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    नहजुल बलाग़ा में इमाम अली के विचार – 10

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    नहजुल बलाग़ा में एक और महत्वपूर्ण विषय उन अधिकारों व कर्तव्यों के बारे में है जो समाज के हर व्यक्ति का एक दूसरे पर है। इस किताब में हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने विभिन्न प्रकार के अधिकारों का उल्लेख किया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने नहजुल बलाग़ा में कभी नैतिक और नागरिक तो कभी राजनैतिक और अंतर्राष्ट्रीय अधिकारों तो कभीं मानवाधिकार का वर्णन किया है।

    मनुष्या सामाजिक प्राणी है और दूसरे प्राणियों की तरह अपनी ज़रूरतों को अकेले पूरा नहीं कर सकता। जो लोग सुखी और सफल जीवन चाहते हैं, उन्हें दूसरों के साथ सहयोग करना चाहए और कुछ सामाजिक गतिविधियों की ज़िम्मेदारी अपने सिर लेनी चाहिए। सीधी सी बात है कि ऐसे समाज के लिए कुछ नियमों की ज़रूरत होगी जिससे लोगों की ज़िम्मेदारियां निर्धारित और संबंध की सीमा स्पष्ट हो। यहीं से अधिकार जन्म लेते हैं। अधिकार ज़रूरी नियम व क़ानून का समूह है ताकि सामाजिक व्यवस्था सुरक्षित रहे और लोगों तथा राष्ट्रों के बीच आपसी संबंध सुव्यवस्थित रहे किन्तु खेद की बात है कि पूरे इतिहास में ऐसी घटनाएं बारंबार हुयीं कि जब इंसान के सामाजिक अधिकारों का शासकों ने अतिक्रमण किया। कभी सार्वजनिक तौर पर तो कभी गुप्त रूप से।

    सत्ताधारी और पूंजीपति वर्ग अपने और आम लोगों के बीच अधिकार और कर्तव्य का निर्धारण एकपक्षीय रूप से करते थे और लोगों से अपने आज्ञापालन को उनका कर्तव्य मानते थे। इस बीच हज़रत अली अलैहिस्सलाम और उनकी हुकूमत उन गितनी की कुछ हुकूमतों में है जिसमें जनता और शासक के पारस्परिक अधिकार को सबसे ऊपर माना गया है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नज़र में हर स्थान पर अधिकार और कर्तव्य के बीच संबंध विशेष रूप से हुकूमत और आम लोगों का एक दूसरे के प्रति अधिकार व दायित्व का संबंध अटूट है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम हुकूमत और जनता के बीच पारस्परिक अधिकार पर बल देते हुए कहते हैं,“ईश्वर ने जिस अधिकार को सबसे बड़ा निर्धारित किया है शासक का जनता पर और जनता का शासक पर अधिकार है।”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने अपने लगभग पांच वर्षीय शासन काल में बहुत सी समस्याओं और रुकावटों के बावजूद अपनी करनी और कथनी में आम लोगों के अधिकार पर विशेष रूप से ध्यान दिया। जैसा कि वह नहजुल बलाग़ा के भाषण संख्या 216 में अधिकार को बयान करने की दृष्टि से बहुत आसान किन्तु व्यवहारिक बनाने की दृष्टि से बहुत सख़्त बताते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते है, “ यदि किसी व्यक्ति का किसी व्यक्ति पर अधिकार बनता है तो उस दूसरे व्यक्ति का भी पहले वाले व्यक्ति पर अधिकार बनता है। यदि यह तय पाए कि एक व्यक्ति को ऐसा अधिकार हासिल हो कि दूसरे व्यक्ति का उस पर कोई अधिकार न बने तो ऐसी हस्ती केवल ईश्वर की हो सकती है न कि उसके किसी बन्दे की।” यही कारण है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम शासक और आम लोगों के बीच संबंध को मालिक और दास के बीच संबंध जैसा नहीं मानते कि शासक स्वयं को आम लोगों का मालिक समझे और अपनी मनमानी करे और लोग उसके संबंध में कुछ न कह सकें और उसके व्यवहार की आलोचना न कर सकें। बल्कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने शासक और जनता के लिए अधिकार व दायित्व बताएं हैं ताकि राष्ट्रीय अधिकार सुरक्षित रहे। जैसा कि नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक 34 में इन अधिकारों को हज़रत अली अलैहिस्सलाम इस प्रकार बयान करते हैं, “ हे लोगो! मैं तुम्हारा शासक हूं, मेरा तुम पर एक अधिकार है और तुम भी मुझ पर एक अधिकार रखते हो। तुम्हारा अधिकार मुझ पर यह है कि मैं तुम्हारा भला चाहूं। बढ़ी हुयी आय से तुम्हारे दायित्व व अधिकार को बढ़ाऊं। इसके मुक़ाबले में मेरा तुम पर यह अधिकार है कि तुमने मेरी आज्ञापालन का जो वचन दिया है उस पर प्रतिबद्ध रहो। मेरे सामने और मेरी पीठ पीछे मेरे शुभ चिन्तक रहों जब तुमको किसी काम के लिए बुलाऊं तो उसका सकारात्मक उत्तर दो और मेरे आदेश की अवहेलना मत करो।”

