के नमाज़ के वक़्त जब नमाज़े जमाअत क़ायम करने के लिये इमाम रातब मस्जिद मे मोजूद हो तो उस के लिये ज़ेहमत फ़ितना व फ़साद के भड़क उठने का सबब हो तो हराम है।
    सवाल 555: अगर इमामे जमाअत कभी बद अख़लाक़ी से बात करे या ऐसा मज़ाक़ करे जो कि आलिमे दीन की शान न हो तो क्या इससे अदालत साक़ित हो जाती है?
    जवाब: अगर ये शरिअत के मुख़ालिफ़ न हो तो इस से अदालत को कोई नुक़सान नहीं पहुंचता।
    सवाल 556:  क्या इमामे जमाअत की कमा हक़्क़ा मआरफ़त न होने के बावजूद इसकी इक़तेदा की जा सकती है?
    जवाब: अगर मामूम (नमाज़ पढ़ने वाले) के नज़दीक किसी भी तरीक़े से इमाम की अदालत साबित हो जाये तो उसके पीछे नमाज़ पढ़ना जाएज़ है और जमाअत सही है।
    सवाल 557:  अगर एक शख़्स किसी दूसरे शख़्स को आदिल व मुत्तक़ी समझता हो और उसी लम्हें इस बात को भी मान लेता है कि उसने कुछ मौक़ों पर इसपर जु़ल्म किया है तो क्या वो उसे कुल्ली तौर पर आदिल समझ सकता है?
    जवाब:  जब तक उस शख़्स के बारे में जिसको उसने ज़ालिम समझा है ये साबित न हो जाये के उसने वो काम इल्म व इरादा और इख़्तियार से किया है या किसी शरई जवाज़ के बग़ैर अंजाम दिया है तो उस वक़्त तक वो उसके फ़ासिक़ होने का हुक्म नहीं लगा सकता।
    सवाल 558:  क्या ऐसे इमामे जमाअत के पीछे नमाज़ पढ़ना जाएज़ है जो अमर बिल मारूफ़ व नहीं अनिल मुनकर करने की ताक़त रखता है लेकिन नहीं करता?
    जवाब:  सिर्फ़ अमर बिल मारूफ़ न करना जो मुमकिन है मुकल्लफ़ (वोह शख़्स जिस को यह मसअला पैश आया है) की नज़र में किसी क़ाबिले कु़बूल उज़र की बिना पर हो तो अदालत में शक पैदा करने का सबब नहीं बनता और न ही उसकी इक़तेदा करने में रूकावट है।
    सवाल 559:  आपके नज़दीक अदालत के क्या मानी हैं?
    जवाब:  यह एक नफ़सानी हालत है जो ऐसा तक़वा इख़्तियार करने का सबब होती है जो इंसान को वाजिबात के तर्क और शरई हराम चीज़ों के अंजाम देने से रोकती है उसके साबित होने के लिये उस शख़्स का ज़ाहिरी तौर पर अच्छा होना ही काफ़ी है।
    सवाल 560:  हम कुछ जवानों का एक गिरोह एक जगह जमा होता है जब नमाज़ का वक़्त होता है तो अपने दर्मियान में से किसी एक आदिल शख़्स को नमाज़ के लिये आगे बढ़ा देते हैं लेकिन कुछ बिरादरान उस नमाज़ पर ऐतराज़ करते हैं कि उस ने ग़ैर आलिमे दीन के पीछे नमाज़ पढ़ने को हराम क़रार दिया है लिहाज़ा हमारा फ़रीज़ा क्या है?
    जवाब:  अगर आलिमे दीन तक पहुंचना मुमकिन हो तो ग़ैर आलिमे दीन के पीछे नमाज़ न पढ़ें।
    सवाल 561:  क्या दो शख़्स नमाज़ क़ायम कर सकते हैं?
    जवाब:  अगर आप का मतलब इस तरह नमाज़ पड़ना है कि एक इमाम हो और दूसरा इमामूम तो इसमें कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 562:  अगर मामूम ज़ोहर व अस्र की नमाज़ बाजमाअत पढ़ते हुए हम्द व सूरा ख़ुद पढ़े इस फ़र्ज़ के साथ के हम्द व सूरा पढ़ना उससे साक़ित है लेकिन अगर वो अपनी तवज्जोह करने और इधर उधर भटकने से बचाने के लिये ऐसा करे तो इसकी नमाज़ का क्या हुक्म है?
