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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 16

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    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने निर्धनता के उन्मूलन के लिए बहुत कोशिश की ताकि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच खायी कम हो जाए। निर्धनता उन्मूलन का एक उपाया सार्थक रोज़गार का सृजन है।

    इस्लाम ने कार्य तथा लाभदायक क्षमता पर बहुत ज़ोर दिया है। इस्लाम में उन लोगों की प्रशंसा की गयी है जो हलाला आजीविका की प्राप्ति के लिए कोशिश करते हैं।
    इस्लाम की दृष्टि में जो लोग हलाल रोज़ी कमाने के लिए मेहनत करते हैं, वे ईश्वर के मार्ग में संघर्ष करने वालों का स्थान रखते हैं। इसके विपरीत सुस्त और ज़िम्मेदारियों से भागने वाले व्यक्ति को मूल्यहीन तथा ईश्वर की अनुकंपाओं से दूर बताया गया है। पवित्र क़ुरआन में ईश्वर ने अनेक आयतों में लोगों को कार्य करने एवं हलाल रोज़ी कमाने के लिए प्रेरित किया है। इसी संदर्भ में पैग़म्बरे इस्लमा और उनके पवित्र परिजनों के मूल्यवान कथन भी हैं जो कार्य की अहमियत को स्पष्ट करते हैं।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम का एक कथन है, “ तुममें से किसी व्यक्ति का मूल्य उस व्यक्ति से ज़्यादा नहीं है जो अपनी और अपने परिवार के सदस्यों की ज़रूरतों को पूरी करने के लिए कोशिश करे।”

    जैसा कि नहजुल बलाग़ा में भाषण नंबर 130 में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं, “ सख़्त कोशिश के लिए तय्यार रहो।” हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने कथनों में लोगों को कार्य के अच्छे परिणाम की ओर से आशावान बनाते हैं इस अर्थ में कि यदि कोई व्यक्ति ईश्वर पर भरोसे के साथ रोज़ी कमाने की कोशिश करे तो सफल होगा। इस सदंर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं, “ जो कोई रोज़ी कमाने के लिए गंभीर रूप से कोशिश करे तो ईश्वर उसे ऐसी जगह से रोज़ी देगा कि वह सोच भी नहीं सकता।” इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर कहते हैं, इस बात में शक नहीं कि जब तक व्यक्ति को अपने काम के फल मिलने की आशा न हो वह काम नहीं करेगा। एक दिन एक व्यक्ति ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को देखा कि वह खजूर की गुठलियों का बोझ लिए चले जा रहे हैं। उसने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से पूछा कि यह क्या है तो उन्होंने कहा कि यह यदि ईश्वर ने चाहा तो एक लाख खजूर के पेड़ होंगे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कास यह बयान इस अर्थ में है कि खजूर की ये गुठलियां कोशिश और सिंचाई से हरे भरे खजूर के बाग़ का रूप ले लेंगी।

    हर समाज में उत्पादनकर्ताओं का समर्थन किया जाना चाहिए ताकि वे आर्थिक चक्र को रूचि के साथ हरकत में लाएं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नज़र में लोगों की आय जितनी ज़्याद होगी सरकार के पास उसी तुलना में आय अधिक होगी और कोई राष्ट्र जिस सीमा तक निर्धन होगा उसी तुलना में सार्वजनिक क्षेत्र भी निर्धनता का शिकार होगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम समाज के विभिन्न वर्गों से कर वसूली के संबंध में मिलके अश्तर से कहते हैं, “ उन्हें टैक्स में छूट देना तुम्हे भारी न लगे क्योंकि तुम्हारी ओर से दी गयी छूट उस जमा पूंजी के समान है जो तुम्हारे शहरों के विकास के साथ तुम्हार पास लौट आएगी। जनता तुम्हारी सराहना करेगी और तुम लोगों के बीच न्याय की स्थापना से लोकप्रिय बन जाओगे।”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उद्योगपतियों पर भी विशेष ध्यान दिया है। वह पत्र संख्या 53 में मालिके अश्तर से कहते हैं, “ उद्योगपतियों के संबंध में मेरी अनुशंसा पर अमल करो और उनके संबंध में अपने अधीन अधिकारियों को बताओ चाहे वे शहर में हों या गांव में या वह अपनी पूंजि के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान का सफ़र करते हों। इन लोगों की अनदेखी न करो क्योंकि व्यापारी और उद्योगपति, लोगों की संपन्नता, सुरक्षा और लाभ का माध्यम हैं। ”

    कभी संभव है कि व्यापारी जानबूझ कर या ग़लती से व्यापार के नियमों का उल्लंघन करे जैसे जमाख़ोरी या माले में मिलावट करे या ब्याज वसूल करे।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने लोगों ख़ास तौर पर व्यापारिक वर्ग से व्यापार के नियमों को सीखने व समझने की अनुशंसा की है।

    वह कहते हैं, “ हे व्यापारियों पहले व्यापार के नियमों को सीखो फिर व्यापार करो। ईश्वर की सौगंद इस उम्मत में ब्याज का चलन पत्थर पर चलते समय चीं टी की न दिखायी देने वाली चाल से भी ज़्यादा छिप कर होगा। ”
    विभिन्न व्यवसाय के लोगों से अपने काम की गुणवत्ता पर ध्यान देने पर बल देते हुए कहते हैं, “ कभी किसी काम को जल्दी ख़त्म करने की कोशिश मत करो, अपने काम को अच्छी तरह करो क्योंकि लोग यह नहीं पूछते कि कितने समय में किया है बल्कि वे काम की गुणवत्ता के बारे में पूछते हैं।”

