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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 29

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    ईश्वरीय दूतों ने सदैव प्रलय और परलोक में इंसान के भाग्य को महत्व दिया है। प्रलय और परलोक के संबंध में ईश्वरीय दूतों द्वारा अधिक बल दिया जाना इस धार्मिक विश्वास के महत्व को दर्शाता है।

    समस्त ईश्वरीय दूतों ने एकेश्वरवाद और एक ईश्वर की उपासना का आहवान किया है। उसके बाद उन्होंने प्रलय पर विश्वास के महत्वपूर्ण विषय को प्रस्तुत किया है। इसलिए कि प्रलय पर विश्वास द्वारा ही इंसान की सृष्टि का उद्देश्य व्यवहारिक होता है और उसका आचरण एवं उसकी गतिविधियों को सही दिशा मिलती है। प्रलय के बारे में इमाम अली (अ) फ़रमाते हैं “हे ईश्वर के बंदों, जान लो, ईश्वर ने तुम्हें व्यर्थ पैदा नहीं किया है और लावारिस नहीं छोड़ दिया है, अतः उसके मज़बूत संपर्कों का सहारा लो और उनकी वास्तविकताओं की शरण प्राप्त करो ताकि तुम्हें शांति, मज़बूत शरणस्थल और सम्मानजनक लक्ष्यों तक पहुंचा दें, ऐसा दिन कि जब आँखें चौंधिया जायेंगी, हर ओर अंधेरा होगा ऊंट के झुण्डों और बड़ी मात्रा में माल छोड़ दिया जाएगा, इसलिए कि प्रलय के समय इस्राफ़ील इस प्रकार सूर फूंकेंगे कि दिलों की धड़कनों रुक जायेंगी, ज़बानें बाहर निकल आयेंगी, ऊंचे ऊंचे पहाड़ और चट्टानें गिर जायेंगी, उस समय न कोई सिफ़ारिश करने वाला होगा कि जो सिफ़ारिश कर सके और न कोई दोस्त कि जो सहायता कर सके और क्षमा याचना का भी कोई लाभ नहीं होगा।”
    प्रलय पर विश्वास, इंसान की शिक्षा-दीक्षा और पालन पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईश्वर ने क़ुरान में अनेक स्थानों पर स्वर्ग की सुन्दरता और अनंत अनुकंपाओं को बहुत ही सुन्दर शैली में बयान किया है ताकि इंसान में स्वर्ग के प्रति लगाव बढ़े और वह वहां पहुंचने के लिए कोशिश करे। इसके साथ ही, लोगों को नर्क और उसके भयानक प्रकोप से डराता है। इसी संदर्भ में हज़रत अली (अ) भी लोगों में सुधार के लिए मौत और परलोक का विषय प्रस्तुत करते हैं। हज़रत अली (अ) की शैली इतनी अधिक आकर्षक एवं प्रभावी है कि नहजुल बलाग़ा के प्रसिद्ध व्याख्याकार इब्ने हदीद जैसे अहले सुन्नत के विद्वान इसे सुनकर कांप उठते हैं और उनके विचारों में बड़ा परिवर्तन आ जाता है। हज़रत अली मौत के बारे में फ़रमाते हैं कि शीघ्र ही मौत का साया, और उसका तेज़ दर्द, और जान निकलने के क्षण का अंधेरा, और मौत की बेहोशी की स्थिति, और आत्मा का बदन से निकलना, और दुनिया से आँखें बंद होने का अंधेरा, और यादों की कड़वाहट तुम्हें चपेट में ले लेगी। अतः संभव है कि मौत तुम पर अचानक हमला कर दे, तुम्हारी बातचीत को बंद और तुम्हारे समूह को तितर बितर और तुम्हारी निशानियों को नष्ट, और तुम्हारे घरों को ख़ाली कर दे, तुम्हें प्रयास करना चाहिए और तैयार रहना चाहिए और लोक में परलोक के लिए पुण्य एकत्रित करने चाहिएं, दुनिया तुम्हें अंहकारी न बना दे, जिस प्रकार की तुम्हारे पूर्वजों और तुमसे पहले वाले लोगों को अंहकारी बना दिया था। जिन लोगों ने दुनिया को हासिल करना चाहा, वे दुनिया के धोखे में फंस गए, उन्होंने अवसर गंवा दिए और नए अवसरों को पुराना कर दिया, परिणाम स्वरूप, उनके घर क़ब्रिस्तान और उनकी संपत्ति दूसरों की विरासत बन गई। लोगो, धोखेबाज़ दुनिया से से दूर रहो, यह शातिर और कपटी है, ऐसी दाता जो वापस ले लेती है और ऐसी ढांपने वाली जो नंगा कर देती है, दुनिया की सुविधाएं अस्थायी और उसकी कठिनाईयों का कोई अंत नहीं है और आफ़तें स्थायी हैं। इब्ने अबिल हदीद इस ख़ुतबे की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ईश्वर की सौगंध, पचास साल के दौरान अनेक बार मैंने इस ख़ुतबे को पढ़ा है, जब भी पढ़ता हूं भयभीत हो जाता हूं और मुझे इससे सीख मिलती है और मेरी आत्मा और मेरा अंग अंग कांप उठता है। जब जब भी पढ़ता हूं आभास करता हूं कि मैं वही व्यक्ति हूं जिसका उल्लेख इमाम अली (अ) कर रहे हैं।

