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    नमाज़ की कहानियाँ

    नमाज़ की कहानियाँ
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    नमाज़ का अच्छा असर

    पैग़म्बरे इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे वा आलिहि वसल्लम) नमाज़ को जमाअत के साथ क़ायम करते थे। मदीने का रहना वाला एक मुसलमान हमेशा आप के नमाज़ जमाअत से पढ़ा करता था लेकिन उस के साथ साथ गुनाह भी करता था। एर बार किसी ने आप से उस आदमी की शिकायत की कि वह नमाज़ भी जमाअत से पढ़ता है और गुनाह भी करता है तो आपने फ़रमाया कि बेशक एक दिन यह नमाज़ उस को बुरे कामों से रोक देगी।

    उस नौजवान से सीख लेनी चाहिये

    जनाब सैयद मोहसिन जबले आमिली, जनाब सैयद जवाद, जो किताब मिफ़ताहुल करामत के लेखक हैं, के भाई के पोते हैं और उन का शुमार शियों के महान विद्धावों में होता है उन्होने दमिश्क़ में एक धार्मिक मदरसा बनाया था जिस में शियों के बच्चे उन की निगरानी और देखरेख में धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते थे।

    हाज सैयद अहमद मुसतफ़वी जो जो क़ुम के एक अच्छे व्यापारी थे, कहते हैं कि मैंने ख़ुद सैयद मोहसिन अमीन से सुना है वह फ़रमाते हैं कि हमारे मदरसे का शिक्षित एक छात्र, पढ़ाई के लिये अमेरिका गया था उस ने वहाँ से मुझे एक पत्र इस तरह से लिखा:

    कुछ दिनों पहले हमारे मदरसे के छात्रों की परीक्षा थी मैं भी परीक्षा देने गया, बहुत देर तक बैठा रहा कि मेरा भी नंबर आ जाये लेकिन बहुत देर हो गई जब मैंने देखा कि अगर ऐसे ही बैठा रहा तो नमाज़ कज़ा हो जायेगी, मैं नमाज़ पढ़ने के लिये वहाँ से उठा तो जो लोग वहाँ बैठे थे उन्होने मुझ से पूछा कहा जा रहे हो? तुम्हारा नंबर आने ही वाला है, मैंने कहा मेरे ऊपर एक धार्मिक ज़िम्मेदारी है अगर मैं उस को अंजाम नही दूँगा तो उस का समय बीत जायेगा। उन्होने कहा कि परीक्षा का समय भी निकल जायेगा और अगर तुम ने परीक्षा में भाग नही लिया तो फिर दोबारा परीक्षा नही दे पाओगे और तुम्हारी वजह से प्रबंधक दोबारा परीक्षा नही करायेगा। मैं ने कहा जो भी हो लेकिन मैं अपनी उस धार्मिक ज़िम्मेदारी को नही छोड़ सकता और वहाँ से उठ कर चला गया। जब मेरा समय नंबर आया तो उन लोगों को मालूम हो गया कि मैं अपनी धार्मिक ज़िम्मेदारी को पूरा करना गया हुआ हूँ तो उन्होने कहा कि जो इंसान अपने काम को अंजाम देने का इतना परिपक्व और ज़िम्मेदार है उस के काम में विलंब नही करना चाहिये।

    लिहाज़ा उन्होने मेरे इस काम की सराहना करने के लिये एक प्रोग्राम रखा मैंने उस में भाग लिया और मुझ से उस में परीक्षा ली गई।

    जनाब सैयद मोहसिन यह वाक़ेया सुनाने के बाद फ़रमाते हैं कि मैंने अपने मदरसे के बच्चों की इस तरह तरबीयत की है कि अगर वह दरिया में भी गिर जायें तो उन का दामन तर नही होगा।