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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली(अ.) के विचार – 25

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    तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय का शब्द इस्लामी शिक्षाओं में बहुत प्रचलित है । तक़वे का शाब्दिक अर्थ है स्वयं की रक्षा बचना और दूर रहना। मनुष्य में तक़वे की स्थिति पैदा होते ही वह ईश्वरीय दंड से भयभीत हो जाता है और हर उस चीज़ से दू रहता है जो ईश्वर को पसंद नहीं है। मनुष्य को ईश्वर की जितनी अधिक पहचान होगी उसमें तक़वे का प्रभाव और स्तर उतना ही अधिक होगा। जो मनुष्य ईश्वर को पहचानता है और उसे अपने हर काम पर नज़र रखने वाला समझता है, वह अपने कर्म और व्यवहार यहां तक कि अपने विचारों को नियंत्रण में रखता है और उस पर ध्यान देता है। वह प्रयास करता है कि किसी भी स्थिति में उससे ऐसा कोई काम न हो जाए जिसका ईश्वर ने आदेश न दिया हो और जो कुछ ईश्वर की प्रसन्नता का कारण बने, उसे अंजाम दे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के मूल्यवान बयानों में जितना महत्त्व तक़वे के विषय को दिया गया है उतना किसी अन्य विषय को नहीं दिया गया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की दृष्टि में तक़वा, मनुष्य की सबसे उत्तम और मूल्यवान विशेषता है। जो कोई भी परलोक में सफलता और कल्याण चाहता है उसे तक़वे का वस्त्र धारण करना होगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने मूल्यवान भाषणों में पवित्रता के अनगिनत लाभ और प्रभाव बयान करते हैं। वे नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक 198 में कहते हैं कि तक़वा, तुम्हारी आत्मा के दर्दों का उपचार है, हृदय का प्रकाश और तुम्हारे शरीर के दर्दो की दवा, जानों के घाव का मरहम, आत्मा की गंदगियों को साफ़ करने वाला, तुम्हारे अंधेरों को प्रकाशमयी करने वाला। जिसने तक़वे का वस्त्र धारण कर लिया, उससे समस्याएं दूर हो गयीं, कड़ुवाहटें मिठास में बदल गयीं और समस्याओं का दबाव उससे दूर हो गया। ईश्वरीय अनुकंपाएं नीचे बैठने के बाद फिर से उबाल खाती हैं और कम हो चुकी विभूतियां , बढ़ जाती हैं।

    मनुष्य में तक़वा अर्थात ईश्वरीय भय की स्थिति के बढ़ने से उसके ऊपर पड़ी आत्ममुग्धता की धूल छट जाती है और उसका अस्तित्व नैतिक बुराईयों से साफ़ हो जाता है। तक़वे के महत्त्वपूर्ण लाभों में से एक यह है कि यह मनुष्य को बुराई से सच्चाई और ग़लत से सही की पहचान की शक्ति प्रदान करता है। इसीलिए तक़वे के आभूषण से सुसज्जित मनुष्य, बेहतरीन ढंग से, बुराई से अच्छाई और असत्य से सत्य को पहचान सकता है। जब मनुष्य के अस्तित्व पर आंतरिक इच्छाओं का राज हो जाता है और आत्ममुग्धता व ईर्ष्या उसे जकड़ लेती है और वह वास्तविकताओं की पहचान से दूर हो जाता है। इसीलिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम सिफ़ारिश करते हुए कहते हैं कि ईश्वर से डरो, यद्यपि कम ही क्यों न हो, क्योंकि ईश्वर पर ध्यान और दिल की सफ़ाई व पवित्रता, यद्यपि कम ही क्यों न हो, किसी सीमा तक मनुष्य की अध्यात्मिक क्षमताओं के विकास व प्रशिक्षण की भूमिका समतल करता है। निसंदेह ईश्वरीय भय, मनुष्य को परिवर्तित कर देता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस परिवर्तन को इस प्रकार बयान करते हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर के मार्ग पर चलता है, अपनी बुद्धि को जीवित करता है, अपनी आंतरिक इच्छाओं का गला घोंटता है, यद्यपि उसके शरीर में संघर्ष का प्रभाव दिख जाता है, उसका गठीला शरीर कमज़ोर हो जाता है और उसकी नैतिक हिंसा नर्म हो जाती है, उसके लिए एक प्रकाशमयी दीप जल उठता है और उसके लिए मार्ग को प्रजवलित करता है और उसी सही मार्ग पर ले जाता है और एक द्वार से दूसरे द्वार पर ले जाता है ताकि स्वस्थ्य और अमर स्थान पर पहुंचा सके, यह उसका पारितोषिक था जिसने अपने हृदय का सही प्रयोग किया और अपने ईश्वर को प्रसन्नचित किया।