    दुनिया का जीवन, सृष्टि को उसके गंतव्य तक पहुंचाने का एक मार्ग है। हज़रत अली (अ) ने जब मोहम्मद इब्ने अबी बक्र को मिस्र का गवर्नर नियुक्त किया तो उन्हें महत्वपूर्ण दिशा निर्देश दिए। हज़रत ने फ़रमाया, ईश्वर तुमसे तुम्हारे छोटे बड़े और गुप्त एवं स्पष्ट कार्यों के बारे में पूछताछ करेगा। अगर तुम्हें सज़ा देगा तो तुम उससे कहीं अधिक के हक़दार होगे और अगर तुम्हें क्षमा कर देगा तो वह उसकी महानता होगी।

    हज़रत अली (अ) दुनिया को प्रशिक्षण का स्थान और परलोक को प्रतिस्पर्धा के दिन के रूप में पेश करते हैं। हज़रत फ़रमाते हैं कि जान लो कि आज प्रशिक्षण और तैयारी का दिन है और कल प्रतिस्पर्धा का दिन। जीतने वालों का इनाम स्वर्ग और पीछे रह जाने वालों के भाग्य में नरक होगी। क्या कोई ऐसा है कि जो मौत आने से पहले अपनी ग़लतियों की माफ़ी मांग ले। क्या कोई इंसान है जो उस दिन से पहले, अपने लिए कोई पुण्य करे? इमाम (अ) स्पष्ट करना चाहते हैं कि ईश्वर ने इंसानों को व्यर्थ पैदा नहीं किया है। इंसान को जीवन के मैदान में प्रतिस्पर्धा देनी होगी और अपने कल्याण एवं मुक्ति के लिए प्रयास करना होगा। अगर वह अच्छा कार्य करेगा तो उसका इनाम स्वर्ग है और अगर पाप करेगा तो नरक के अलावा उसका कोई ठिकाना नहीं होगा। इसीलिए इस ख़ुत्बे के अंत में हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं, जब तक जीवित हो तो समझो देर नहीं हुई है। आओ और अपने पापों के लिए ईश्वर से क्षमा याचना करो औऱ इस प्रतिस्पर्धा के लिए पुरस्कृत होने के लिए भले कार्य करने वालों के साथ हो जाओ और इस इनाम को जीतने वालों के समूह में शामिल हो जाओ।
    स्वर्ग मुक्ति प्राप्त करने वालों के लिए है। स्वर्ग में विभिन्न प्रकार की अनुकंपाएं, बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध हैं और स्वर्ग वासियों को किसी प्रकार का कोई दुख नहीं है। इसके विपरीत, नरक जो पापियों का स्थान है, दुखों और कठिनाईयों से भरा हुआ है। हज़रत अली (अ) स्वर्ग की व्याख्या करते हुए फ़रमाते हैं, ईश्वर आदेश का पालन करने वालों को अपनी रहमत का पात्र बनाता है और हमेशा के लिए स्वर्ग में स्थान देता है, स्वर्ग ऐसा आवास है जिसमें रहने वाले सदैव वहां रहेंगे और उनके जीवन की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होगा। वहां उन्हें कोई डर और भय नहीं होगा, उन्हें वहां किसी तरह का कोई रोग नहीं लगेगा और कोई ख़तरा नहीं होगा।

