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    नमाज़ के वक़्त में कज़ा की नियत से नमाज़ पढ़ना

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    सवालः अगर कोई इंसान यह समझते हुए की सुबह की नमाज़ का वक़्त ख़त्म हो गया है और वह क़ज़ा की नियत से नमाज़ पढ़ ले और ज़ुहर के वक़्त उसे पता चले कि नमाज़ कज़ा नहीं हुई थी तो जो उसने नमाज़ पढ़ी थी उसका क्या हुक्म है?

    जवाबः अगर उसने अपने मौजूदा फ़र्ज़ (कर्तव्य) को अंजाम देने की नियत से नमाज़ पढ़ी थी तो उसकी नमाज़ सही है। (यानि अगर उसने यह सोचते हुए कि अब तो नमाज़ क़ज़ा हो गई है और मुझ पर क़ज़ा वाजिब है, और इस नियत से नमाज़ पढ़ी फिर बाद में पता चाला कि नमाज़ क़ज़ा नहीं हुई थी तो उसकी नमाज़ जो उसने क़ज़ा की नियत से पढ़ी थी सही है)।