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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 30

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    जो व्यक्ति सही ज्ञान और सोच विचार के बिना उपासना करता है उसका मूल्य बयान करते हुए हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” पूर्ण विश्वास के साथ सोना संदेह की स्थिति में नमाज़ पढ़ने से बेहतर है”

    सिफ्फीन नामक युद्ध में जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम और माअविया की ओर से यह स्वीकार कर लिया गया कि दोनों पक्ष एक एक व्यक्ति को अपनी अपनी ओर से अपना प्रतिनिधि बनायेंगे और उसका फैसला स्वीकार करेंगे। तो उसके बाट युद्ध बंद हो गया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जब यह देखा कि सिफ्फीन में सैनिकों को रोकने का कोई फायदा नहीं है तो उन्होंने सैनिकों को कूफे लौटने का आदेश दिया। जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम और सैनिक कूफ लौट आये तो खवारिज की ओर से उनके विरुद्ध की जाने वाली कार्यवाहियों में वृद्धि हो गयी पंरतु चूंकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम धैर्य जैसे समस्त सदगुणों में दूसरों के लिए आदर्श थे इसलिए उन्होंने खवारिज की ग़लतियों को नज़रअंदाज करना और उनके साथ गुज़ारा करने की नीति अपनाई तथा उनके साथ वार्ता और नसीहत आरंभ की। खवारिज के एक प्रतिनिधि हरकूस बिन ज़ुहैर ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा जो गलती और पाप आपने सिफ्फीन युद्ध में किया है उसके लिए तौबा व प्रायश्चित करें। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उसके उत्तर में कहा मैंने तुम्हें सिफ्फीन युद्ध में हकमिय्यत अर्थात दो व्यक्तियों के फैसले को स्वीकार करने से मना किया था और मैं स्वयं इसे नहीं चाहता था परंतु तुमने आग्रह किया और उसकी मांग की थी। अब तुम अपनी ग़लती को समझ गये हो तो उसे पाप समझ रहे हो और प्रायश्चित की मांग कर रहे हो। जान लो कि यह पाप नहीं है कि इंसान उससे प्रायश्चित करे। मैंने पूर्णजानकारी के साथ तुम्हें मना किया था और चूंकि तुमने सीमा से अधिक आग्रह किया था इसलिए मैंनें विवश होकर उसे स्वीकार किया। अब तुम्हारी समझ में आ गया है कि मैं सही कह रहा था और तुमने ग़लती की है। इसके लिए तौबा करने की आवश्यकता नहीं है”