    इसी प्रकार हज़रत अली (अ) ने नरक की व्यख्या करते हुए फ़रमाया है कि ईश्वर पापियों को सबसे बुरी जगह डालेगा और उनके हाथ पैरों को ज़ंजीर में बांधकर उनकी गर्दन में लटका देगा, इस प्रकार कि उनका सिर उनके पैरों से निकट होगा। उनके शरीर को आग के वस्त्रों से ढांपेगा और उन्हें ऐसे प्रकोप में ग्रस्त करेगा जिसकी आग की गर्मा बहुत अधिक होगी और उसकी लवटों की आवाज़ भयभीत करने वाली। ऐसा स्थान जिससे वह कभी बाहर नहीं निकल सकते और उसमें क़ैद होने वाले कभी आज़ाद नहीं हो सकते। जान लो कि शरीर की यह नाज़ुक खाल नरक की आग को सहन करने की शक्ति नहीं रखती है। अतः स्वयं पर रहम करो। इस वास्तविकता का दुनिया की कठिनाईयों में अनुभव कर चुके हो। क्या कभी शरीर में कांटा घुसने का या ठोकर खा कर घायल होने का अनुभव किया है? अतः किस प्रकार आग में और शैतान के निकट रखे गए पत्थरों में रहोगे?
    मौत की विशेषता यह है कि सामान्यतः अचानक आती है। कोई नहीं जानता कि किस दिन और किस समय इस दुनिया से उठाया जाएगा। कितने ही लोग ऐसे हैं जिन्होंने अच्छे भले दिन की शुरूआत की, लेकिन दिन की समाप्ति से पहले ही मौत ने उन्हें दबोच लिया। इसीलिए इंसान को हमेशा अंतिम यात्रा के लिए तैयार रहना चाहिए। हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैं कि कितने ही ऐसे लोग थे जो दिन की शुरूआत में थे लेकिन शाम होते होते चल बसे, और कितने ही लोग ऐसे थे कि जो रात की शुरूआत में उससे ईर्ष्या करते थे और रात के अंत तक उसके शोक मनाने वाले उसके सोग में बैठे। हज़रत अली (अ) इसी प्रकार, लोगों का ध्यान लौकिक जीवन के अस्थायी होने की ओर खींचते हैं। हज़रत फ़रमाते हैं कि हे लोगो, दुनिया एक सफ़र है जबकि परलोक हमेशा के लिए घर। अतः सफ़र में सदैव रहने वाले घर के लिए ज़रूरी वस्तुओं को ले लो, तुम्हें दुनिया में परखा गया है और दूसरों के लिए दुनिया बनाई गई है। जो कोई मरता है तो लोग पूछते हैं कि क्या छोड़ कर मरा है? लेकिन फ़रिश्ते पूछते हैं कि उसने जाने से पहले क्या भेजा है? ईश्वर तुम्हारे पूर्वजों को क्षमा करे स्वयं से पहले कुछ पूंजी भेज दो ताकि ईश्वर के पास बाक़ी रहे और सबकुछ अपने वारिसों के लिए मत छोड़ो जिसका जवाब देना तुम्हारे लिए अनिवार्य होगा।

    क़ब्रों की ज़ियारत करना एक ऐसा कार्य है जिसकी धार्मिक ग्रंथों में प्रशंसा की गई है और अच्छा बताया गया है। क़ब्र का दर्शन, दर्शन करने वाले के लिए सचेत होने का कारण है ताकि कुछ क्षणों के लिए दुनिया से चले जाने वालों के बारे में सोच विचार करे और उनकी स्थिति से सीख ले। हज़रत अली (अ) इस संदर्भ में फ़रमाते हैं कि यद्यपि उनके चिन्ह नष्ट हो गए हैं औऱ उनकी ख़बरें भुला दी गई हैं, लेकिन सीख लेने वाली आँखें उन्हें देख रही हैं और कान उनके बारे में सूचनाओं को सुन रहे हैं जो एक दूसरी भाषा में हम से बात करते हैं और कहते हैं कि सुन्दर चेहरे मुर्झा गए हैं और कोमल शरीर ख़राब हो गए हैं। हमने अपने शरीरों पर पुराने वस्त्र धारण किए हैं और क़ब्र की तंगी हमें भींच रही है, क़ब्र का सुनसान घर हमारे ऊपर गिर चुका है और उसने हमारे अंगों की सुन्दरता को नष्ट कर दिया और हमारे चेहरे के चिन्हों को परिवर्तित कर दिया है। इन डरावने घरों में हमारा निवास बहुत लम्बा है न हमें कठिनाईयों से मुक्ति मिल रही है और न ही क़ब्र की तंगी से निजात।

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