islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 14

    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 14

    Rate this post

    राजकोष के न्यायपूर्ण विभाजन पर आधारित हज़रत अली अलैहिस्सलाम की शैली

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम कभी ऐसे ही कोई बात नहीं करते थे बल्कि जो कहते हैं उसपर बड़ी सूक्ष्मता से पालन करते थे। वे सदैव समाज के वंचित और सताए हुए वर्ग का समर्थन करते और समाज में भ्रष्टाचार, भेदभाव और अन्याय को प्रचलित होने से रोकते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सत्ता की बागडोर संभालने के बाद समाज में न्याय के आधारों को मज़बूत करने के लिए विशेष सुधार कार्यक्रम बनाए जिनमें राजकोष का न्यायप्रिय विभाजन भी शामिल था।

    राजकोष अर्थात बैतुल माल मुसलमानों के सार्वजनिक माल का ख़ज़ाना होता है जिसे समाज के हित के मार्ग में ख़र्च किया जाता है। इस्लाम धर्म के उदय होने और इस्लामी सरकार के गठित होने के बाद राजकोष के विषय को विशेष महत्त्व प्राप्त हो गया। पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही व सल्लम सार्वजनिक संपत्ति को लोगों में विभाजित करते थे और ज़कात अर्थात विशेष “कर” एकत्रित करने वालों से भी यह कहते थे कि ज़कात उन लोगों को दो जिन्हें आवश्यकता है। इन सबके बावजूद पैग़म्बरे इस्लाम सलल्लाहो अलैह व आलेही सल्लम के काल में वित्तीय स्रोत की कमी के कारण अधिक माल एकत्रित नहीं हो पाता था और राजकोष की रक्षा और उसके हिसाब किताब के लिए अधिक झंझट नहीं थी। धीरे धीरे इस्लामी विजय का दायरा विस्तृत होता गया और उसके परिणाम में बहुत अधिक माल व धन संपत्ति हाथ लगी। इस स्थिति में इस बात की आवश्यकता था कि एक केन्द्रीय संस्था का गठन किया जाए जो राजकोष की रक्षा और उसके हिसाब किताब की ज़िम्मेदारी संभाले। मुसलमानों के पहले अबू बक्र के शासन काल में आधिकारिक रूप से राजकोष का कार्यभार आरंभ हुआ। उसके बाद मुसलमानों के दूसरे ख़लीफ़ा उमर बिन ख़त्ताब के शासन काल में इस्लामी विजय का दायरा और विस्तृत हुआ और सरकारी व्यवस्था में वित्तीय प्रणाली में सुधार की अधिक आवश्यकता का आभास किया जाने लगा। इसीलिए राजकोष उसी काल में विस्तृत हुआ। जब तीसरे ख़लीफ़ा उसमान बिन अफ़्फ़ान सत्ता में पहुंचे तो उन्होंने अपने निकटवर्तियों विशेषकर बनी उमय्या के लोगों के लिए राजकोष के दरवाज़े खोल दिया और राजकोष से उन्हें अथाह धन संपत्ति दे डाली। यही कारण था कि इस्लाम समाज का वर्गभेद विस्तृत हो गया और समाज में मौजूद खाई और चौड़ी हो गयी और निर्धन और ही निर्धन हो गये और धनाड्य की तो बात ही छोड़ें।
    उसमान बिन अफ़्फ़ान के बाद जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सत्ता की बागडोर संभाली तो उन्होंने पैग़म्बरे इस्लाम की बहुत सी परंपराओं को जीवित करने और राजकोष सहित समाज की आर्थिक स्थिति को व्यवस्थित का प्रयास किया। यही कारण था कि उन्हें विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना हुआ क्योंकि राजकोष के वितरण में वे बराबरी को दृष्टिगत रखते थे। यह बात स्पष्ट है कि उस शैली को समाप्त करना कि लोग जिसके आदी हो गये थे, आसान काम नहीं है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम का ने समाज के वर्गभेद और उनके मध्य मतभेद को राजकोष के वितरण में कभी भी दृष्टिगत नहीं रखा और सभी मुसलमानों के मध्य चाहे वे अरब हों या ग़ैर अरब, श्यामवर्ण हो या श्वेतवर्ण, मुहाजिर हों या अंसार, बराबर की धन संपत्ति बांटते थे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपनी सरकार के आरंभिक दिनों में लोगों से इच्छा व्यक्त की थी कि वे अपना भाग लेने के लिए उपस्थित हों। हज़रत अली ने ख़ज़ाने के चौकीदार ओबैदुल्लाह बिन अबी राफ़ेअ से कहा कि मुहाजिरों से आरंभ करो और उन्हें यहां बुलाओ और हर एक को तीन दीनार दो, उसके बाद अंसार को बुलाओ और उनमें से भी हर एक को तीन दीनार दो और उसके बाद हर एक व्यक्ति को जो यहां आये चाहे श्यामवर्ण हो या श्वेतवर्ण, इतना ही देना।
    सहल बिन हुनैफ़ ने जिनके दास को भी इतना ही दीनार दिया गया, हज़रत अली के इस व्यवहार पर आपत्ति जताई और कहा कि यह व्यक्ति कल तक मेरा दास था और आज मैंने इसे स्वतंत्र कर दिया, मेरे जितना उसे भी दे रहे हैं? हज़रत अली ने कहा कि जितना उसे दिया है उतना ही तुझे भी दूंगा, हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सब को तीन दीनार दिया और उनमें किसी भी प्रकार के अंतर को स्वीकार नहीं किया। हज़रत अली अलैहिस्सला के न्यायपूर्ण वितरण के कारण जो लोग राजकोष को किसी विशेष गुट की जागीदारी समझते थे क्रोधित हो उठे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उनकी अप्रसन्नता के उत्तर में कहा कि ईश्वर की सौगंध, लूटे गये राजकोष को जहां कहीं से भी मिलेगा उसके मालिको तक पहुंचाऊंगा, यद्यपि उस माल से विवाह कर लिया हो और उसे अपनी पत्नी का मेहर कर दिया तो तब भी। क्योंकि न्याय का विस्तार सभी लोगों के लिए है और जिसे न्याय से कष्ट पहुंचता है और उसे परेशान करता है निश्चित रूप से अत्याचार उस पर अधिक तंग होगा।

