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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 9

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    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के महान व्यक्तित्व के परिचय से विशेष यद्यपि बहुत अधिक विद्वानों और लेखकों ने बहुत अच्छे व सुन्दर शब्दों में हज़रत अली अलैहिस्सलाम के बारे में बहुत कुछ लिखा है परंतु किसी के अंदर इस बात की क्षमता ही नहीं है कि वह हज़रत अली अलैहिस्सलाम के वास्तविक व्यक्तित्व को बयान व परिचित करा सके। क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम का प्रसिद्ध कथन है कि मुझे अली के सिवा किसी ने नहीं पहचाना और अली को मेरे सिवा किसी और ने नहीं पहचाना।
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अच्छाइयों एवं सदगुणों के शिखर पर हैं और जो व्यक्ति शिखर के नीचे खड़ा होगा वह शिखर के बारे में कैसे बात कर सकता है। अतः जो हस्ती शिखर पर है वही कभी कभी अपनी परिपूर्णताओं एवं विशेषताओं को बयान करती है जिससे दूसरे लोग भी अवगत होते हैं। आज के कार्यक्रम में हम कुछ पहलुओं व बातों को बयान करेंगे जिसे हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने स्वयं बयान किया है।

    ईश्वरीय धर्म इस्लाम को मज़बूत करने में हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलागा के भाषण नम्बर ३३ में अपनी भूमिका को बयान करते हुए कहते हैं” ईश्वर ने मोहम्मद को उस समय पैग़म्बर बनाकर भेजा जब अरबों में किसी के पास आसमानी किताब नहीं थी और कोई भी पैग़म्बर होने का दावा नहीं करता था। पैग़म्बरे इस्लाम ने अज्ञानता के काल के लोगों को मानवीय प्रतिष्ठा के स्थान पर पहुंचा दिया उन्हें सफलता व कल्याण तक पहुंचा दिया और उनके समाज को मजबूती प्रदान की। ईश्वर की सौगन्द! मैं इस्लामी सेना के अग्रणी लोगों में था यहां तक कि नास्तिकों की पंक्ति तितर बितर हो गयी”
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने नहजुल बलाग़ा के भाषण नंबर ३७ में भी फरमाया है कि जब सब मौन धारण किये हुए थे उस समय मैं बोला उस समय जब सब रुक गये थे मैं ईश्वरीय प्रकाश को लेकर आगे बढा, बात करने के समय मेरी आवाज़ सबसे धीमी होती थी परंतु अमल में मैं सबसे बेहतर व आगे होता था”
    धैर्य व संतोष इंसान की एक अच्छी विशेषता है। धैर्य ही है जिससे बहुत सी समस्याओं व पीड़ाओं के समय मनुष्य को आराम मिलता है।

    अलबत्ता धैर्य कई प्रकार का है। कठिनाइयों पर धैर्य, अनिवार्य कार्यों को अंजाम देने पर धैर्य, पापों व हराम कार्यों से बचने व परहेज़ करने पर धैर्य। धैर्य एसी विशेषता है वह जिसके अंदर पाइ जाती है उसे सुशोभित कर देती है और हर बुद्धिमान इंसान को चाहिये कि वह स्वयं को इस विशेषता से सुसज्जित करे।

