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    नहजुल बलाग़ा : ख़ुत्बा-27

    नहजुल बलाग़ा : ख़ुत्बा-27
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    नहजुल बलाग़ा : ख़ुत्बा-27
    जिहाद जन्नत के दरवाज़ों में से एक दरवाज़ा है। जिसे अल्लाह ने अपने खास बन्दों (दोस्तों) के लिये खोला है। यह पर्हेज़गारी का लिबास अल्लाह की मोह्कम ज़िरह और मज़बूत सिपर (ढ़ाल) है। जो उस से पहलू बचाते हुए उसे छोड़ देता है, ख़ुदा उसे ज़िल्लतो ख्वारी का लिबास पहना और मुसीबत व इब्तला की रिदा (चादर) उढ़ा देता है। और मदहोशी व ग़फ़लत का पर्दा उस के दिल पर छा जाता है। और जिहाद को ज़ाए व बर्बाद करने से हक़ उस के हाथ से ले लिया जाता है। ज़िल्लत उसे सहना पड़ती है। और इन्साफ़ उस से रोक लिया जाता है। मैंने इस क़ौम से लड़ने के लिये रात भी और दिन भी, अलानिया भी और पोशीदा भी तुम्हें पकारा, और ललकारा और तुम से कहा कि क़ब्ल इस के कि वह जंग के लिये बढ़ें तुम उन पर धावा बोल दो। ख़दा की क़सम ! जिन अफ़रादे क़ौम पर उन के घरों के हुदूद के अन्दर ही हमला हो जाता है वह ज़लीलो ख्वार होते हैं। लेकिन तुम ने जिहाद को दूसरों पर टाल दिया और एक दसरे की मदद से पहलू बचाने लगे। यहां तक कि तुम पर ग़ारत गरियां हुई और तुम्हारे शहरों पर ज़बरदस्ती क़ब्ज़ा कर लिया गया। इसी बनी ग़ामिद के आदमी (सुफ़्यान इब्ने औफ़) ही को देख लो। कि उस की फ़ौज के सवार (शहरे) अंबार के अन्दर पहुंच गए, और हस्सान इब्ने हस्साने बिक्री को क़त्ल कर दिया, और तुम्हारे मुहाफ़िज़ सवारों को सर्हदों से हटा दिया गया, और मुझे तो यह इत्तिलाआत भी मिली हैं कि इस जमाअत का एक आदमी मुसलमान और ज़म्मी औरतों के घर में घुस जाता था और उनके पैरों से कड़े (हाथों से) कंगन और गुलूबन्द और गोशवारे उतार लेता था, और उन के पास उस से हिफ़ाज़त का कोई ज़रिआ नज़र न आता था। सिवा इस के कि इन्ना लिल्लाहे व इन्ना इलैहे राजेऊन कहते हुए सब्र से काम लें, या ख़ुशामदे कर के उस से रहम की इलतिजा करें। वह लदे फंदे हुए पलट गए, न किसी के ज़ख्म लगा न किसी के खून बहा। अब अगर कोई मुसलमान इन सानिहात के बाद रंजो मलाल से मर जाए तो उसे मलामत नहीं की जा सकती बल्कि मेरे नज़दीक ऐसा ही होना चाहिये। अल अजब सुम्मा अल अजब !ख़ुदा की क़सम उन लोगों का बातिल (अधर्म) पर ऐका कर लेना और तुम्हारी जमईअत का मुन्तशिर हो जाना, दिल को मुर्दा कर देता है, और रंजो अन्दोह बढ़ा देता है। तुम्हारा बुरा हो, तुम ग़मो हुज़्न में मुब्तला रहो। तुम तो तीरों का अज़ख़ुद निशाना बने हुए हो, तुम्हें हलाक व ताराज किया जा रहा है मगर तुम्हारे क़दम हमले के लिये नहीं उठते। वह तुम से लड़ भिड़ रहे हैं और तुम जंग से जी चुराते हो। अल्लाह की ना फ़र्मानियां हो रही हैं और तुम राज़ी हो रहे हो। अगर गर्मियों में तुम्हें उन की तरफ़ बढ़ने के लिये कहता हूं तो तुम यह कहते हो कि इस इन्तिहाई शिद्दत की गर्मी का ज़माना है। इतनी मोहलत दीजिये कि गर्मी का ज़ोर टूट जाए, और अगर सर्दीयों में चलने के लिये कहता हूं तो तुम यह कहते हो कि कड़ाके के जाड़ा पड़ रहा है, इतना ठहर जाइये कि सर्दी का मौसम गुज़र जाए। यह सब सर्दी व गर्मी से बचने के लिये बातें है, जब तुम सर्दी और गर्मी से इस तरह भागते हो, तो फिर ख़ुदा की क़सम ! तुम तलवारों को देख कर उस से कहीं ज़ियादा भागोगे। ऐ मर्दों की शक्लो सूरत वाले नामर्दों ! तुम्हारी अक़्लें बच्चों की सी हैं, मैं तो यह ही चाहता था कि न तुम को देखता, न तुम से जान पहचान होती, ऐसी शनासाई (परिचय) जो निदामत (लज्जा) का सबब (कारण) और रंजो अन्दोह का बाइस बनी है। अल्लाह तुम्हें मारे ! तुम ने मेरे दिल को पीप से भर दिया है और मेरे सीने को ग़ैज़ो ग़ज़ब से छलका दिया है। तुम ने मुझे ग़मो हुज़्न (दुख व शोक) के जुरए (घूंट) पय दर पय पिलाए, ना फ़रमानी (अवज्ञा) कर के मेरी तदबीर (उपाय) व राय को तबाह (नष्ट) कर दिया। यहां तक कि क़ुरैश कहने लगे कि अली है तो मर्दे शुजाअ लेकिन जंग के तौर तरीक़ों से वाक़िफ़ नहीं।

