islamic-sources

    1. home

    2. article

    3. नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 31

    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 31

    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 31
    Rate this post

    जब राजनीति की बात आती है तो बहुत से लोगों के मन में झूठ, मक्कारी और पाखंड जैसे मामले व शब्द आते हैं। क्योंकि इंसान को पूरे इतिहास में इस कटु वास्तविकता का सामना रहा है। अधिकांश सरकारें एवं व्यवस्थाएं नैतिक और मानवीय सिद्धांतों के प्रति वचनबद्ध नहीं रही हैं। साथ ही इसी संसार में एसी हस्तियों ने भी राजनीति की है जो सूरज की भांति चमक रही हैं। इन हस्तियों ने कठिनतम स्थिति में भी झूठ नहीं बोला और वे सदैव नैतिक व मानवीय मूल्यों के प्रति कटिबद्ध रहीं और उन्होंने हमेशा राजनीतिक हितों एवं समीकरणों पर नैतिक सिद्धांतों के प्रति कटिबद्धता को प्राथमिकता दी। इन्हीं महान हस्तियों में से एक हज़रत अली अलैहिस्लाम थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नीति सदैव धार्मिक शिक्षाओं पर आधारित में रही। दूसरे शब्दों में हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नीति हमेशा धार्मिक शिक्षाओं के अनुसार रही है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम की राजनीति का आधार पवित्र कुरआन की शिक्षाएं थीं। उनकी तथा दुनिया की मोह माया में रहने वाले व्यक्तियों की नीतियों में बहुत अंतर था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इंसान को महान ईश्वर की सृष्टि और उसका अस्ली शासक महान ईश्वर को मानते थे। महान ईश्वर ने न तो विश्व को अकारण पैदा किया है और न ही इंसानों को उनकी हाल पर छोड़ा है बल्कि उनके मार्गदर्शन के लिए ईश्वरीय दूतों और आसमानी किताबों को भेजा है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इंसान के मार्गदर्शन के लिए सामाजिक स्थिति का उपयुक्त होना आवश्यक है और भले लोगों के मार्गदर्शन एवं उनके शासन के बिना इस प्रकार के समाज का अस्तित्व संभव नहीं है। यही कारण है कि जब मुसलमानों की संख्या ध्यान योग्य हो गयी तो पैग़म्बरे इस्लाम ने सबसे पहले इस्लामी सरकार की बुनियाद रखी और समाज के मार्गदर्शन की बागडोर स्वयं संभाली। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार समाज के भविष्य निर्धारण में शासक और शक्तिशाली व्यक्तियों की अत्यधिक भूमिका होती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार राजनीति और सरकारी व्यवस्था का आर्थिक और सामाजिक मामलों तथा सुरक्षा की आपूर्ति एवं जनकल्याण के कार्यों के प्रबंधन में भूमिका होने के अतिरिक्त समाज के व्यवहार के गठन में भी उसकी ध्यान योग्य भूमिका होती है। क्योंकि उनका मानना है कि लोग अपने पूर्वजों से अधिक अपने शासकों का अनुपालन करते हैं।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार राजनीति का स्थान लोगों और समाज के मध्य एक प्रचलित परंपरा से बढकर है और एक आर्दश समाज तक पहुंचने के लिए राजनीतिक व्यवस्था का आधार, समाज के नेता और लोगों का संयुक्त प्रयास है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार सरकार का नेतृत्व और सदाचारिता में कोई विरोधाभास नहीं है। वास्तव में केवल सही शासन ही परिपूर्णता की ओर मानवता के काफिले का मार्गदर्शन कर सकता है और सत्ता का प्रयोग मानवता के विकास व निखार के लिए कर सकता है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने गवर्नर मालिके अश्तर को ईश्वर से डरने की सिफारिश करते हैं और कहते हैं कि ईश्वरीय आदेश, हर चीज़ पर प्राथमिकता रखते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम मालिके अश्तर के नाम अपने पत्र में फरमाते हैं कि ईश्वर इंसान के समस्त कार्यों को देख रहा है। इसी तरह हज़रत अली अलैहिस्सलाम मालिके अश्तर के नाम अपने पत्र में बल देकर कहते हैं कि शासकों और समाज के प्रबंधकों को चाहिये कि वे लोगों का ध्यान रखें, उनकी कठिनाइयों के समाधान का प्रयास करें और समाज के विभिन्न वर्गों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम की दृष्टि में सरकार का मूल्य फटे- पुराने और मूल्यहीन हो चुके जूते से भी कम है मगर यह कि उस सरकार के माध्यम से न्याय स्थापित और बुराई का अंत किया जाये। अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं” एक दिन मैं अमीरूल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पास गया। उस समय वह अपना जूता सीलने में व्यस्त थे। उन्होंने मुझसे पूछा” इस जूते की क़ीमत क्या है? मैं ने कहा यह बहुत पुराना है इसकी कोई कीमत नहीं है। तो उन्होंने फरमाया ईश्वर की सौगन्द यह मूल्यहीन जूता तुम पर शासन करने से मेरे लिए बेहतर है मगर यह कि इस शासन व सरकार के ज़रिएन्याय स्थापित करूं या किसी बुराई को समाप्त करूं। इसी कारण ३५ हिजरी कमरी में जब लोगों ने बहुत आग्रह किया तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सरकार की बाग़डोर को संभालना स्वीकार किया और अपने भाषण में उस धन की ओर संकेत किया जिसे उसमान ने अपने दोस्तों और चिर परिचित लोगों के दे दिया था।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया ईश्वर की सौगन्ध! लूटे हुए बैतुल माल अर्थात राजकोष को जहां भी पाऊंगा उसे उसके अस्ली मालिकों को लौटा, चाहे अगर उस माल से विवाह ही क्यूं न किया गया हो या दासियों को खरीदा गया हो। क्योंकि न्याय को सार्वजनिक करने में ही जनकल्याण है और जिसके लिए न्याय सहन करना कठिन है उसके लिए अन्याय सहन करना और कठिन है”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नीति में धोखा, विश्वासघात और मक्कारी का कोई स्थान नहीं था। हज़रत अली अलैहिस्सलाम किसी भी स्थिति में झूठ और मक्कारी को स्वीकार नहीं करते थे चाहे इस कार्य से उन्हें नुकसान ही क्यों न पहुंचे। इस संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम का कथन सुनने योग्य है। आप फरमाते हैं” मैं विनाशकारी राजनीति की समस्त चालाकियों से भलिभांति अवगत हूं और शत्रु पर नियंत्रण पाने के सूक्ष्म रास्तों को जानता हूं और उन्हें प्रयोग करने की क्षमता रखता हूं परंतु मैं जानता हूं कि मूल्यों की रक्षा इनमें से बहुत से रास्तों को मुझे प्रयोग करने की अनुमति नहीं देगी क्योंकि इनका स्रोत शैतानी चाल है जबकि मेरी दृष्टि ईश्वर के आदेश पर लगी हुई है जहां वह मुझे आगे बढ़ने का आदेश देगा वहां जाऊंगा और जहां जाने से रोकेगा वहां रुक जाऊंगा। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की पावन जीवन शैली हर प्रकार के मक्र और पाखंड से दूर है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सन ३७ हिजरी क़मरी में सिफ्फीन नामक युद्ध से वापसी के बाद, जो भाषण दिया था वह शिक्षाप्रद बिन्दुओं से भरा पड़ा है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” हे लोगों! वफादारी, सच्चाई के साथ है कि उससे मज़बूत कवच मैं नहीं जानता।