    जवाब:  ज़ोहर व अस्र जैसी इख़्फ़ाती (ख़ामौशी के साथ पढ़ी जाने वाली) नमाज़ों में उसके लिये क़िरअत जाएज़ नहीं है चाहे अपने ज़हन को मुतवज्जाह करने की वजह से ही क्यो न हो।
    सवाल 563:  अगर कोई इमामे जमाअत ट्रैफ़िक के क़वानीन की रिआयत करते हुए साईकिल के ज़रिये इमामे जमाअत पढ़ाने जाता हो तो उसका क्या हुक्म है?
    जवाब:  उससे अदालत और इमामत की सेहत पर कोई हर्फ़ नहीं आता।
    सवाल 564:  जब हम नमाज़े जमअत में शामिल न हो सकें और जमाअत का सवाब हासिल करने की वजह से तकबीरतुलएहराम कहकर बैठ जाते हैं और इमाम के साथ तशहुद पढ़ते है और इमाम के साथ सलाम फ़ेरने के बाद खड़े हो जाते हैं और पहली रकअत पढ़ते हैं तो सवाल ये है के क्या चार रकअतें नमाज़ की दूसरी रकअत के तशहुद में भी ऐसा करना जाएज़ है?
    जवाब: ज़िक्र किया गया तरीक़ा इमामे जमाअत की नमाज़ के आख़िरी तशहुद से मख़सूस है ताकि जमाअत का सवाब हासिल किया जा सके।
    सवाल 565: क्या इमामे जमाअत के लिये नमाज़ की उजरत लेना जाएज़ है?
    जवाब:  जाएज़ नहीं है मगर ये के नमाज़ में हाज़िर होने के मुक़द्मात (यानी वक़्त देने के लिये) के लिये लें।
    सवाल 566: क्या इमामे जमाअत के लिये ईद या कोई सी भी दो नमाज़ों की एक वक़्त में इमामत करना जाएज़ है?
    जवाब:  नमाज़े पंजगाना में दूसरे मामूमीन (नमाज़ गुज़ार) के लिये नमाज़ को एक बार तकरार करने में कोई हर्ज नहीं है बल्कि मुस्तहिब है लेकिन नमाज़े ईद की तकरार करने में ऐतराज़ है।
    सवाल 567: जब इमाम नमाज़े इशा की तीसरी या चौथी रकअत में और मामूम दूसरी रकअत में हो तो क्या मामूम पर वाजिब है कि हम्द व सूरा को बुलन्द आवाज़ से पढ़े?
    जवाब:  वाजिब है कि दोनों को आहिस्ता आवाज़ से पढ़े।
    सवाल 568: नमाज़ के सलाम के बाद नबी अकरम पर सलावात की आयत इन्नल्लाहा व मलायकतोहू पढ़ी जाती है फि़र नमाज़ गुज़ार मुहम्मद व आले मुहम्मद पर तीन मर्तबा दुरूद भेजते हैं और उसके बाद तीन मर्तबा तकबीर कहते हैं कि जिस के साथ सियासी नारे लगाते हैं यानि दुआ और दूर होने के जुमले कहे जाते हैं जिन्हें मामूनीन (नमाज़ गुज़ार) बुलन्द आवाज़ से दौहराते हैं क्या इस में कोई हर्ज है?
    जवाब:  आयत सलावात पढ़ने और आले मुहम्मद अलै0 पर दुरूद भेजने में न सिर्फ़ कोई हर्ज है बल्कि ये मुस्तहसिन (बहुत अच्छा) और राइज है और उस में सवाब है और इसी तरह इस्लामी नारे और इस्लामी इन्क़ेलाब के नारे (तकबीर और इसके मिली हुई चीज़ों) के जो इस्लामी इन्क़ेलाब के अज़ीम पैग़ाम व मक़सद की याद ताज़ा करते हैं कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 569: अगर एक शख़्स मस्जिद में नमाज़े जमाअत की दूसरी रकअत में पहुंचे मसअले न जानने की वजह से तशहुद व कु़नूत के जिनका बजा लाना वाजिब था न बजा लाये तो क्या उसकी नमाज़ सही है?
    जवाब:  नमाज़ सही है लेकिन तशहुद की क़ज़ा और दो सजद-ए-सहू बजा लाना वाजिब है।
    सवाल 570:  नमाज़ जिसके पीछे पढ़ी जा रही है क्या उसकी रज़ामंदी शर्त है? और क्या मामूम का उसके पीछे नमाज़ पढ़ना सही है?
