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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 23

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    हज़रत अली अलैहिस्सलाम, मानवीय गुणों व विशेषताओं का स्रोत थे। उनका प्रशिक्षण पैग़म़्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने किया था और उन्होंने उनसे मूल्यवान पाठ सीखे थे। ईश्वर पर ईमान और ईश्वरीय शिक्षाएं इस प्रकार हज़रत अली के अस्तित्व में पैठ कर गई थीं कि पैग़म्बर की पत्नी हज़रत आएशा, उनके बारे में कहती हैं कि ईश्वर ने हज़रत अली से अधिक किसी को भी पैग़म्बर के निकट प्रिय नहीं बनाया। आइये देखते हैं कि मानवीय प्रतिष्ठा के संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के क्या विचार हैं।

    मानवीय प्रतिष्ठा और मनुष्य के स्थान के बारे में हज़रत अली के विचार, क़ुरआने मजीद की आयतों और पैग़म़्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम की शिक्षाओं का प्रतिबिंबन करते हैं। ईश्वर ने क़ुरआने मजीद में मनुष्य की प्रतिष्ठा व महत्व के बारे में स्पष्ट रूप से बात की है। हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की रचना के संबंध में सूरए बक़रह की तीसवीं आयत में ईश्वर फ़रिश्तों से कहता है कि मैं धरती में अपना उत्तराधिकारी बनाने वाला हूं। यद्यपि आरंभ में फ़रिश्तों को इस पर आश्चर्य हुआ किंतु मनुष्य की क्षमताओं और गुणों को देखने के बाद उसकी श्रेष्ठता उनके लिए स्पष्ट हो गई। इसी लिए ईश्वर ने फ़रिश्तों को आदेश दिया कि उसने मनुष्य को जो प्रतिष्ठा प्रदान की है उसके कारण वे उसके समक्ष नतमस्तक हो जाएं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के पहले भाषण में इस वास्तविकता का इस प्रकार वर्णन करते हैं। फिर ईश्वर ने फ़रिश्तों को आदेश दिया कि वे अपना दायित्व पूरा करें और जो काम उनसे कहा गया है वह करें। इस प्रकार से कि आदम के लिए सजदा करें और उनके सम्मान के आगे झुकें। इस आदेश से ईश्वर ने अपने फ़रिश्तों को आज़माया। सभी ने सजदा किया, केवल शैतान ने इस ईश्वरीय आदेश की अवहेलना की। वस्तुतः शैतान ने अपने अहं व घमंड के कारण, मनुष्य की प्रतिष्ठा की अनदेखी की और सृष्टि के रचयिता से बहस कर बैठा।

    मनुष्य, सृष्टि का उत्कृष्ट नमूना है। हज़रत अली इस संबंध में कहते हैं। फिर ईश्वर ने मनुष्य के मिट्टी से बने ढांचे में अपनी आत्मा फूंकी, उसे मनुष्य का चेहरा प्रदान किया और उसे सोचने-समझने की क्षमता दी ताकि वह सत्य और असत्य को सही ढंग से पहचान सके। वास्तव में अन्य जीवों पर मनुष्य की श्रेष्ठता का रहस्य उसकी निजी प्रतिष्ठा व सोच-विचार की शक्ति या बुद्धि है जो किसी भी अन्य जीव को नहीं दी गई है। इसी शक्ति के माध्यम से मनुष्य भलाई व बुराई को अलग-अलग समझ लेता है। रोचक बात यह है कि ईश्वर, इस प्रकार की रचना की सृष्टि करके स्वयं को सर्वोत्तम रचयिता कहता है और उसने किसी भी जीव यहां तक कि फ़रिश्तों की सृष्टि में अपने लिए इस प्रकार के नाम का प्रयोग नहीं किया है। क़ुरआने मजीद सूरए मोमिनून की 14वीं आयत में मनुष्य की रचना और मिट्टी से उसे बनाए जाने का वर्णन करता है और फिर माता के पेट में भ्रूण के विकास के चरणों की ओर संकेत करता है, यहां तक कि वह एक संपूर्ण मनुष्य में बदल जाता है। इस आयत के अंत में ईश्वर अपनी प्रशंसा करते हुए कहता हैः तो प्रशंसा का पात्र है वह ईश्वर जो सबसे उत्तम रचयिता है।