    जो व्यक्ति प्रलय के दिन अपनी वापसी से अवगत है वह धोखा और विश्वासघात नहीं करेगा परंतु आज हम ऐसे वातावरण में रह रहे हैं जिसमें अधिकांश लोग धोखा देने व मक्कारी को सफलता समझते हैं और अज्ञानी लोग ऐसे व्यक्तियों को समझदार समझते हैं। यह उनकी कैसी सोच है? कभी ऐसा भी होता है कि व्यक्ति भविष्य में पेश आने वाली समस्त बातों व घटनाओं को जानता है और मक्कारी के रास्तों को जानता है परंतु ईश्वर का आदेश उसे ग़लत कार्यों से रोकता है जबकि वह उसे अंजाम देने की क्षमता रखता है परंतु अंजाम नहीं देता किन्तु जो व्यक्ति पाप करने से नहीं डरता वह मक्कारी के अवसरों से लाभ उठाता है”

    कुछ लोगों का कहना है कि लक्ष्य तक पहुंचने के लिए हर कार्य का करना वैध है परंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम के अनुसार लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हर कार्य वैध नहीं है बल्कि वही कार्य वैध है जो ईश्वरीय आदेश की सीमा में हो। जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम को एक विशिष्टतावादी गुट का सामना हुआ तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कुछ अनुयाइयों ने उनसे कहा कि लोग दुनिया का मोह रखते हैं। मोआविया लोगों को पैसा और उपहार देकर अपनी ओर कर रहा है आप भी बैतुलमाल अर्थात राजकोष से प्रतिष्ठित अरबों और कुरैश के गणमान्य लोगों को पैसा दीजिये और बैतुलमाल को समान रूप से बांटना छोड़ दीजिये ताकि लोग आप की ओर आयें। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने इन लोगों के उत्तर में कहा क्या तुम लोग मुझसे यह कह रहे हो कि अपनी जीत के लिए इस्लामी राष्ट्र पर जिसका मैं शासक हूं अत्याचार करूं? ईश्वर की शपथ! जब तक मैं ज़िन्दा हूं, और रात दिन है तारे डूबते और निकलते हैं एसा कार्य मैं कभी नहीं कर सकता। अगर यह माल मेरा होता तब भी लोगों में समान रूप से बांटता , राजकोष का माल तो ईश्वर का माल है। जान लो धन को उन्हें दान देना जो इसके पात्र नहीं हैं अपव्यय है यह संभव है कि इस दुनिया में दान देने वाले का स्थान ऊंचा हो जाये परंतु परलोक में उसका स्थान तुच्छ व पस्त होगा। यह भी संभव है कि लोग उसका सम्मान करें परंतु ईश्वर की दृष्टि में वह तुच्छ व अपमानित है।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम की राजनीति का आधार वचन से कटिबद्धता है और वचन को तोड़ना अप्रिय कार्य है। सिफ्फीन नामक युद्ध के बाद होने वाले समझौते से जब हज़रत अली अलैहिस्सलाम की सेना के लोग समझ गये कि उनके साथ धोखा हुआ है तो उन्होंने समझौते का उल्लंघन करना चाहा परंतु हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने स्वीकार नहीं किया और उन्हें संबोधित करके कहा। धिक्कार हो तुम पर क्या समझौता करने के बाद हम उसका उल्लंघन कर दें? क्या ईश्वर नहीं फरमाता है कि जब समझौता कर लिया तो उसके प्रति कटिबद्ध रहो। जो शपथ खा लिया और जो समझौता कर लिए उसे कदापि मत तोड़ो क्योंकि ईश्वर को अपने ऊपर साक्षी व गवाह बना लिया है और जो कुछ तुम कर रहे हो ईश्वर उससे पूर्णतः अवगत है”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नीति से और अधिक अवगत होने के लिए उन सिफारिशों को पढ़ना रोचक होगा जो उन्होंने अपने गवर्नर मालिके अश्तर को की है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम मालिके अश्तर से कहते हैं” दुश्मन की ओर से शांति के उस समझौते को कभी रद्द न करो जिसमें ईश्वर की प्रसन्नता हो क्योंकि तुम्हारे और सैनिकों का आराम और देश की सुरक्षा, शांति में होगी पंरतु सुलह करने के बाद अपने शत्रु से होशियार रहो क्योंकि कभी दुश्मन निकट होगा ताकि तुम्हें धोखा दे तो दूरगामी बनो और अपने अच्छे विचारों पर आरोप लगाओ अर्थात शत्रु के बारे में अच्छे खयाल से बचो। अब अगर तुम्हारे और तुम्हारे दुश्मन के बीच कोई समझौता हो जाये या उसे अपने यहां शरण दिया है तो तुम अपने वादे के प्रति वचनबद्ध रहो और जिस चीज़ को अपने ज़िम्मे लिया है उसके प्रति अमानतदार रहो। अपनी जान को अपने वचन की ढाल बना लो क्योंकि कोई भी ईश्वरीय वाजिबात अर्थात अनिवार्य चीज़ें वादे को वफा करने जैसी नहीं हैं कि समस्त विश्ववासी सारे मतभेद और अलग अलग रुझान के बावजूद इस बारे में एकमत हैं”

    hindi.irib.ir