    जवाब:  पीछे नमाज़ पढ़ने के सही होने में इमामे जमाअत की रज़ामंदी शर्त नहीं है और मामूम की नमाज़ सही है।
    सवाल 570:  दो शख़्स एक इमाम और दूसरा मामूम जमाअत क़ायम करते हैं तीसरा शख़्स आता है और वो दूसरे मामूम को इमाम समझता है और उसके पीछे नमाज़ पढ़ता है और नमाज़ पढ़ने के बाद उसे मालूम होता कि वोह इमाम नहीं बल्कि मामूम था पस इस तीसरे शख़्स की नमाज़ का क्या हुक्म है?
    जवाब: मामूम की इक़तदा सही नहीं है लेकिन जब वो न जानता हो और उसकी इक़तेदा कर ले तो अगर वो रुकू व सुजूद में अपने अलग तरह के फ़रीज़े पर अमल करे यानी जानबूझ कर और सहवन (भूले से) किसी रुक्न की कमी और ज़्यादती न करे तो उसकी नमाज़ सही है।
    सवाल 572:  जो शख़्स नमाज़े इशा पढ़ना चाहता है क्या उसके लिये जाएज़ है कि वो नमाज़़े मग़रिब की जमाअत में शरीक हो?
    जवाब:  उस में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 573:  मामूमीन (नमाज़ गुज़ार) (नमाज़ गुज़ारों) से इमाम के नमाज़ के मक़ाम के बुलन्द होने की रिआयत न करने से क्या उनकी नमाज़ बातिल हो जाती है?
    जवाब:  अगर इमाम के खड़े होने की जगह मामूमीन (नमाज़ गुज़ार) (नमाज़ गुज़ारों) के खड़े होने की जगह से इस हद से ज़्यादा बुलन्द हो कि जिसकी शरअन इजाज़त है तो उनकी जमाअत के बातिल होने का सबब होगी।
    सवाल 574:  अगर नमाज़ की एक सफ़ में तमाम वो लोग नमाज़ पढ़ें कि जिनकी नमाज़ क़स्र है और उसके बाद वाली सफ़ उन लोगों की हो जिनकी नमाज़ पूरी है तो इस सूरत में अगर अगली सफ़ वाले दो रकअत नमाज़ तमाम करने के फ़ौरन बाद अगली दो रकअत की इक़तेदा के लिये खड़े हो जायें तो क्या बाद की सफ़ वालों की आख़री दो रकअत की जमाअत सही है।
    जवाब:  फ़र्ज़ कीजिये अगली सफ़ में तमाम लोगों की नमाज़ क़स्र (आधी) हो तो बाद वाली सफ़ों की जमाअत का सही होना इशकाल है और अहतियात यह है कि जब पहली सफ़ वाले सलाम की नीयत के लिए बैठ जायें तो बाद वाली सफ़ वाले फ़ुरादा की नीयत कर लें।
    सवाल 575:  क्या वो मामूम जो नमाज़ के लिये पहली सफ़ के आख़री सिरे पर ख़ड़ा हो उन मामूमीन (नमाज़ गुज़ार) (नमाज़ गुज़ारों) से पहले नमाज़ में शामिल हो सकता है जो उसके और इमाम के दर्मियान वास्ता हैं?
    जवाब: जब मामूमीन (नमाज़ गुज़ार) के जो उसके और इमाम के दर्मियान वास्ता हैं! इमामे जमाअत की जमाअत शुरू करने के बाद नमाज़ में इक़तेदा के लिये पूरी तरह से तैयार हों तो वो जमाअत की नीयत से नमाज़ में शामिल हो सकता है।
    सवाल 576:  जो शख़्स यह समझकर कि इमाम की पहली रकअत है उसकी तीसरी रकअत में शरीक हो जाये और कुछ न पढ़े तो क्या उस पर दोबारह नमाज़ का पढ़ना वाजिब है?