    एक बार हज़रत अली अलैहिस्सलाम की उनके एक अनुयायी ने इस प्रकार प्रशंसा की कि चाटुकारिता झलक रही थी। आपने उसे इस काम से रोकते हुए लोगों से कहा कि शासक को कर्तव्य निर्वाह के बदले में लोगों से सम्मान व चाटुकारिता की इच्छा नहीं रखना चाहिए और लोगों को भी चाहिए कि इस प्रकार के व्यवहार को समाज में प्रचलित न करें क्योंकि इसके हज़ारों दुष्परिणाम सामने आते हैं।

    वास्तव में हज़रत अली अलैहिस्सलाम लोगों को यह समझाना चाहते हैं कि शासक भी आम लोगों की तरह इन्सान है और उससे भी ग़लतियां हो सकती हैं। इसलिए हर वह काम जो शासक अंजाम दे रहा है उसे आंख बंद करके मान लिया जाए तो हो सकता है कि बाद में उसके दुष्परिणाम सामने आएं। इसलिए राष्ट्र का यह अधिकार है कि जब उसे शासक के किसी काम में कोई ग़लती दिखायी दे तो बिना किसी डर के उसे बयान करे और शासक के काम की आलोचना करे और शासक को किसी व्यक्ति द्वारा अपनी आलोचना बुरी न लगे और राष्ट्र के प्रति मन में द्वेष न पाले बल्कि शासक का इससे भी बड़ा कर्तव्य यह है कि कोई क़दम उठाने से पहले लोगों से परामर्श करे और लोगों का कर्तव्य यह है कि वे शासक का भला चाहें। हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक 207 में कहते हैं, “ भले लोगों की नज़र में शासक के संबंध में सबसे घटिया बात यह है कि वे यह सोचें कि शासक को प्रशंसा व चाटुकारिता पसंद है और उसके चरित्र को घमन्ड से भरा समझें। मुझे यह बात नापसंद है कि तुम्हारे मन में यह बात आए कि तुमसे प्रशंसा की अपेक्षा रखता हूं। यदि कछ लोग किसी अच्छे काम को अंजाम देने के बदले में प्रशंसा की अपेक्षा रखते हैं तो मेरे साथ ऐसा व्यवहार न करो क्योंकि मैं जो काम कर रहा हूं वह कर्तव्य है जिसे ईश्वर की ओर से तुम्हारे संबंध में मुझे सौंपा गया है और अभी उसे पूरी तरह अंजाम नहीं दे पाया हूं और कर्तव्यपरायणता के लिए इन चीज़ों (प्रशंसा) की ज़रूरत नहीं है।”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने शासन काल में एक और बात जिसकी अनुशंसा करते थे वह दूसरों के साथ परामर्श करना और उनके विचारों से फ़ायदा उठाना है। जैसा कि शूरा नामक सूरे की अड़तीसवीं आयत में ईश्वर मोमिन बंदों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुए कहता है, “वे अपने काम में आपस में परामर्श करते हैं।” इस संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपने साथियों की अनुशंसा करते हैं, “ जिस प्रकार ताक़तवर लोगों के सामने बात करते हो मुझसे न करो और जो बात दबंग लोगों से नहीं कहते उसे मुझसे कहने से मत हिचकितचाओ। मेरे साथ दिखावे का व्यवहार न करो। यह न सोचो कि सत्य सुनना मुझे नागवार लगेगा या तुमसे सम्मान की अपेक्षा रखता हूं। जिस व्यक्ति के लिए सच या न्याय की स्थापना की बात सुनना मुश्किल हो तो उसके लिए इसे व्यवहारिक बनाना और मुश्किल होगा। सच बात कहने और न्याय की स्थापना के संबंध में मशवेरा देने से पीछे मत हटो कि मैं स्वयं को ग़लती के मुक़ाबले में बेहतर नहीं समझता और व्यवहार में इससे सुरक्षित नहीं समझता मगर यह कि ईश्वर मुझे इससे सुरक्षित रखे।”