    राजकोष के न्यायपूर्ण विभाजन में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ठोस शैली के कारण तलहा व ज़ुबैर, सईद बिन आस, वलीद बिन अतबा और अब्दुल्लाह बिन उमर जैसे लोगों ने आपत्ति जताई और विद्रोह कर दिया। इन लोगों ने अतीत में जारी ढर्रे के अनुसार राजकोष से अधिक धन की मांग की। इन लोगों ने राजकोष के इस प्रकार के विभाजन को देखकर हज़रत अली अलैहिस्सलाम के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का फ़ैसला किया। इसी मध्य हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कुछ निष्ठावान साथियों ने उन्हें यह सुझाव दिया कि अभी थोड़ा नर्मी दिखाएं और सरदारों को विशिष्टता दे दें ताकि आपकी सरकार के विरुद्ध विद्रोह न करें और कुछ गर्वनरों को उनके पदों पर बाक़ी रखें यद्यपि वे इसके योग्य न भी हो तब भी, यह क़बीले के प्रतिष्ठित लोग हैं, अपनी सरकार की सुदृढ़ता तक उनका ध्यान रखें और जैसे ही उचित अवसर हाथ लगे, उस समय अपना काम कर दीजिए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इन लोगों के उत्तर में कि जो यह चाहते थे कि राजकोष को बराबर विभाजित न करें और कुछ लोगों को अधिक और कुछ को कम दें, कहते हैं कि क्या आप लोग मुझसे चाहते हैं कि जो लोग मेरे अंतर्गत काम करते हैं उन पर अत्याचार करूं कि उन्हें अपना साथी बना लूं। ईश्वर की सौगंध जब तक दुनिया मौजूद है और एक तारे दूसरे तारे की परिक्रमा करते रहेंगे अर्थात जब तक यह दुनिया बाक़ी है, मैं यह काम नहीं करूंगा। यदि मेरा अपना माल होता तो उसे भी मैं बराबर वितरित करता, यह तो ईश्वर का माल है। वे एक अन्य स्थान पर तलहा व ज़ुबैर की आपत्ति के उत्तर में कहते हैं कि इस बारे में तुम लोगों की आपत्ति के आप में और अन्य मुसलमानों में मैंने बराबरी का बर्ताव क्यों किया, यह ऐसा आदेश नहीं है कि मैंने अपनी मर्ज़ी इसे जारी किया है और अपनी इच्छा के अनुसार इसका पालन कर रहा हूं, बल्कि मैं और आप यह जानते हैं कि यह वही आदेश है जो पैग़म्बरे इस्लाम लाए हैं और उसका क्रियान्वयन किया है।