    अल्लाह उन का भला करे, क्या उन में से कोई है, जो मुझ से ज़ियादा जंग की मुज़ाविलत रखने वाला और मैदाने वग़ा में मेरे पहले से कारे नुमायां किये हुए हो। मैं तो अभी बीस बरस का भी न था कि हर्बो ज़र्ब के लिये उठ खड़ा हुआ और, अब तो साठ से भी ऊपर हो गया हूं, लेकिन उस की राय ही क्या जिस की बात न मानी जाए।

    जंगे सिफ्फ़ीन के बाद मुआविया ने हर तरफ़ कुश्तो खून का बाज़ार गर्म कर रखा था और अमीरुल मोमिनीन के मक़बूज़ा शहरों पर जारेहाना इक़दामात शुरुउ कर दिये थे। चुनांचे इस सिलसिले में हीत, अंबार, और मदाइन पर हमला करने के लिये सुफ़्यान इब्ने औफ़े ग़ामिदी को छ : हज़ार की जम्ईयत के साथ रवाना किया। वह पहले तो हीत पहुंचा, मगर उसे खाली पा कर अंबार की तरफ़ बढ़ निकला। यहां पर अमीरुल मोमिनीन की तरफ़ से पांच सो सिपाहियों का एक दस्ता हिफ़ाज़त के लिये मुक़र्रर था। मगर वह मुआविया के उस लश्करे जर्रार को देख कर जम न सका। सिर्फ़ सौ आदमी अपने मक़ाम पर जमे रहे और उन्होंने, जहां तक मुम्किन था, डट कर मुक़ाबिला भी किया, मगर दुशमन की फ़ौज ने ऐसा मिल कर सख्त हमला किया कि उन के भी क़दम उखड़ गए और रईसे लश्कर हस्सान इब्ने हस्साने बिक्री तीस आदमीयों के साथ शहीद कर दिये गए। जब मैदाने जंग खाली हो गया तो दुश्मनों ने पूरी आज़ादी के साथ अंबार को लूटा और शहर को तबाहो बर्बाद कर के रख दिया। अमीरुल मोमिनीन को जब इस हमले की इत्तिलाअ मिली, तो आप मिंबर पर तशरीफ़ ले गए और लोगों को सरकोबी के लिये उभारा, और जिहाद की तअवत दी मगर किसी तरफ़ से सदाए, ”लब्बैक” बलन्द न हुई तो आप पेचो ताब खाते हुए मिंबर से निचे उतर आए, और उसी हालत में पियादा पा दुश्मन की तरफ़ चल खड़े हुये। जब लोगोंने यह देखा तो उन की ग़ैरतो हम्मीयत भी जोश में आई और वह भी पीछे पीछे हो लिये। जब वालिये नुखैला में हज़रत ने मनज़िल की, तो उन लोगों ने आप के गिर्द घेरा डाल लिया और ब इस्रार कहने लगे या अमीरुल मोमिनीन आप पलट जायें। हम फ़ौजे दुश्मन से निपट ने के लिये काफ़ी हैं। जब उन लोगों का इस्रार हद से बढ़ा तो आप पलटने के लिये आमादा हो गए और सईद इब्ने क़ैस आठ हज़ार की जम्ईयत के साथ उधर रवाना हो गए। मगर सुफ़्यान इब्ने औफ़ का लश्कर जा चुका था और सईद इब्ने क़ैस बे लड़े वापस आए। जब सईस कूफ़े पहुंचे, तो इब्ने अबिल हदीद की रिवायत के मुताबिक़ हज़रत रंजो अन्दोह के आलम में बाबुससिद्दह पर आकर बैठ गए और नासाज़िए तबीअत की वजह से यह ख़ुत्बा लिख कर अपने ग़ुलाम को दिया कि वह पढ़कर सुना दे। मगर मुबर्रद इब्ने आइशा से यह रिवायत किया है कि हज़रत ने यह खुत्बा मक़ामे नुखैला में एक बलन्दी पर खड़े हो कर इर्शाद फ़रमाया, और इब्ने सीसम ने इसी क़ौल को तर्जीह दी है।

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