    ईश्वरीय अनुंकपाएं सार्वजनिक हैं और उसने बिना किसी उपकार के अपनी अनुकंपाएं सभी मनुष्यों को प्रदान की हैं। मनुष्य भी अपने पालनहार की भांति, प्रतिष्ठावान है। क़ुरआने मजीद के सूरए इसरा की 70वीं आयत में कहा गया है। और निश्चित रूप से हमने आदम की संतान को प्रतिष्ठा प्रदान की है। सारे ही मनुष्यों को एक ही प्रकार की प्रतिष्ठा प्रदान की गई है। वस्तुतः मनुष्य, इसी कारण से कि वे मनुष्य हैं, प्रतिष्ठा का पात्र बने हैं किंतु एक प्रकार की प्रतिष्ठा वह है जिसे मनुष्य अपने संकल्प व प्रयास से प्राप्त कर सकता है। वह मनुष्य जो अपने आप को नैतिक अवगुणों से पवित्र करने और चारित्रिक गुणों को प्राप्त करने की कोशिश करता है तथा ज्ञान की प्राप्ति एवं संसार व संसार के रचयिता की पहचान के मार्ग में क़दम बढ़ाता है, इस प्रकार की प्रतिष्ठा का पात्र बनता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा में अपने सुपुत्र इमाम हसन अलैहिस्सलाम को लिखे गए एक विस्तृत पत्र में कहते हैं। अपने आपको हर प्रकार के बुरे काम से रोको चाहे वह काम तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य तक ही क्यों न पहुंचा दे क्योंकि इस कारण तुम्हारी जितनी प्रतिष्ठा चली जाएगी, उतना मूल्य तुम प्राप्त नहीं कर सकते।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने नहजुल बलाग़ा में हर स्थान पर समानता, न्याय, स्वतंत्रता, आत्म सम्मान जैसे सिद्धांतों की बात करके मानव प्रतिष्ठा की झांकियां प्रस्तुत की हैं और मुसलमानों से कहा है कि वे इस प्रतिष्ठा की प्राप्ति और उसकी रक्षा के लिए प्रयासरत रहें तथा प्रतिष्ठित लोगों से जुड़े रहें। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के पत्र क्रमांक 53 में अपने साथी मालिके अश्तर को, जिन्हें उन्होंने मिस्र का राज्यपाल बना कर भेजा था, आपने आदेश में प्रतिष्ठित लोगों से संपर्क व सहयोग पर बल देते हुए कहते हैं। तो उन लोगों से अधिक संपर्क रखो जिनका वंश अच्छा हो, जो भले घरानों से संबंध रखते हों और जिनका अतीत अच्छा हो। फिर उन लोगों से संपर्क रखो जो साहसी हों, योद्धा हों, और दानशीलता व उदारता के स्वामी हों कि ये लोग भलाई व उदारता के संगम और अच्छाई के अंश व शाखा होते हैं।

    मनुष्य की प्रतिष्ठा और आत्म सम्मान, उसके अस्तित्व के मूल्यवान रत्न हैं और किसी भी स्थिति में इन्हें क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए किंतु कुछ बुरे कर्म मनुष्य की प्रतिष्ठा और सम्मान को आघात पहुंचाते हैं। चापलूसी और चाटूकारिता उन्हीं में से है। चापलूसी, प्रतिष्ठा के ठीक विपरीत है। यह शासकों को अहंकारी बनाती है और सच बोलने और अपना हक़ मांगने को कठिन बना देती है। यही कारण है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी शासन व्यवस्था में सदैव ही राज्यपालों व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को सिफ़ारिश करते थे कि अपने निकटवर्ती लोगों का इस प्रकार प्रशिक्षण करो कि वे तुम्हारी सराहना न करें और अकारण तुम्हें प्रसन्न करने का प्रयास न करें।

    हज़रत अली जब सिफ़्फ़ीन नामक युद्ध के लिए इराक़ के अलअंबार नगर से अपने कुछ साथियों के साथ गुज़र रहे थे उस नगर के लोग अपने रिवाज के अनुसार उनके स्वागत के लिए आए और उनके आगे आगे दौड़ने लगे। उन्होंने इसका कारण पूछा तो उन लोगों ने कहा कि हम इस कार्य द्वारा अपने शासक की महानता का प्रदर्शन करते हैं। हज़रत अली ने उन्हें इस कार्य से रोकते हुए कहा कि ईश्वर की सौगंध! इस कार्य से तुम्हारे शासकों को कोई लाभ नहीं हुआ और तुमने इससे अपने आपको संसार में कठिनाई में डाला और प्रलय में इसी के कारण घाटा उठाओगे।