    परंतु खवारिज ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम की तार्किक बातों को स्वीकार नहीं किया। उस समय खवारिज के एक प्रतिनिधि ज़रआ बिन बुर्ज ताई ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा ईश्वर की सौगन्द अगर आपने प्रायश्चित नहीं किया तो मैं अकेले ही आपकी हत्या कर दूंगा और अपने इस कार्य से ईश्वर को प्रसन्न करूंगा” ज़रआ बिन बुर्ज ताई की बातें पूरी तरह खवारिज की गुमराही की सूचक थीं। साथ ही उसकी बातें इस बात का चिन्ह थीं कि खवारिज, न्याय और सच्चाई की प्रतिमूर्ति हज़रत अली अलैहिस्सलाम को दोषी समझते थे और वे उनकी हत्या करना चाहते थे।
    हरकूस और ज़रआ जैसे खवारिज के प्रतिनिधियों की आपत्ति को देखकर दूसरों ने भी दुस्साहस करना आरंभ कर दिया और वे भी सार्वजनिक स्थानों पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम को बुरा भला कहने लगे। एक दिन हज़रत अली अलैहिस्सलाम नमाज़ पढ़ने में व्यस्त थे कि अचानक खवारिज का एक प्रतिनिधि इब्नुल कव्वा चिल्लाया और पवित्र कुरआन की एक आयत आपत्ति स्वरूप पढ़ी। उस आयत में पैग़म्बरे इस्लाम को संबोधित करके कहा गया है कि हे पैग़म्बर आप और आपसे पहले वाले पैग़म्बरों पर वहि की गयी है कि अगर आप अनेकेश्वरवादी हो गये तो आपके सारे कर्म व्यर्थ हो जायेंगे और आप घाटा उठाने वालों में से हो जायेंगे” इब्नुल कव्वा ने यह आयत पढ़कर यह बताने की चेष्टा की कि हकमिय्यत स्वीकार करने के कारण हज़रत अली अलैहिस्सलाम काफिर हो गये हैं। साथ ही धर्मभ्रष्ठ खवारिज यह कहते थे कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम के समस्त कर्म व्यर्थ हो गये हैं परंतु जैसाकि पवित्र कुरआन में कहा गया है कि जब कुरआन पढ़ा जाये तो चुप रहो शायद तुम पर दया हो जाओ इसलिए इस आयत पर अमल करते हुए हज़रत अली अलैहिस्सलाम चुपचाप खड़े हो गये और जब उन्होंने नमाज़ पढ़ना आरंभ किया तो उस खारजी ने दोबारा वही आयत पढ़ी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस बार भी चुप हो गये यहां तक कि उसने तीसरी बार इस आयत की तिलावत की। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने उसके उत्तर में सूरये रोम की ६०वीं आयत की तिलावत की जिसमें महान ईश्वर कहता है तो तुम धैर्य करो निःसंदेह ईश्वर का वादा सच्चा है और जो लोग यक़ीन नहीं रखते हैं वे उतावलेपन के लिए तुम्हें विवश न करें”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने पवित्र कुरआन की इस आयत की तिलावत करके खवारिज का उत्तर दे दिया।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने शासनकाल में लोगों के साथ गुज़ारा किया और उन्हें आज़ादी दी ताकि लोग अपने विचारों और दृष्टिकोणों को बयान कर सकें और वे विरोधियों की बातों के समक्ष बहुत ही धैर्य से काम लेते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने अनुयाइयों और चाहने वालों को इस बात की अनुमति नहीं देते थे कि वे अज्ञानी लोगों की आपत्तियों का जवाब हिंसात्मक ढंग से दें। यह हज़रत अली अलैहिस्सलाम की उच्च विशेषता थी। क्योंकि हज़रत अली अलैहिस्सलाम की दृष्टि में सत्ता साधन था न कि उद्देश्य। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने कभी भी लोगों पर शासन की इच्छा नहीं जताई। उन्होंने सत्ता की बागडोर केवल इसलिए संभाली थी कि उसके माध्यम से लोगों को अत्याचार से मुक्ति दिलायें और लोगों को समानता एवं बराबरी का अधिकार प्राप्त हो। हज़रत अली अलैहिस्सलाम चाहते थे कि उनकी सरकार की छत्रछाया में वंचितों एवं अनाथों का समर्थन किया जाये और लोक- परलोक में लोगों की सफलता के लिए आवश्यक कार्य अंजाम दिये जायें। यह वह बातें हैं जिन्हें हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने स्वयं स्वीकार किया है।

    एक बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपना पुराना जूता सिल रहे थे उस समय उन्होंने इब्ने अब्बास से कहा ईश्वर की सौगन्द मैं इस जूते को तुम पर शासन करने से अधिक पसंद करता हूं मगर यह कि सत्ता के माध्यम से हक व सत्य को स्थापित करूं और असत्य को समाप्त कर दूं”

    खवारिज के गुमराह हो जाने और उनके दुर्व्यवहार से हज़रत अली अलैहिस्लाम को बहुत दुःख था। हज़रत अली अलैहिस्लाम ने पहले तो गुमराह व पथभ्रष्ठ खवारिज गुट को बहुत समझाया परंतु उसने हज़रत अली अलैहिस्लाम की एक बात भी न सुनी वह अपनी हठमर्मिता के सामने हज़रत अली अलैहिस्लाम की किसी भी तर्कसंगत बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ। यहां तक कि हज़रत अली अलैहिस्लाम स्वयं व्यक्तिगत रूप से कूफ़े के निकट हौरा नामक क्षेत्र में खवारिज के शिविर में गये और उन्होंने सिफ्फीन युद्ध का सारा विवरण उसके सामने रखा। हज़रत अली अलैहिस्लाम ने बताया कि आज जो फूट हो गयी है वह खवारिज की अज्ञानता एवं उसके द्वारा हकमियत को स्वीकार करने के कारण है परंतु हज़रत अली अलैहिस्लाम के इस प्रयास का भी कोई परिणाम नहीं निकला और खवारिज की उद्दंडता अपने अंत को पहुंच गयी और वे बड़े दुस्साहस के साथ अपने पथभ्रष्ठ विचारों को चारों ओर फैलाने लगे। उनका सबसे खतरनाक विश्वास यह है कि हज़रत अली अलैहिस्लाम और उनके चाहने वाले काफिर और इस्लाम से खारिज हैं। उन लोगों ने इस बहाने से लोगों की हत्या शुरू कर दी और हज़रत अली अलैहिस्लाम का प्रेमी होने के आरोप में निर्दोष लोगों की हत्या कर देते थे।