    इमाम अली अलैहिस्सलाम ने राजकोष के विभाजन में किसी को किसी पर प्राथमिकता नहीं दी । हज़रत अली अलैहिस्सलाम राजकोष से स्वयं उतना ही माल लेते थे जितना अन्य लोगों को दिया करते थे और अधिकतर समय निर्धन लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने भाग को भी छोड़ देते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जमल नामक युद्ध के बाद बसरा के माल को बांटते समय स्वयं भी उतना ही माल लिया जितना अन्य लोगों को दिया था और जब उन्हें यह पता चला कि किसी व्यक्ति का नाम रह गया तो उन्होंने अपना भाग उसे दे दिया।
    इस्लाम की दृष्टि में धन संपत्ति, अन्य चीज़ों की भांति ईश्वरीय अमानत होती है जो सीमित लोगों के हवाले की गयी है। स्पष्ट है कि सार्वजनिक माल पर सभी लोगों का अधिकार होता है और उसकी रक्षा और उसके वितरण में बेहतरीन ढंग से न्याय और अमानदारी का ध्यान रखा जाना चाहिए क्योंकि ये माल हर एक मुसलमान से संबंधित होते हैं और दूसरी ओर ईश्वरीय अमानत होते हैं। यही कारण है कि राजको ष की रक्षा में सुस्ती से काम लेना और असावधानी बरतना, महा पाप समझा जाता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस बात पर विशेष रूप से ध्यान देते थे और बड़ी सूक्ष्मता से राजकोष को वितरित करते थे।

    प्रसिद्ध इतिहासकारों में से एक आसिम बिन कुलैब अपने पिता के हवाले से बयान करते हैं कि मैं हज़रत अली की सेवा में उपस्थित था कि ईरान के आसपास के क्षेत्र का कुछ माल निकाला गया। हज़रत अली अपने स्थान से उठे और कहने लगे कि सात क़बीलों के सरदार कहां हैं, (उस समय कूफ़े में सात मुसलमान क़बीले रहते थे और उनमें से हर एक के विशेष प्रतिनिधि मौजूद थे) हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने हर क़बीले के एक प्रतिनिधि को एक भाग दिया ताकि वे अपने क़बीले के मध्य बराबर विभाजित करें। अंत में थैली में एक रोटी बची। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा कि इस रोटी को सात भागों में विभाजित करो और हर एक प्रतिनिधि को एक एक टुकड़ा दे दे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के रोचक कार्यक्रमों में राजकोष के विभाजन में जल्दी करना था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम वर्ष के अंत तक माल के रखे जाने के विरोधी थे और उसे पैग़म्बरे इस्लाम की परंपरा से विरोधाभासी समझते थे। इस आधार पर वे इस व्यवहार में सुधार के प्रयास में थे। वे कहते थे कि पैग़म्बरे इस्लाम ने कोई भी माल एक दिन के लिए भी नहीं रोका और मैं भी वही काम करूंगा जो मेरे प्रिय पैग़म्बर ने किया था। राजकोष के विभाजन की प्रक्रिया में तीव्रता के बारे में उनके एक साथी का बयान है कि सूर्यास्त के समय कुछ माल हज़रत अली अलैहिस्सला के पास लाया गया, उन्होंने कहा इसको विभाजित कर दो, लोगों ने कहा कि हे अमीरल मोमेनीन बहुत दे हो गयी है, यह काम कल करा लिजिएगा। इमाम अली कहते हैं कि क्या तुम यह गैरेंटी देते हो कि कल तक मैं जीवित रहूंगा, उनसे कहा गया कि फिर क्या किया जाए? हज़रत अली ने कहा कि विलंब न करो, उस माल को विभाजित करो। उसके बाद वे मशाल लेकर आये और रात के अंधेरे में माल वितरित किया गया।

    हज़रतर अली अलैहिस्सलाम का सदैव यह प्रयास होता था कि कुछ लोगों के अधिकारों के हनन से धनाड्य लोगों को इसका लाभ न पहुंचने पाये ताकि समाज से निर्धनता और दरिद्रता का सफाया हो जाए और आय को समाज के सभी वर्गों में बराबर बांटी जाए।

    hindi.irib.ir