    मानवीय प्रतिष्ठा के लिए जो बातें ख़तरा समझी जाती हैं उनमें भौतिक व आर्थिक मामले भी शामिल हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने सरकारी अधिकारियों को सिफ़ारिश करते थे कि कर या इसी प्रकार के अन्य पैसों को एकत्रित करने के लिए किसी भी मनुष्य के साथ, चाहे वह मुसलमान हो या ग़ैर मुसलमान, हिंसक रवैया न अपनाएं और उसके सम्मान की रक्षा करें। मानवीय प्रतिष्ठा के संबंध में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत समानता का है और दूसरे शब्दों में मानवीय प्रतिष्ठा को व्यवहारिक बनाने के लिए समानता अपरिहार्य है। सभी मनुष्य, मानव जाति का सदस्य होने के नाते सम्मानीय हैं और क़ानून की दृष्टि से सभी को समान अधिकार प्राप्त हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम समाज के सभी लोगों के समान होने और उनके बीच भेद-भाव न किए जाने पर अत्यधिक बल देते थे।

    उनके इसी दृष्टिकोण के कारण कभी कभी सांसारिक मायामोह में ग्रस्त लोग उनसे दूर हो जाया करते थे। फ़ुज़ैल इब्ने जअद हज़रत अली की इस विशेषता के बारे में कहते हैं। कुछ बड़े व महत्वपूर्ण लोगों द्वारा मुआविया के मुक़ाबले में हज़रत अली का साथ छोड़ देने का मुख्य कारण आर्थिक मामले थे क्योंकि हज़रत अली, अरब को ग़ैर अरब पर, मालिक को दास पर और धनवान को दरिद्र पर प्राथमिकता नहीं देते थे और क़बीलों के सरदारों से उस प्रकार नहीं मिलते थे जिस प्रकार राजा मिला करते थे। वे किसी को भी उपहार या पैसे देकर अपनी ओर लाने का प्रयास नहीं करते थे जबकि मुआविया इसके बिलकुल विपरीत करता था और इसी कारण बहुत से लोग हज़रत अली को छोड़ कर मुआविया के साथ हो गए थे।

    इस्लाम में मानवीय प्रतिष्ठा का सम्मान एक मूल सिद्धांत है और किसी को भी यह अधिकार नहीं है कि वह किसी भी बहाने से इस सिद्धांत को पैरों तले रौंद दे। यह बात धार्मिक अल्पसंख्यकों के संबंध में भी लागू होती है जैसा कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ग़ैर मुस्लिमों व धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ जो भी संधि करते थे उनमें सदैव मानवीय प्रतिष्ठाओं और नैतिक मूल्यों की रक्षा पर बल देते थे। ज़ोरोस्ट्रियन या पारसी समुदाय के साथ उनकी संधि में प्रेम, स्नेह व सहिष्णुता पूर्ण रूप से स्पष्ट है। इस संधि में, जो वर्ष 39 हिजरी क़मरी में और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के हाथों लिखी गई है, पारसियों की जान, माल व सम्मान की रक्षा और इसी प्रकार उनकी धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी दी गई है। इस संधि में सभी को आम क्षमा का पात्र बनाने के साथ ही उनके मुक़द्दमों का निपटारा स्वयं उन्हीं के क़ानूनों के अंतर्गत किए जाने पर बल दिया गया है।

    सन 40 हिजरी क़मरी में ईसाइयों के साथ की गई एक अन्य संधि में नैतिक सिद्धांतों का पालन पूर्ण रूप से स्पष्ट है। इस संधि में उन्हें सद्कर्म करने और नैतिक मूल्यों तथा मानवीय प्रतिष्ठा की रक्षा की सिफ़ारिश करते हुए बुरे कर्मों से रोका गया है। इस संधि में ईसाइयों को सुरक्षा तथा जान, माल व सम्मान की रक्षा जैसी विशिष्टता दी गई है और इसी के अंतर्गत धार्मिक संस्कारों की स्वतंत्रता भी आती है। संधि में ईसाइयों के धर्मगुरुओं के सम्मान, उनके उपासना स्थलों की रक्षा और संधि के पालन जैसी बातों पर बल दिया गया है।

     

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