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    नमाज़ गुज़ार का लेबास

    नमाज़ गुज़ार का लेबास
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    (नमाज़ पढ़ने वाले का कपड़े)

    सवाल 425: जिस लेबास (कपड़े) के निजासत के बारे में शक है क्या उस में नमाज़ पढ़ना सही है?

    जवाब: जिस लेबास (कपड़े) के नजिस होने में शक हो वो पाक है और इस में नमाज़ सही है।

    सवाल 426: मैंने जर्मनी में चमड़े की एक बेल्ट ख़रीदी थी क्या उसको बांध कर नमाज़ पढ़ने में कोई शरई ऐतराज़ है? अगर मुझे ये शक है कि ये असली खाल की है या टचनुवी (नक़ली) और ये कि ये तज़किया शुदा हैवान की खाल है (हलाल जानवर की खाल है) या नहीं तो मेरी उन नमाज़ों का क्या हुक्म है जो मैंने इस में पढ़ी हैं?

    जवाब: अगर्चे शक हो कि ये असली खाल की है नहीं तो उसे बांधकर नमाज़ पढ़ने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन अगर असली खाल साबित होने के बाद ये शक हो कि वो तज़किया शुदा हैवान की खाल है (हलाल जानवर की खाल है) या नहीं? तो वो नजिस नहीं है लेकिन इस में नमाज़ सही नहीं है और (पिछली) गुज़श्ता नमाज़ें जो इस हुक्म से नावाक़फि़यत (ना जानने) की बिना पर पढ़ीं हैं इनकी क़ज़ा नहीं है।

    सवाल 427: अगर नमाज़ गुज़ार को ये यक़ीन हो कि उसके लेबास (कपड़े) व बदन पर निजासत नहीं है और वो नमाज़ बजा लाये और बाद में मालूम हो कि उसका बदन या लेबास (कपड़े) नजिस था तो उसकी नमाज़ बातिल है या नहीं?

    जवाब: अगर उसे अपने बदन या लेबास (कपड़े) के नजिस होने का बिल्कुल इल्म न हो और वो नमाज़ के बाद मुतवज्जेह हो (ध्यान दे) तो उसकी नमाज़ सही है और उस पर इआदा (दोबारह अदा करना) या क़ज़ा वाजिब नहीं है लेकिन अगर वो नमाज़ के दर्मियान उसकी तरफ़ मुतवज्जेह हो जाये और वो निजासत को बग़ैर ऐसा फ़ेल अंजाम देने (ऐसा काम करने) के जो नमाज़ के मुनाफ़ी (ख़िलाफ़) हैं दूर कर सकता हो या नजिस लेबास (कपड़े) को उतार सकता हो उसपर यही वाजिब है कि वो निजासत दूर करे या नजिस लेबास (कपड़े) उतार दे और अपनी नमाज़ तमाम करे लेकिन अगर नमाज़ की हालत को बाक़ी रखते हुए निजासत दूर नहीं कर सकता और वक़्त में भी गुंजाइश है तो नमाज़ तोड़ना और पाक लेबास (कपड़े) और बदन के साथ नमाज़ बजा लाना वाजिब है।

    सवाल: 428 एक शख़्स ने कुछ मुद्दत तक ऐसे हैवान (जानवर) की खाल में नमाज़ अदा करता रहा है जिस के पाक होने में शक था और जिस में नमाज़ अदा करना सही नहीं और पूरी तरह से ऐसे हैवान के बारे में क्या हुक्म है जिसके पाक होने में शक हो?

    जवाब: जिस जानवर के गोश्त में शक हो उसका गोश्त खाना हराम है, उसकी खाल में नमाज़ अदा करना जाएज़ नहीं है और उसका हुक्म वही है जो मुर्दार (मुर्दा जानवर) का हुक्म है लेकिन नजिस नहीं है और पिछली नमाज़ें अगर इस हुक्म से न जानने की बिना पर पढ़ी हों तो सही है।

    सवाल 429: एक औरत नमाज़ के दर्मियान अपने बालों को खुला हुआ महसूस करती है उस पर नमाज़ का दोबारह पढ़ना वाजिब है या नहीं?

    जवाब: जब तक जान बूझ कर बालों को ज़ाहिर न किया हो तो दोबारह वाजिब नहीं है।

    सवाल 430: एक शख़्स पेशाब के मक़ाम को मजबूरन कंकऱी, लकड़ी या किसी और चीज़ से पाक करता है जब घर लौटता है तो उसे पानी से पाक कर लेता है तो क्या नमाज़ के लिये अंदरूनी लेबास (कपड़े) (अण्डरवियर) का बदलना या पाक करना भी वाजिब है?

