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    नया सवेरा

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    पृथ्वी इंतेज़ार में थी और आकाश बेचैन था। काबा ऐसी मूर्तियों से भरा पड़ा था जिन्हें लोगों ने बनाकर अनन्य ईश्वर का स्थान दे दिया था। अत्याचार, अज्ञानता, अंधविश्वास, और भ्रष्टाचार के हाथ में मनुष्य के जीवन की लगाम थी जो उन्हें अपनी ओर खींच रहे थे। ऐसी स्थिति में संसार एक मोक्षदाता की प्रतीक्षा में था जो ज़मीन पर न्याय स्थापित करे और उनके अंधेरे जीवन में मित्रता व भाइचारे का दीप जलाए।

    17 रबीउल अव्वल हिजरत से 53 वर्ष पूर्व बराबर 570 ईसवी को पूर्व ईश्वरीय दूतों की शुभसूचना व ईश्वर का वादा व्यवहारिक हुआ और ईश्वर ने सोई हुयी मानवता के सामने सर्वश्रेष्ठ अस्तित्व को भेजा। अंतिम ईश्वरीय दूत के रूप में हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा का सूर्य की भांति अरब की भूमि पर उदय हुआ ताकि सत्य की दबी हुयी आवाज़ को पूरे संसार तक पहुंचाए। इस अवसर पर फ़रिश्तों की आनंद से ओतप्रोत आवाज़ संसार के अंधकारमय वातावरण में गूंजी। ईरान में उस समय के अत्याचारी शासन की चूलें हिल गयीं और अरब में उदित सूर्य के सामने फ़ार्स का हज़ार वर्षीय अग्निकुंड बुझ गया। सावे झील अचानक सूख गयी कि जिसकी एक गुट पूजा करता था और काबे के भीतर मूर्तियां अचानक गिर पड़ीं। जी हां हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम का आगमन एक नए युग का आरंभ था तो ऐसा उदय बिना हलचल के नहीं होना चाहिए था। श्रोताओ! आप सबको एकेश्वरवाद व मानवता का संदेश लाने वाले पैग़म्बरे इस्लाम के शुभ जन्म दिवस की हार्दिक बधाइयां।

    पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सलल्म ने इस संसार के ऐसे समाज में आंख खोली कि जिसके अधिकांश सदस्य अंधविश्वास पर आधारित आस्था का पालन करते थे। वे लोग नाना प्रकार की मूर्तियों की पूजा के अलावा सितारों की भी पूजा करते थे। वे बेटी के अस्तित्व को अपने लिए क्लंक समझते थे और उसे बचपन में ही जीवित दफ़्न कर देते थे। कमज़ोरों व श्याम वर्ण के लोगों को दास बनाते थे और अपने विशेष क़ानून के आधार पर उन्हें नागरिक अधिकार से वंचित रखते थे। अरब के इस काल को जाहेलियत अर्थात अज्ञानता का काल कहा जाता है। यह वह काल था जब नैतिक व मानवीय मूल्य सबसे अधिक उपेक्षा का शिकार थे। जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने एक भाषण में इस्लाम से पूर्व अरब की स्थिति का इस प्रकार वर्णन करते हैः ईश्वर ने मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम को विश्वासियों को ईश्वरीय प्रकोप से डराने वाले के रूप में भेजा। उन पर अपनी किताब भेजी जबकि तुम अरब सबसे बुरे स्थानों में रहते थे और तुम्हारे क़ानून सबसे बुरे थे। चट्टानों में रहते थे, गंदा पानी पीते थे, खजूर की गुठली का आटा और गोह जैसे ख़राब खाने खाते थे। एक दूसरे का ख़ून बहाते थे, संबंधियों से दूर रहते थे, मूर्तियां पूजते थे और पाप करते थे।

    ऐसे लोगों के ग़लत वैचारिक आधारों को ढाना और उनके अज्ञानता भरे विचारों को बदलना बहुत कठिन काम है कि ऐसे काम के लिए बहुत ही संयमी, समझदार और शिष्टाचारिक गुणों से संपन्न व्यक्ति की आवश्यकता होती है। ईश्वर ने इस महा-अभियान और पूरे संसार में एकेश्वरवाद, न्याय और भाइचारे के प्रचार के लिए पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम को चुना और उन्होंने सौंपे गए दायित्व को बेहतरीन ढंग से अंजाम दिया।