    जवाब:  अगर वो रुकू में जाने से पहले ही उसकी तरफ़ मुतावज्जेह हो जाये तो उस पर क़िराअत वाजिब है और अगर रुकू के बाद मुतावज्जेह हो तो उसकी नमाज़ सही है उस पर कोई चीज़ वाजिब नहीं है लेकिन ऐहतियाते मुस्तहब यह है कि सहवन (भीले से) क़िरअत छोड़ने के सबब दो सज्दे सहू बजा लाये।
    सवाल 577:  हुकुमती दफ़ातिर (ऑफ़िसों) और स्कूलों में नमाज़े जमाअत क़ायम करने के लिये इमामे जमाअत की बहुत ज़रूरत है और चूंकि मेरे अलावा इस इलाक़े में कोई आलिमे दीन नहीं इसलिये मैं मजबूरन कई जगहों पर एक वाजिब नमाज़ की तीन या चार मर्तबा इमामत कराता हूं, दूसरी मर्तबा नमाज़ पढ़ाने के लिये तो सारे मराजेअ ने इजाज़त दी है लेकिन क्या इस से ज़ाइद को ऐहतियातन क़ज़ा की नीयत से पढ़ाया जा सकता है?
    जवाब:  ऐहतियातन क़ज़ा पढ़ी जाने वाली नमाज़ों के साथ इमामत सही नहीं है?
    सवाल 578:  एक कालिज में अपने स्टाफ़ के लिये कालिज की ऐसी इमारत में नमाज़े जमाअत क़ायम की है जो शहर की एक मस्जिद के नज़दीक है यह बात जानते हुए कि ऐन उसी वक़्त मस्जिद में नमाज़़े जमाअत क़ायम होती है कॉलिज की जमाअत में शरीक होने का क्या हुक्म है?
    जवाब: ऐसी नमाज़े जमाअत में शिरकत करने में जिसमें मामूम (नमाज़ पढ़ने वाले) की नमाज़े जमाअत में इक़तदा और जमाअत के सही होने की शर्तें पाए जाती हों कोई हर्ज नहीं है चाहे यह जमाअत उस मस्जिद से क़रीब ही हो रही हो जिसमें ठीक उसी वक़्त नमाज़े जमाअत क़ायम होती है।
    सवाल 579:  क्या उस इमाम के पीछे नमाज़ सही जो क़ाज़ी है लेकिन मुजतहिद नहीं है?
    जवाब:  उसको अगर किसी ऐसे शख़्स ने चुना है जिसको चुनने का हक़ है तो उसके पीछे नमाज़ पढने में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 580:  मुसाफ़िरत के मसअले में इमाम ख़ुमैनी (रह0) का मक़ल्लिद क्या एक ऐसे इमामे जमाअत के पीछे नमाज़ पढ़ सकता है जो इस मसअले में किसी और मुजतहिद का मुक़ल्लिद हो ख़ास तौर पर जब कि मसअला नमाज़े जुमा का हो?
    जवाब:  तक़लीद के इख़्तिलाफ़़ की वजह से नमाज़ के सही होने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन उस नमाज़ की इक़तदा सही नहीं है जो मामूम (नमाज़ियों) के मरज-ए-तक़लीद के फ़त्वे के मुताबिक़ क़स्र हो और इमामे जमाअत के मरज-ए-तक़लीद के फ़तवे के मुताबिक़ कामिल (पूरी) हो या इसका उलटा हो।
    सवाल 581:  अगर इमामे जमाअत तकबीरतुल अहराम के बाद भूले से रुकू में चला जाये तो मामूम का क्या फ़रीज़ा है?
    जवाब:  अगर मामूम नमाज़े जमाअत में शामिल होने के बाद और रुकू में जाने से पहले इस तरफ़ मुतावज्जेह हो जाये तो उस पर फ़ुरादा की नीयत कर लेना और हम्द व सूरा पढ़ना वाजिब है।
    सवाल 582:  अगर नमाज़े जमाअत की तीसरी या चौथी सफ़ के बाद स्कूलों के नाबालिग़ बच्चे नमाज़ के लिये खड़े हों और उनके पीछे बालिग़ लोग खड़े हों तो इस हालत में नमाज़ का क्या हुक्म है?
    जवाब: ज़िक्र किये गये मसअले में कोई हर्ज नहीं है।
    सवाल 583:  अगर इमामे जमाअत ने किसी मजबूरी के सबब गु़स्ल के बदले तयम्मुम किया हो तो यह नमाज़े जमाअत पढ़ाने के लिये काफ़ी है या नहीं?
    जवाब:  अगर वो शरई एतेबार से मजबूर हो तो गु़स्ले जनाबत के बदले तयम्मुम करके इमामत करा सकता है और उसके पीछे नमाज़ पढ़ने में कोई हर्ज नहीं है