    जवाब: अगर पेशाब की रतूबत (बूंदो) से नजिस न हुआ हो तो उसका पाक करना वाजिब नहीं है।

    सवाल: 431 बैरूने मुल्क (बाहर मुल्कों) से जो कुछ सनअती आलात (पुरज़ों) (कार खानों के पुरज़े) मंगवाये जाते हैं वो उन ग़ैर मुल्की माहेरीन के ज़रिये फिट किये जाते हैं जो इस्लामी फि़क़ह के ऐतेबार से काफ़िर और नजिस हैं और ये मालूम है कि इन आलात (पुरज़ों) की फि़टिंग ग्रीस और दूसरे ऐसे मवाद के ज़रिये अंजाम पाती है कि जिसे हाथ के ज़रिये डाला जाता है, नतीजा ये है कि वह आलात (पुरज़ों) पाक नहीं रह सकते और काम के दौरान इन आलात (पुरज़ों) से कारीगरों का लेबास (कपड़े) और बदन टच होता है और नमाज़ के वक़्त मोकम्मल तौर से लेबास (कपड़े) व बदन को पाक नहीं कर सकते तो नमाज़ के सिलसिले में इनका फ़रीज़ा क्या है?

    जवाब: इस चीज़ के पेशे नज़र कि आलात (पुरज़ों) को फि़ट करने वाला काफ़िर अहले किताब में से हो जोकि पाक हैं या काम के वक़्त वो दस्ताना पहने हुए हों, सिर्फ़ इस बिना पर कि आलात (पुरज़ों) को काफ़िर ने लगाया है इनके नजिस होने का यक़ीन हासिल नहीं होता,बिलफ़र्ज़ अगर आलात (पुरज़ों) के नजिस और काम के दौरान में कारीगर के बदन या लेबास (कपड़े) तक पहुंचने वाली रतूबत के साथ इन आलात (पुरज़ों) के साथ टच (टच) होने का यक़ीन हो जाये तो नमाज़ के लिये बदन का पाक करना और लेबास (कपड़े) का पाक करना या बदलना वाजिब है।

    सवाल 432: अगर नमाज़ गुज़ार ख़ून से नजिस रूमाल या इस जैसी कोई नजिस चीज़ उठाए हुए हो या उसे जेब में रखे हुए हो तो उसकी नमाज़ सही है या बातिल?

    जवाब: अगर रूमाल इतना छोटा हो जिससे शर्मगाह न छुपा सके तो उसका नमाज़ के दौरान जेब में होने में कोई हर्ज नहीं है।

    सवाल 433: क्या उस कपड़े में नमाज़ सही है जो आजकल के ऐसे इत्र से मोअत्तर किया गया हो जिसमें अल्कोहल पाया जाता है?

    जवाब: जब तक मज़कूरा इत्र की निजासत का इल्म न हो उससे मोअत्तर कपड़े में नमाज़ पढ़ने में कोई हर्ज नहीं है।

    सवाल 434: हालते नमाज़ में औरत में बदन के कितने हिस्सों को छुपाना वाजिब है? क्या छोटी आसतीन वाले लिबास और मोज़े न पहनने में कोई हर्ज है?

    जवाब: मेयार ये है कि चेहरे का इतना हिस्सा जिसका वुज़ू में धोना वाजिब है और कलाई तक दोनों हाथों और टख़्नों तक दोनों पैरों को छोड़कर पूरे बदन को छुपाए चाहे ये छुपाना ईरानी चादर से ही हो।

    सवाल 435: क्या हालते नमाज़ में औरतों पर पांव के ऊपर वाले हिस्से को छुपाना वाजिब है या नहीं ?

    जवाब: अगर नामहरम न हो तो टख़नों तक पांव का छुपाना वाजिब नहीं है।

    सवाल 436: क्या हेजाब पहनते (पर्दा करते) वक़्त और नमाज़ में ठुरी को पूरी तरह से छिपाना वाजिब है या निचले हिस्से को ही छुपाना काफ़ी है और क्या ठुरी का इसलिये छुपाना वाजिब है कि वो चेहरे के उस हिस्से को छुपाने की शुरुआत है जो शरअन वाजिब है?

    जवाब: ठुरी का निचला हिस्सा छुपाना वाजिब है न कि ठुरी का छुपाना क्योंकि वो चेहरे का हिस्सा है।

    सवाल 437: क्या ऐसी नजिस चीज़ के साथ जो शर्मगाह को छुपाने के लिये सही नहीं है नमाज़ के सही होने का हुक्म सिर्फ़ इस हालत से मख़सूस है जब इंसान उसके हुक्म या मौज़ू के सिलसिले में भूल चूक या ना जानेन की बिना पर उस में नमाज़ पढ़ ले या फि़र ये शुब्हा-ए-मौज़ूई और शुब्हा-ए-हुक्मी दोनों को शामिल है?

    जवाब: ये हुक्म निसयान (भूल चूक) या न जानने से मख़सूस नहीं है बल्कि ऐसी नजिस चीज़ जो शर्मगाह को छुपाने के लिये काफ़ी नहीं है, तो जानने की सूरत में भी नमाज़ सही है।

    438: क्या नमाज़ गुज़ार के लेबास (कपड़े) पर बिल्ली के बाल या उसके लुआबे दहन (थूक) की मौजूदगी नमाज़ के बातिल होने का सबब है?

    जवाब: जी हां! नमाज़ के बातिल होने का सबब है।