    तक़वा मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है और उसे समस्याओं व परेशानियों से मुक्ति दिलाता है। निसंदेह जो ईश्वर से डरता है, ईश्वर उसे न केवल समस्याओं में ग्रस्त नहीं छोड़ता बल्कि समस्याओं के समय उसकी सहायता करता है। जैसा कि पवित्र क़ुरआन के सूरए तलाक़ की आयत संख्या दो में आया है कि जो भी अल्लाह से डरता है अल्लाह उसके लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता देता है।

    पैग़म्बरे इस्लाम के बहुत निकट व अच्छे साथी अबूज़र को जब मदीने से रबवा की ओर देश निकाला दिया गया तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उनसे विदाई के समय इस प्रकार कहा था कि जान लो कि यदि आकाश और धरती, किसी बंदे पर तंग हो जाए और वह तक़वा अपनाए तो ईश्वर उसके लिए मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर देता है। तो फिर सत्य के अतिरिक्त कोई भी चीज़ तुम्हारे लिए आकर्षित न रहे और असत्य के अतिरिक्त कोई भी चीज़ तुम्हें बुरी न लगे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने आकर्षक और मूल्यवान बयानों और भाषणों में ईश्वर से भय रखने वालों की नैतिक व आत्मिक विशेषताओं को बयान किया है। इन भाषणों में सबसे प्रसिद्ध और सबसे व्यापक भाषण वह है जिसे उन्होंने अपने एक साथी हम्माम के अनुरोध पर दिया था। इस भाषण में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ईश्वर का भय रखने वालों की विशेषताएं बयान की है। वे नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक 193 में जो ख़ुत्बये हम्माम के नाम से भी प्रसिद्ध है, ईश्वर का भय रखने वालों की दौ से अधिक विशेषताएं बयान करते हैं। इन विशेषताओं में से कुछ ईश्वर से उनके संबंध, अन्य लोगों से उनके संबंध और अपने बारे में उसके संबंध को बयान किया गया है। हज़रत अली अली अलैहिस्सलाम ईश्वर से भय रखने वालों के ईश्वर से संबंध को, सत्य की पहचान का परिणाम मानते हैं। वे ईश्वर के साथ इस गुट के संबंध को बयान करते हुए कहते हैं कि उनकी नज़र में अल्लाह का वह सर्वोच्च स्थान है कि उसके अतिरिक्त हर वस्तु उन्हें तुच्छ व हीन दिखाई देती है। यह छोटा और ज्ञान का समुद्र वाक्य, ईश्वर का भय रखने वालों की बहुत सी आत्मिक व व्यवहारिक विशेषताएं बयान करता है और यह दर्शाता है कि ईश्वर का प्रेम और उसका ज्ञान उनके दिलों पर ऐसा छाया हुआ है कि उनके दिलों में दुनिया की तड़क भड़क और दिखावे के प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं है। उनके जीवन का सबसे स्वर्णिम अवसर वह होता है जब वह एकांत में ईश्वर से अपने मन की बातें करते हैं और उसके दरबार में उपस्थित होते हैं और अपना दुखड़ा उससे बयान करते हैं। वे उसके दरबार में अपनी लापहरवाही के लिए क्षमा याचना करते हैं, आंसू बहाते हैं और उसकी कृपा के द्वार खटखटाते हैं, इस आशा के साथ कि कृपा दृष्टि उन पर भी हो जाए।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस भाषण में एक अन्य स्थान पर ईश्वर से भय रखने वाले के सृष्टिकर्ता से संबंध के बारे में कहते हैं कि रात के समय, अपने पैरों पर खड़े होकर, पवित्र क़ुरआन के एक एक शब्द को बहुत ही चिंतन मनन से पढ़ते हैं और अपने दिलों को क़ुरआन की तिलावत से दुखी करते हैं और अपने कष्टों का उपचार उसमें तलाशते हैं और यदि वह क़ुरआन की किसी ऐसी ऐसी आयत पर पहुंचते हैं जिसमें पारितोषिक व प्रेरित करने की बात होती है तो उस पर दिल लगा बैठते हैं और उनकी जानें उसके उत्साह में झूम उठती हैं, उन्हें यह विश्वास है कि मानो वह पारितोषिक उनकी नज़रों के सामने है। जब वह किसी ऐसी आयत पर पहुंचते हैं जिसमें भय और सावधान रहने की बात कही गयी हो तो वह उस पर इतना अधिक ध्यान देते हैं कि मानो नरक से आने वाली चीख़ व पुकारा की आवाज़ उनके कानों से टकरा रही है। उसके बाद वह ईश्वर के दरबार में झुक जाते हैं और सजदे के समय अपने घुटनों और हाथ को ज़मीन रख देते हैं और ईश्वर से नरक की आग से अपनी मुक्ति की गुहार लगाते हैं।