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम समस्त पहलु से धैर्यवान बल्कि धैर्य की प्रतिमूर्ति थे। इसी कारण वह हर कार्य को सोच विचार कर और संतुलित ढंग से अंजाम देते थे। युद्धों में भी धैर्य का परिचय देते थे। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने युद्ध करने में कभी भी पहल नहीं की। ईश्वरीय धर्म इस्लाम के प्रचार प्रचार और पैग़म्बरे इस्लाम के समर्थन में हर प्रकार की समस्या का धैर्य के साथ सामना किया। पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के बाद जब उनका उत्तराधिकारी बबने का मामला आया तो उस समय भी जो अप्रिय घटनायें घटीं, इस्लामी समुदाय के हितों की सुरक्षा के लिए उन सब पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने सब्र किया और अभूतपूर्व धैर्य व संतोष का परिचय दिया। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण नंबर तीन में फरमाते हैं” मैं इस सोच में था कि क्या अपना हक लेने के लिए अकेले प्रतिरोध करना चाहिये? या उत्पन्न हुए घुटन के वातावरण में मैं धैर्य करूं? सही ढंग से सोच विचार के बाद धैर्य करने में ही मैंने बुद्धिमत्ता समझी। तो मैंने धैर्य किया वह भी इस स्थिति में कि मानो मेरी आंख में कांटा था और गले में हडडी फंसी थी”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने पावन जीवन के विभिन्न अवसरों पर अपने ज्ञान के अथाह सागर की ओर संकेत किया है। एक स्थान पर हज़रत अली अलैहिस्सलाम फरमाते हैं” ईश्वर की सौगन्द अगर मैं चाहूं तो तुममें से हर के काम के आरंभ और अंत और जीवन के समस्त कार्यों से अवगत कर दूं जान लो कि इस मूल्यवान राज़ को मैं अपने विश्वस्त व्यक्ति के हवाले करूंगा। उस ईश्वर की सौगन्द जिसने मोहम्मद को अपना दूत बनाकर भेजा मैं सच के अलावा कुछ नहीं बोलता। पैग़म्बरे इस्लाम ने समस्त चीज़ों का ज्ञान मेरे हवाले किया है। जो व्यक्ति बर्बाद होगा और जो व्यक्ति मुक्ति पा जायेगा उसके स्थान तक कि सूचना पैग़म्बरे इस्लाम ने मुझे दी है। मेरे साथ कोई घटना नहीं घटी है मगर यह कि पैग़म्बरे इस्लाम ने उसकी सूचना मुझे दी है”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम यह बताने के लिए कि उनके अथाह ज्ञान का स्रोत कहां है? नहजुल बलाग़ा के भाषण नमंबर १२८ में कहते हैं” ईश्वर के अतिरिक्त ग़ैब की बात कोई नहीं जानता मगर कुछ ज्ञान एसे हैं जिनकी शिक्षा ईश्वर ने अपने पैग़म्बर को दी है और उसके पैग़म्बर ने मुझे बताया है। पैग़म्बर मेरे लिए दुआ करते थे कि ईश्वर इन ज्ञानों व जानकारियों को मेरे सीने में स्थान दे और मेरे शरीर के अंग उनसे भर जायें”
    वैसे तो पैग़म्बरे इस्लाम के वास्तविक उत्तराधिकारी हज़रत अली अलैहिस्सलाम ही थे परंतु जब विदित में उन्हें खिलाफत मिली तो उन्होंने अपनी नीति की घोषणा इस प्रकार की” सत्ता की बागडोर संभालने से मेरा उद्देश्य धर्म को पुर्निजीवित करना और समाज में न्याय स्थापित करना है। मेरी शैली वही पैग़म्बरे इस्लाम की शैली होगी और इस संबंध में मैं किसी से कोई समझौता नहीं करूंगा” ईश्वरीय धर्म इस्लाम और पैग़म्बरे इस्लाम के सदाचरण में राजनीति, नैतिकता और अध्यात्म एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। राजनेताओं को चाहिये कि वे सच्चे हों और वे सदैव सच्चाई एवं न्याय पर आधारित व्यवहार करें तथा पाखंड व धूर्तता से दूर रहें।

    इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जब कोई राजेनता नैतिक सिद्धांतों के प्रति कटिबद्धता रहता है तो उसकी सरकार में अनैतिक कार्य समाप्त तो नहीं होते पर कम अवश्य हो जाते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपनी सरकार के दौरान जिस नीति एवं न्याय का परिचय दिया उसका उदाहरण पूरे इतिहास में कहीं नहीं मिलता। अलबत्ता हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने जो न्यायपूर्ण शैली अपनाई थी उसके कारण उन्हें नाना प्रकार की समस्याओं का सामना भी करना पड़ा यहां तक कि उनके कुछ साथियों व अनुयाइयों ने उनसे कहा कि राजनीति के लिए इतनी सारी सच्चाई सही नहीं है थोड़ी चालाकी व धूर्तता का भी प्रयोग करें। बहुत से लोग मक्कारी और पाखंड को राजनीति का भाग समझते हैं। इसी कारण कुछ लोग मोआविया को बहुत चालाक राजनेता समझते हैं। ये वे चीज़ें हैं जिनका नैतिक सिद्धांतों के प्रति कटिबद्ध व्यक्ति की नीति में कोई स्थान नहीं है और ये बातें न्याय से पूर्ण विरोधाभास रखती हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी राजनीति के बारे में नहजुल बलाग़ा के भाषण नंबर २०० में फरमाते हैं” भूल कर रहो जो यह सोच रहो हो कि मोआविया मुझसे अधिक राजनीति जानता था परंतु मोआविया धूर्तता करता है और वह पाप करता है। अगर धूर्तता बुरी न होती तो मैं लोगों के लिए सबसे अधिक चालाक राजनेता होता किन्तु हर धूर्तता व पाखंड पाप है और हर पाप एक प्रकार का इंकार व कुफ्र है। प्रलय के दिन हर पाखंडी व धूर्त के हाथ में एक पताका होगी जिसके माध्यम से वह पहचाना जायेगा। ईश्वर की सौगन्द मैं पाखंड और मक्कारी के धोखे में नहीं आऊंगा और कठिनाइयों से मुकाबले में कमज़ोर नहीं हूंगा”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम न्याय के प्रतिमूर्ति शासक के रूप में मानवता के इतिहास में सदैव चमकते तारे हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम इतने बड़े न्यायी थे कि जैसे ही उनका नाम लिया जाता है अदालत मस्तिष्क में आ जाती है। हज़रत अली अलैहिस्लाम इतने बड़े न्यायी थे कि उनका प्रसिद्ध कथन है कि अगर मुझसे कहा जाये कि चींटी के मुंह में जो दाना है उससे छीन लूं और उसके बदले में मुझे पूरी दुनिया की हुकूमत दे दी जाये तब भी मैं यह काम नहीं करूंगा। यहां इस बात का उल्लेख आवश्यक है कि न्याय को लागू करने की दिशा में ही हज़रत अली अलैहिस्सलाम को शहीद कर दिया गया।
    लेबनान के एक ईसाई लेखक जार्ज जुरदान हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सदगुणों एवं विशेषताओं को बयान करते हुए लिखते हैं” अली उपासना के मेहराब में अधिक न्याय के कारण शहीद कर दिये गये”

    न्याय के संबंध में हज़रत अली अलैहिस्सलाम असाधारण महान हस्ती थे। इसी कारण वह फरमाते हैं” अगर रातों को मैं कांटों पर सोऊं और मुझे ज़न्जीर में बांध दिया जाये और निर्वस्त्र करके मुझे ज़मीन पर खींचा जाये तो यह कार्य मेरे निकट इससे अच्छा है कि प्रलय के दिन मैं ईश्वर से एसी स्थिति में भेंट करूं कि मैं किसी का थोड़ा सा धन लिए रहूं या किसी पर थोड़ा सा अत्याचार किये रहूं”
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम के पावन जीवन और दूसरों के साथ उनका सदव्यवहार मानवाधिकारों की रक्षा का मुंह बोलता सुबूत है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण नंबर ४७ में अपने हत्यारे के बारे में न्याय से काम लेने की सिफारिश करते हैं। रमज़ान के पवित्र महीने की १९ तारीख थी। हज़रत अली अलैहिस्सलाम सुबह की नमाज़ पढाने के लिए मस्जिदे कूफा गये हुए थे कि इब्ने मुल्जम मुरादी नामक तथाकथित मुसलमान ने विष में बुझाई तलवार से हज़रत अली अलैहिस्सलाम के सिर पर जानलेवा आक्रमण कर दिया और हज़रत अली अलैहिस्सलाम गम्भीर रूप से घायल हो गये। थोड़ी देर के बाद उसे गिरफ्तार करके लाया गया तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने बेटों और अनुयाइयों से कहा” हे अब्दुल मुत्तलिब के बेटों मैं यह न देखूं कि तुम लोग मुसलमानों का खून बहाओ और यह कहो कि लोगों की हत्या इसलिए कर रहे हो क्योंकि अली मारे गये हैं। मेरी हत्या के कारण केवल मेरे शत्रु की हत्या करना और अगर मैं उसकी तलवार की वार से इस दुनिया से जा रहा हूं तो तुम उस पर तलवार का केवल एक वार करना क्योंकि उसने मुझ पर भी केवल एक वार किया है”।

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