    ऐतिहासिक दस्तावेज़ों व साक्ष्यों की गवाही के अनुसार पैग़म्बरे इस्लाम की महानता के लक्षण बचपन से ही इस प्रकार प्रकट हो गए थे कि कई यहूदी और ईसाई ज्योतिषियों ने आपको बचपन व युवावस्था में देख कर आप में पैग़म्बरी के चिन्ह की ओर संकेत किया था और पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों व संबंधियों को आपके उज्जवल भविष्य की शुभसूचना दी थी। ज्योतिषियों ने इस वास्तविकता को स्वीकार किया था कि मोहम्मद वही मोक्षदाता हैं जिनके आने के बारे में पहले वाले ईश्वरीय दूत शुभसूचना दे चुके थे और जो संसार को सुख व कल्याण से भर देंगे।

    पैग़म्बरे इस्लाम को बचपन से ही अधिक कठिनाइयां सहन करने व परिश्रम करने की आदत थी ताकि उनका व्यक्तित्व एक मज़बूत, संयमी और अनुभवी व्यक्ति का हो जाए। उन्होंने अपने जन्म के आरंभ में ही अनाथ होने की पीड़ा सहन की और बचपन से ही अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा। पैग़म्बरे इस्लाम बहुत परिश्रम करते थे और व्यापारिक यात्राओं के अनुभव ने उन्हें युवावस्था के आरंभ में ही परिश्रमी बना दिया था। उदाहरण स्वरूप अरब की चिलचिलाती गर्मी में भेड़-बकरियां चराना बहुत कठिन काम था किन्तु पैग़म्बरे इस्लाम ने यह काम भी किया। कुछ लोगों ने बाद में जब पैग़म्बरे इस्लाम से यह पूछा कि क्या आप युवावस्था में भेड़-बकरी चराते थे तो उन्होंने जवाब में कहाः कोई भी ईश्वरीय दूत नहीं भेजा गया मगर यह कि उसने पशु न चराये हों।

    इस्लाम धर्म में हलाल आजीविका कमाने और काम करने की आवश्यकता पर बहुत अधिक बल दिया गया है। इस संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लाम कहते हैः उपासना के 70 भाग हैं और इसका बेहतरीन भाग हलाल आजीविका कमाने से विशेष है।

    पैग़म्बरे इस्लाम की एक विशेषता ईश्वर से गहरी आस्था व प्रेम था। वह युवावस्था से ही अपना अधिकतर समय हेरा नामक पहाड़ की गुफा में ईश्वर की उपासना में बिताते थे। यह वही पहाड़ है जहां ईश्वरीय संदेश लाने वाले फ़रिश्ते जिबरईल पैग़म्बरे इस्लाम के पास उस समय ईश्वरीय संदेश लाए थे जब आपकी आयु चालीस वर्ष की थी।

    जिस गुण ने पैग़म्बरे इस्लाम को ईश्वरीय संदेश को सफलतापूर्वक पहुंचाने में सबसे बड़ा योगदान दिया वह आपका उत्तम शिष्टाचार और आपकी सहिष्णुता थी। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के सूरए क़लम में पैग़म्बरे इस्लाम के शिष्टाचार की ईश्वर इन शब्दों में प्रशंसा करता हैः निःसंदेह आप श्रेष्ठ शिष्टाचार के स्वामी हैं।

    यूं तो पैग़म्बरे इस्लाम का व्यक्तित्व सद्गुणों का केन्द्र था किन्तु कार्यक्रम के समय के दृष्टिगत उनमें से केवल कुछ का उल्लेख करेंगे।

    इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम पैग़म्बरे इस्लाम के व्यवहार के संबंध में कहते हैः पैग़म्बरे इस्लाम सदैव प्रफुल्लित, दयालु और नम्र रहते थे। उनका व्यवहार विनम्र था। न बुरी बात कहते और न ही कठोर शब्द प्रयोग करते थे। लोगों से एक दूसरे के साथ भलाई करने और मतभेद व फूट से बचने का आह्वान करते थे। जब भी किसी सभा में प्रविष्ट होते तो जहां भी ख़ाली जगह होती थी वहीं बैठ जाते थे और दूसरों से भी ऐसे ही शिष्टाचार की अनुशंसा करते थे। कभी किसी को अपने द्वार से ख़ाली हाथ नहीं लौटाते थे और ज़रूरतमंद की सहायता करने की सबसे अनुशंसा करते थे।