    नहजुल बलाग़ा का प्रसिद्ध व्याख्याकर्ता और सुन्नी विद्वान इब्ने अबिल हदीद कहता है” जब खवारिज नहरवान की ओर जा रहे थे तो उन्होंने रास्ते में अब्दुल्लाह बिन खुबाब को उसकी गर्भवती पत्नी के साथ देखा। इब्ने खुबाब ने गर्दन में पवित्र कुरआन की प्रति लटका रखी थी। खवारिज ने उसे पकड़ कर उससे कहा तुमने जो गर्दन में लटका रखा है वह हमें आदेश देता है कि तेरी हत्या कर दूं इब्ने खुबाब ने कहा कुरआन ने जिस चीज को जिन्दा किया है तुम भी उसे ज़िन्दा करो और जिस चीज़ को कुरआन ने मार दिया है तुम भी उसे मार दो। वार्ता के दौरान खवारिज के एक व्यक्ति ने देखा कि एक पेड़ के नीचे एक सूखी खजूर गिरी हुई है उसने उसे उठाकर मुंह में रख लिया। अचानक दूसरों ने देख लिया और चिल्लाने लगे कि तुमने खजूर के मालिक की अनुमति के बिना खजूर कैसे खा ली? यह कार्य अवैध और पाप है। तुम्हारा यह कार्य सही नहीं है। वह शर्मिन्दा हो गया और तुरंत उसने अपने मुंह से खजूर उगल दिया। उसके बाद वे लोग अब्दुल्लाह बिन खुबाब के पास आये और उससे कहा अपने बाप से हमें कोई हदीस अर्थात कथन सुनाओ अब्दुल्लाह बिन खुबाब ने कहा मैंने अपने बाप से सुना है कि वह कहते थे कि मैंने पैग़म्बरे इस्लाम से सुना है कि शीघ्र ही एक बुराई अस्तित्व में आयेगी जिसमें इंसान का दिल मर जायेगा जिस तरह से इंसान का शरीर मर जाता है। दिन से रात हो जायेगी कि वह मोमिन होगा और रात से सुबह हो जायेगी जबकि वह काफिर होगा उस समय तुम्हारी हत्या कर दी जाये मगर तुम हत्या नहीं करना”

    उसके बाद खवारिज ने हज़रत अली अलैहिस्लाम के बारे में उसका विचार व विश्वास पूछा तो उसने जवाब में कहा सच में अली दूसरों की अपेक्षा ईश्वर और उसके धर्म के बारे में अधिक ज्ञान रखते हैं। जैसे ही अब्दुल्लाह ने यह वाक्य कहे खवारिज ने उसके सिर को नहर के किनारे धड़ से अलग कर दिया। उसके बाद उसकी गर्भवती पत्नी की भी हत्या कर दी। खवारिज ने इस पर संतोष नहीं किया उन्होंने गर्भवती महिला का पेट फाड़ दिया और उसके निर्दोष शिशु को पेट से निकाल कर उसकी हत्या कर दी। अज्ञानी खवारिज ने सूखे खजूर को खाने को हराम समझा परंतु निर्दोष पति पत्नी और उसके गर्भ में मौजूद शिशु की हत्या को वैध समझा और उन्होंने इस कार्य में संकोच से काम नहीं लिया। खवारिज किस सीमा तक गुमराह थे इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। आज का आतंकवादी गुट आईएसआईएल खवारिज से बहुत मिलता जुलता है। अगर कल के खवारिज हज़रत अली अलैहिस्सलाम और उनके चाहने वालों को काफिर समझते थे तो आज के तकफीरी आतंकवादी गुट शीया और सुन्नी मुसलमानों को मुसलमान नहीं समझते हैं और वे बच्चे और बूढों की हत्या करने तथा महिलाओं के साथ अवैध संबंध बनाने को वैध समझते हैं। जबकि यह बातें समस्त धर्मों विशेषकर इस्लाम के मूल सिद्धांतों व शिक्षाओं के विरुद्ध हैं। चूंकि इस्लाम प्रेम और दया का धर्म है इसलिए वह निर्दोष इंसानों की हत्या की कड़े शब्दों में भर्त्सना करता है और इसके अपराध के दोषियों को कड़ा से कड़ा दंड देने का आह्वान करता है।

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