    हज़रत अली अलैहिस्सलाम ईश्वर की ओर से नियुक्ति के साथ साथ जनता के बीच लोकप्रियता को भी इस्लामी शासन के लिए ज़रूरी बताते हैं। हज़रत अली अलैहिस्सलाम की नज़र में लोगों के लिए वैचारिक, नैतिक, सांस्कृतिक और आस्था संबंधी परिस्थिति मुहैया हो ताकि अपनी इच्छा से सत्य पर आधारित ईश्वरीय शासन की ओर वे उन्मुख हों। यही कारण है कि जब पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल लाहो अलैहि व आलेही व सल्लम के स्वर्गवास के बाद हज़रत अली अलैहिस्सलाम के ख़लीफ़ा बनने के हालात ख़त्म हो गए तो वे तलवार से अपना अधिकार लेने के बजाए मुसलमानों के बीच एकता की रक्षा के लिए ख़ामोश हो गए। जबकि ख़िलाफ़त ईश्वर व पैग़म्बरे इस्लाम की ओर से उन्हें प्रदान की गयी थी और पैग़म्बरे इस्लाम ने उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में पहचनवाया था। इस संदर्भ में हज़रत अली अलैहिस्सलाम नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक बाईस में कहते हैं, “ हमारा एक अधिकार है और यदि हुकूमत जो हमारा अधिकार है, हमें न दी गयी तो हम ऊंट की पीठ पर सवार रहेंगे और उस हक़ को हासिल करने के लिए उसे हंकाते रहेंगे चाहे जितना लंबा समय लग जाए।”

    हज़रत अली अलैहिस्सलाम इसी प्रकार नहजुल बलाग़ा के भाषण क्रमांक तीन में कहते हैं, “ जान लो उस हस्ती की सौगन्द जिसने दाने को चीरा और इंसान को पैदा किया यदि लोग उपस्थित न होते और मदद करने वालों व समर्थकों के अस्तित्व से मुझ पर ज़िम्मेदारी निभाना सिद्ध न हुआ होता और यदि ईश्वर ने विद्वानों से यह प्रण न लिया होता कि वे पेट भरों के अत्याचार तथा पीड़ित की भूख के दर्द के सामने चुप नहीं बैठेंगे तो मैं ख़िलाफ़त की लगाम उसी के गर्दन पर डाल देता और विगत की भांति अलग रहता और तुम देखते हो कि तुम्हारी यह दुनिया मेरी नज़र में बकरी की छींक के जितनी भी अहमियत नहीं रखती।”

    यहां भी हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने ख़िलाफ़त संभालने के पीछे पीड़ितों के अधिकार की रक्षा और अत्याचारियों से उन्हें उनका अधिकार दिलाने की भावना का उल्लेख किया है। यदि मदद करने वाले मौजूद हों तो पीड़ित के अधिकार को अत्याचारी से हासिल किया जाए और यह वह ज़िम्मेदारी है जिसे ईश्वर ने विद्वानों को सौंपा है कि यदि उन्होंने पीड़ितों व मजबूर लोगों का साथ न दिया तो इस संदर्भ में वह ईश्वर के निकट जवाबदेह होंगे।

     

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