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    नमाज़ की अहमियत

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    नमाज़ वह इबादत है कि तमाम अंबिया ए केराम ने इस की सिफ़ारिश की है। इस्लाम के अंदर सबसे बड़ी इबादत नमाज़ है जिस के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम (स) का इरशाद है कि अगर नमाज़ कबूल न हुई तो कोई अमल कबूल नही होगा फिर फ़रमाया कि नमाज़ जन्नत की चाभी है और क़यामत के दिन सब से पहले नमाज़ के बारे में सवाल होगा।

    क़ुरआने मजीद के अंदर नमाज़ को शुक्रे ख़ुदा का ज़रिया बताया गया है। बाज़ हदीसों में नमाज़ को चश्मे और नहर से तशबीह दी गई है जिस में इंसान पांच मरतबा ग़ुस्ल करता है। इन के अलावा बहुत सी अहादीस नमाज़ की अज़मत और अहमियत पर दलालत करती है। इमाम अलैहिस सलाम नहजुल बलाग़ा में फ़रमाते हैं:

    नमाज़ क़ायम करो और उस की मुहाफ़ेज़त करो और उस पर ज़्याद तवज्जो दो और ज़्यादा नमाज़ पढ़ो और उस के वसीले से ख़ुदा का क़ुर्ब हासिल करो। (1)

    चूं कि ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

    नमाज़ ब उनवाने फ़रीज ए वाजिब अपने अवका़त पर मोमिनीन पर वाजिब है। (2)

    फिर फ़रमाया:

    क़यामत के दिन अहले जन्नत, जहन्नम वालों से सवाल करेगें। कौन सी चीज़ तुम्हे जहन्नम में ले कर आई है वह जवाब देगें कि हम अहले नमाज़ नही थे।

    फिर इमाम अलैहिस सलाम 199 वें ख़ुतबे में फ़रमाते हैं:

    नमाज़ का हक़ वह मोमिनीन पहचानते हैं जिन को दुनिया की ख़ूब सूरती धोका न दे और माल व दौलत और औलाद की मुहब्बत नमाज़ से न रोक सके। एक और जगह पर फ़रमाते हैं:

    तुम नमाज़ के अवक़ात की पाबंदी करो वह शख़्स मुझ से नही है जो नमाज़ को ज़ाया कर दे। (3)

    एक और जगह पर फ़रमाते हैं:

    ख़ुदारा, ख़ुदारा नमाज़ को अहमियत दो चूं कि नमाज़ तुम्हारे दीन का सुतून है। (4)

    इस हदीस के अलावा और भी काफ़ी हदीसें अहमियते नमाज़ को बयान करती हैं चूँ कि इख़्तेसार मद्दे नज़र है लिहाज़ा इन ही चंद हदीसों पर इकतेफ़ा किया जाता है। फ़क़त एक दो मौरिद मुलाहेज़ा फ़रमायें:

    1. नमाज़ कुरबे ख़ुदा का ज़रिया है।

    इमाम (अ) नहजुल बलाग़ा में फ़रमाते हैं:

    नमाज़ कुरबे ख़ुदा का सबब है।

    2. नमाज़ महवरे इबादत

    रसूले इस्लाम (स) फ़रमाते हैं कि नमाज़ दीन का सुतून है। सबसे पहले नाम ए आमाल में नमाज़ पर नज़र की जायेगी और अगर नमाज़ कबूल हुई तो बक़िया आमाल देखे जायेगें। अगर नमाज़ कबूल न हुई तो बाक़ी आमाल भी क़बूल नही होगें।

    इमाम (अ) फ़रमाते हैं:

    जान लो कि तमाम दूसरे आमाल तेरी नमाज़ के ताबे होने चाहियें। (5)

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    1. नहजुल बलाग़ा ख़ुतबा 199

    2. सूर ए निसा आयत 103

    3. दआयमुल इस्लाम जिल्द 2 पेज 351

    4. नहजुल बलाग़ा ख़त 47

    5. नहजुल बलाग़ा ख़त 27