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    नमाज़ में बदन का ढाँपना

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    (796) ज़रूरी है कि मर्द चाहे उसे कोई भी न देख रहा हो नमाज़ की हालत में अपनी शर्मगाहों को ढाँपे और बेहतर यह है कि नाफ़ से घुटनों तक बदन भी ढाँपे।

    (797) ज़रूरी है कि औरत नमाज़ के वक़्त अपना पूरा बदन हत्ता कि सर और बाल भी ढाँपे और एहतियाते मुस्तहब यह है कि पाँव के तलवे भी ढ़ाँपे। अलबत्ता चेहरे का जितना हिस्सा वुज़ू में धोया जाता है वह और कलाइयों तक हाथ और टख़नों तक पाँव का ज़हिरी हिस्सा ढांपना ज़रूरी नही है। लेकिन यह यक़ीन करने के लिए कि उसने बदन की वाजिब मिक़दार ढ़ाँप ली है ज़रूरी है कि चहरे के अतराफ़ का कुछ हिस्सा और कलाइयों से नीचे तक का कुछ हिस्सा भी ढाँपे।

    (798) जब इंसान भूले हुए सजदे या भुले हुए तशह्हुद की क़ज़ा बजाला रहा हो तो ज़रूरी है कि अपने आपको इस तरह ढाँपे जिस तरह नमाज़ के वक़्त ढ़ाँपा जाता है और एहतियाते मुस्तहब यह है कि सजदा-ए- सहव अदा करते वक़्त भी अपने आप को ढाँपे।

    (799) अगर इंसान जान बूझकर या मसला न जानने की वजह से ग़लती करते हुए नमाज़ में अपनी शर्मगाह न ढाँपे तो उसकी नमाज़ बातिल है।

    (800) अगर किसी इंसान को नमाज़ के दौरान पता चले कि उसकी शर्मगाह खुली है तो उसके लिए अपनी शर्मगाह को छुपाना ज़रूरी है लेकिन उस पर नमाज़ को दोबारा पढ़ना लाज़िम नहीं है। मगर एहतियात यह है कि जब उसे पता चले कि उसकी शर्मगाह नंगी है हो उसके बाद नमाज़ का कोई ज़ुज़ अंजाम न दे। लेकिन अगर उसे नमाज़ के बाद पता चले कि नमाज़ के दौरान उसकी शर्मगाह नंगी थी तो उसकी नमाज़ सही है।

    (801) अगर किसी इंसान का लिबास ख़ड़े होने की हालत में उसकी शर्मगाह को ढाँपले लेकिन मुमकिन हो कि दूसरी हालत में मसलन रूकू और सजदे की हालत में न ढाँपे, तो अगर शर्मगाह के नंगे होने के वक़्त उसे किसी ज़रिए से ढाँप ले तो उसकी नमाज़ सही है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस लिबास के साथ नमाज़ न पढे।

    (802) इंसान नमाज़ में अपने आपको फूंस और दरख़तों के (बड़े) पत्तों से ढाँप सकता है लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि इन चीज़ों से उस वक़्त ढांपे जब उसके पास कोई और चीज़ न हो।

    (803) अगर इंसान के पास मजबूरी की हालत में शर्मगाह को छुपाने के लिए कोई चीज़ न हो तो वह अपनी शर्मगाह की खाल को ज़ाहिर न होने से बचाने के लिए उसे गारे या ऐसी ही किसी दूसरी चीज़ से लेप पोत कर छुपा सकता है।

    (804) अगर किसी इंसान के पास कोई ऐसी चीज़ न हो जिससे वह नमाज़ में अपने आपको ढांपे और अभी वह ऐसी चीज़ मिलने से मायूस भी न हो तो बेहतर यह है कि नमाज़ पढ़ने में देर करे और अगर कोई चीज़ न मिले तो आख़िरी वक़्त में अपने वज़ीफ़े के मुताबिक़ नमाज़ पढ़े। लेकिन अगर वह अव्वले वक़्त में नमाज़ पढ़े और असका उज़्र आख़िर वक़्त में बाक़ी न रहे तो एहतियाते वाजिब यह है कि नमाज़ को दोबारा पढ़े।

    (805) अगर किसी ऐसे इंसान के पास जो नमाज़ पढ़ना चाहता हो, अपने बदन को ढांपने के लिए दरख़्तों के पत्ते, घास, गारा या दलदल न हो और आख़िर वक़्त तक किसी ऐसी चीज़ के मिलने से मायूस हो जिससे वह अपने आपको छुपा सके, तो अगर उसे इस बात का इत्मिनान हो कि कोई इंसान उसे नहीं देखेगा तो वह ख़ड़ा होकर उसी तरह नमाज़ पढ़े जिस तरह इख़्तियार की हालत में रुकू और सुजूद के साथ नमाज़ पढते हैं। लेकिन अगर उसे इस बात का एहतेमाल हो कि कोई इंसान उसे देख लेगा तो ज़रूरी है कि इस तरह नमाज़ पढ़े कि उसकी शर्मगाह नज़र न आये मसलन बैठ कर नमाज़ पढ़े या रुकू और सुजूद जिस तरह इख़्तेयारी हालत में अंजाम देते हैं इस तरह अंजाम न दे और उनको इशारे से बजा लाए और एहतियाते लाज़िम यह है कि नंगा इंसान नमाज़ की हालत में अपनी शर्मगाह को अपने बाज़ आज़ा के ज़रिए छुपाए मसलन बैठा हो तो दोनों रानों से और खड़ा हो तो दोनों हाथों से।