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    नमाज़े जमाअत में औरतों की शिरकत

    नमाज़े जमाअत में औरतों की शिरकत
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    नमाज़े जमाअत में औरतों की शिरकत (हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई की नज़र में)

    सवाल 592: क्या शारेअ मुक़द्दस ने औरतों को भी मस्जिदों में नमाज़े जमाअत या नमाज़े जुमा में शरीक होने की उसी तरह ताकीद दिलाई है जिस तरह मर्दों को दिलाई है, या औरतों का घर में नमाज़ पढ़ना अफ़ज़ल है? जवाब: औरतों के जमाअत में शिरकत करने में कोई हर्ज नहीं है और उन को जमाअत का सवाब मिलेगा।

    सवाल 593: औरत कब इमामे जमाअत बन सकती है? जवाब: औरत का फ़क़्त औरतों की नमाज़े जमाअत के लिये इमाम बनना जाएज़ है।

    सवाल 594: जब औरतें (मर्दों की तरह) नमाज़े जमाअत में शरीक होती हों तो मुस्तहब व मकरूह के लिहाज़ से इसका क्या हुक्म है? और जब मर्दों के पीछे खड़ी हों तो उस वक़्त उन का क्या हुक्म है? वो मर्दों के पीछे नमाज़े जमाअत के लिये खड़ी हों तो क्या बीच में किसी पर्दे की ज़रूरत है? अगर नमाज़ में वो मर्दों के एक तरफ़ खड़ी हों तो पर्दे के लिहाज़ से क्या हुक्म है? इस बात को धयान में रखते हुए कि जमाअत, तक़ारीर और दूसरे प्रोग्रामों के दौरान औरतों का पर्दे के पीछे होना उनकी तौहीन और शान घटाने का सबब है? जवाब: औरतों के नमाज़े जमाअत में शरीक होने में कोई ऐतराज़ नहीं है और जब वो मर्दों के पीछे खड़ी हों तो पर्दे की ज़रूरत नहीं है, लेकिन जब मर्दों के एक तरफ़ खड़ी हों तो नमाज़ में मर्द के बराबर औरतों के खड़े होने की कराहियत को दूर करने के लिये पर्दे की ज़रूरत है और ये वहम कि हालते नमाज़ में मर्दों और औरतों के दर्मियान पर्दा लगाना औरत की शान घटाने और उसकी अज़मत को कम करने का सबब है, सिर्फ़ एक ख़याल है कि जिस की कोई बुनयाद नहीं है, और यह कि फ़िक़ा में अपनी ज़ाती राय को दख़ल देना सही नहीं है। सवाल

    595: हालते नमाज़ में मर्दों और औरतों की सफ़ों के दर्मियान पर्दे के बग़ैर इत्तेसाल (मिलाना) और इत्तेसाल को ख़त्म करने की क्या कैफ़ियत होनी चाहिये? जवाब: औरतें फ़ासले के बग़ैर मर्दों के पीछे खड़ी हों।