    कुछ लोग यह सोचते हैं कि व्यक्ति का व्यवसाय उसकी सामाजिक स्थिति के अनुकूल होना चाहिए और यदि कोई मज़दूरी हासिल करने के लिए काम करे तो उसकी सामाजिक स्थिति ख़राब होती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नज़रत में व्यक्ति की विशिष्ट सामाजिक स्थिति कार्य करने के सिद्धांत से न तो विरोधाभास रखती है और न ही दूसरों क लिए काम करने से उसकी सामाजिक स्थिति ख़राब होती है। संपूर्ण व परिपूर्ण व्यक्ति हज़रत अली अलैहिस्सलाम कभी कभी दूसरों का काम मज़दूरी पर करते थे। वास्तव में सार्थक व लाभदायक कार्य करना उनके आचरण का भाग था। वह ख़ुद कहते हैंख, “ एक दिन मैं मदीने में बहुत भूखा था। मदीने की गलियों में काम ढूंढ रहा था कि एक महिला को देखा जिसने कुछ मिट्टी के ढेले इकट्ठा कर रखे थे जिसे वह भिगोना चाहती थी। मैंने उससे हर डोल पानी के बदले में एक खजूर की मज़दूरी का मामला तय किया। मैं सोलह डोल पानी लाया और उसने मुझे सोलह खजूरें दीं। मैं खजूरें लेकर पैग़म्बरे इस्लाम की सेवा में पहुंचा और दोनों ने मिल कर खजूरें खायीं।”

    बेरोज़गारी इतिहास के विभिन्न काल में रही है। इस समय भी बहुत से समाजों में यह समस्या मौजूद है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कार्य करने के संबंध में कहते हैं, “ जो व्यक्ति सुस्ती करता है वह अपने और दूसरों के अधिकारों का हनन करता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम सुस्ती को नापसंद करते थे और लोगों को मेहनत व कोशिश के लिए प्रेरित करते और उन्हें हतोत्साहित तथा निठल्लेपन से दूर रहने की अनुंशसा करते कि इनके कारण निर्धनता आती है। इस संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं “ कार्य करने में कठिनाई हो सकती है किन्तु निठल्लापन भ्रष्टाचार व बर्बादी का स्रोत है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम खेती, बाग़बानी, और क़नाते अर्थात भूमिगत पानी की आपूर्ति करने वाली नहर की खुदायी का काम किया करते थे। वह इतना ज़्यादा शारीरिक काम करते थे कि उनके हाथ फट जाता था। उन्होंने अपने हाथों से बहुत से कुएं और क़नातें बनायीं कि इनमें से कुछ क़नातों के नाम का उल्लेख इतिहास की किताबों में मिलता है।

    बेरोज़गारी का एक कारण वैराज्य जीवन भी है। कुछ लोग एकान्तवास की ओर रुझान के कारण जीवन में संपन्नता से वंचित हो जाते हैं और परिणाम स्वरूप जीवन की कम से कम सुविधाओं में ज़िन्दगी गुज़ारते हैं। जबकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नज़र में परलोक व ईश्वर की प्रसन्नता के लिए कर्म और जीवन के मामलों की ओर ध्यान देने के बीच कोई विरोधाभास नहीं है।

    एक दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम बसरा में अपने एक बीमार साथी अला बिन ज़्याद हारेसी को देखने उनके घर गए। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उनके विशाल घर को देखा तो उनसे कहा कि इस विशाल घर से परलोक में विशाल घर हासिल किया जा सकता है इस शर्त के साथ कि इस घर में मेहमान रखो संबंधियों के साथ अच्छा व्यवहवार करो और उन कर्तव्यों को पूरा करो जत ईश्वर ने तुम पर अनिवार्य किए हैं। ऐसी स्थिति में इस घर से परलोक में घर हासिल कर सकोगे। अला बिन अली ज़्याद ने कहा, “ हे अमीरुल मोमेनीन मैं अपने भाई आसिम की आपसे शिकायत करना चाहता हूं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पूछा कि क्या बात है? अला बिन ज़्याद ने कहा कि आसिम पुराना कपड़ा पहनता है और वैराग्य जीवन अपना लिया है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने आसिम को बुलवाया और उससे कहा, “ अपने बच्चों और बीवी पर दया करो! तुम्हें लगता है कि जिन चीज़ों को ईश्वर ने तुम्हारे लिए हलाल किया है उनके प्रयोग से ईश्वर नाराज़ होगा? तुम ईश्वर के निकट इतने छोटे हो कि वह तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार करे। यह सुनकर आसिम ने कहा कि अमीरुल मोमेनीन आपका पीना तो मुझसे भी ज़्यादा सादा है तो फिर मुझे आप क्यों सांसारिक मामलों के लिए क्यों आदेश दे रहे हैं? हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कहा,“ अफ़सोस है तुम पर! मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं। क्योंकि ईश्वर पर न्यायी शासक पर अनिवार्य किया है कि वह निर्धन लोगों के जैसा जीवन जिएं ताकि निर्धन को निर्धनता सहन करना मुश्किल न हो और साहस न हार जाए। जबकि तुम अपने और अपने परिवार के ज़िम्मेदार हो। अपने और अपने परिवार को सुख पहुंचाने के लिए कोशिश करो और साथ ही धार्मिक व परलोक के मामलों पर भी ध्यान दो। ”

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