    पैग़म्बरे इस्लाम ईश्वर की ओर से ऐसा धर्म लाए जिसमें समानता व भाईचारा मूल सिद्धांत हैं। प्रेम व स्नेह के सिद्धांत के आधार पर मुसलमान इस्लाम की घनी छांव में आ गए और एकेश्वरवाद के आगे नत्मस्तक हो गए। अरब, ग़ैर अरब, श्याम वर्ण, ईरानी एवं अन्य जातियां पैग़म्बरे इस्लाम व अमर किताब क़ुरआन के अस्तित्व की कृपा से क़बायली द्वेष से दूर रहते हुए समरस्ता व शांति के साथ इस्लाम की छांव में एक हो गयीं।

    पैग़म्बरे इस्लाम, ईश्वरीय दूत का दायित्व संभालने के बाद सबसे अधिक नमाज़ पढ़ने पर बल देते थे। आपने नमाज़ को इस्लाम का आधार बताया और विशेष रूप से नमाज़ को उसके समय पर पढ़ने अर्थात अज़ान सुनते ही नमाज़ पढ़ने पर बहुत ज़ोर देते थे। श्याम वर्ण के अफ़्रीक़ा वासी हज़रत बेलाल इस्लाम अपनाने के बाद पैग़म्बरे इस्लाम के आदेश से इस्लाम के प्रथम मुअज़्ज़िन अर्थात पहले अज़ान देने वाले नियुक्त हुए। हज़रत बेलाल एक अनेकेश्वरवादी के यहां दास थे। जब भी हज़रत बेलाल अज़ान देते थे मुसलमान पंक्तियां बनाकर पैग़म्बरे इस्लाम के पीछे नमाज़ पढ़ने के लिए खड़े हो जाते थे। सामूहिक रूप से नमाज़ पढ़ना, इस्लामी एकता और वंदना का बहुत ही भव्य दृष्य प्रस्तुत करता है।

    पैग़म्बरे इस्लाम ने सभी से कहा था कि विशेष रंग या जाति या क़बीले को श्रेष्ठता प्राप्त नहीं है बल्कि इस्लाम के ध्वज के तले वह व्यक्ति अधिक श्रेष्ठ है जो ईश्वर से अधिक डरता है और अधिक धर्मनिष्ठ है। ईश्वर पवित्र क़ुरआन के सूरए हुजरात की आयत क्रमांक 13 में पूरे विश्व के लोगों को संबोधित करते हुए कहता हैः हे लोगो! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक महिला से पैदा किया और तुम्हें क़बीलों व जातियों में रखा ताकि एक दूसरे को पहचानो, बेशक! ईश्वर के निकट सबसे अच्छा व सम्मानीय वह है जो उससे सबसे अधिक डरता है और ईश्वर सर्वज्ञानी है।

    इस बात में संदेह नहीं कि पैग़म्बरे इस्लाम सर्वश्रेष्ठ व सबसे अधिक ईश्वर से डरने वाले हैं और उनका जीवन सत्य के खोजियों के लिए आदर्श है।

    रोमानिया के ईसाई शोधकर्ता, कॉन्सटैन्टिन वर्जिल गिओरगियो ने अपनी किताब में कि जिसके शीर्षक का हिन्दी अनुवाद हैः मोहम्मद ऐसे पैग़म्बर हैं जिन्हें फिर से पहचानना चाहिए, लिखते हैः इस बात में संदेह नहीं कि मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम सृष्टि के सबसे पवित्र, सर्वश्रेष्ठ, सर्व सम्मानीय एवं सबसे अधिक मूल्यवान अस्तित्व हैं। उन्होंने सबसे पवित्र परिवार में सबसे अच्छे रत्नों से सबसे उत्तम प्रवृत्ति वालों के बीच इस संसार में आंख खोली। उन्होंने मरुस्थल के हृदय में स्वच्छ व प्रकाशमय आकाश के नीचे, पवित्र गोदी में प्रशिक्षण पाया और युवावस्था तक पहुंचे। वे हज़रत इब्राहीम जैसे अपने पूर्वजों के दृष्टिकोण की छांव में अनेकेश्वरवाद व मूर्ति पूजा से दूर रहे और अपनी जागरुक चेतना में अनन्य ईश्वर पर ईमान लाए हैं।

    मोहम्मद सल्लल लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम अपने शिष्टाचार व अच्छे आचरण, करनी व कथनी में सच्चाई, पवित्रता, और ईमानदारी से अपने जीवन काल में अपने नगर व वतन के लोगों के बीच लोकप्रिय और सम्मान के पात्र बने। वह उस ऊंचाई तक पहुंचे कि जो सिर्फ़ उन्हीं के बस की बात है। कोई व्यक्ति विशेषताओं व सद्गुणों में उनके स्तर तक नहीं पहुंच सकता।