    इस भाषण में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वर से भय रखने वालों के कारनामों की ओर संकेत करते हैं और उन्हें भला, नेक, संयमी और सदकर्मी बताते हैं। वे कहते हैं कि वह दिन के उजालों में ज्ञानी संयमी और भय रखने वाले सदकर्मी हैं, रात होते ही उनका सारा प्रयास ईश्वर का आभार व्यक्त करने में होता है। दूसरे दिन की सुबह उनके सारे प्रयास ईश्वर का गुणगान है और रात को वह भय के वातावरण में बिताते हैं और सुबह बहुत प्रसन्नचित उठते हैं। अपनी निश्चेतना से जो उन्होंने किया भयभीत और ईश्वर की अनुकंपाओं से प्रसन्नचित रहते हैं।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जिन अन्य विषयों को प्रस्तुत किया है वह ईश्वर का भय रखने वालों के अन्य लोगों से संबंध है। इस प्रकार का तक़वा जिसे हज़रत अली बयान करते हैं वह सूफ़ियों का तक़वा और दुनिया से कट कर रहना नहीं है बल्कि वह ऐसा तक़वा है जिसे अन्य लोगों के साथ संबंध और सामाजिक जीवन में जिसे भलि भांति देखा जा सके। वास्तव में उपसना संबंधी मामलों में व्यस्त होने और धार्मिक दायित्वों के निर्वाह के लिए सबसे आवश्यक शर्त ईश्वरीय भय है किन्तु यह काफ़ी नहीं है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम खुत्बये हम्माम में इस बारे में संकेत करते हैं कि ईश्वरीय भय रखने वाले वह होते हैं जिनसे दूसरों को कोई कष्ट न पहुंचे, अपने क्रोध को पी जाते हों, बुरी बातों से दूर रहते हैं, उनके व्यवहार नर्म होते हैं, उनकी बुराईयां छिपी होती हैं, उनके भले काम स्पष्ट होते हैं, उनकी भलाई सबके लिए होती है और किसी को भी उनसे कष्ट नहीं पहुंचता है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वरीय भय रखने वालों की एक अन्य विशेषता की ओर संकेत करते हैं जो भाषा और ज़बान से संबंधित है। उल्लेखनीय है कि बात चीत करना, अन्य लोगों से संपर्क साधने का सबसे बेहतरीन रास्ता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि उन्होंने अपनी ज़बानों पर ताला लगा लिया है और सत्य के अतिरिक्त कुछ बोलते ही नहीं।

    इस बात से हज़रत अली अलैहिस्सलाम स्पष्ट करना चाहते हैं कि तक़वे की शर्तें में से एक, कम बोलना और सही व चयनित बात करना है। उनका चुप रहना और कम बोलना, कमज़ोरी और अक्षमता का चिन्ह नहीं है बल्कि यह इसलिए है कि वे सदैव चिंतन मनन में रहते हैं और सही समय पर बात करते हैं और जो भी उनकी ज़बान से निकलता है वह सही और दूरदर्शी बात होती है।

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