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    नाई और रंगरेज़-1

    नाई और रंगरेज़-1
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    पुराने समय की बात है मिस्र के इस्कंदरिया नगर में एक रंगरेज़ और एक नाई की दुकान एक दूसरे के बग़ल में थी। रंगरेज़ का नाम अबूक़ीर और नाई का नाम अबु-सीर था। अबु-क़ीर झूठा और मक्कार व्यक्ति था। वह रंगरेज़ी भलिभांति जानता था किन्तु झूठ और ग़लत मार्ग से अपना काम चलाता था। जो कोई व्यक्ति अपना कपड़ा रंग करवाने उसके पास ले जाता तो पहले मज़दूरी लेता और फिर कहताः जाओ कल आना और रंग किया हुआ कपड़ा ले जाना। ग्राहक चला जाता और अगले दिन आता तो अबू-क़ीर उससे झूठ बोलता यहां तक कि रोज़-रोज़ ख़ाली हाथ लौटने के कारण कपड़े का मालिक तंग आकर कहताः हे रंगरेज़ बिना रंग किया हुआ मेरा कपड़ा लौटा दो। उस समय अबु-क़ीर कहताः हे भाई! क्या बताऊं कहते हुए लज्जा आ रही है। तुम्हारा कपड़ा तो मैंने पहले ही दिन रंग दिया था किन्तु चोर आया और उसे चुरा ले गया। कभी ऐसा होता कि कपड़े के मालिक कुछ न कहते और चुपचाप चले जाते किन्तु कभी कुछ ऐसे भी होते जिनसे उसका झगड़ा होता। कुल मिलाकर यह कि रंगरेज़ की दुकान से अधिकतर लड़ने-झगड़ने की आवाज़ सुनाई देती। धीरे-धीरे अबुक़ीर नगर में बदनाम हो गया। अब कोई उसकी दुकान पर कपड़े रंगवाने न जाता। वह भी अबुसीर नाई की दुकान पर चला जाता और अपनी दुकान पर टकटकी लगाए रहता था।

    एक दिन एक बहुबली व्यक्ति उस नगर में आया। उसने एक कपड़ा अबुक़ीर को रंगने के लिए दिया। अबुक़ीर ने सदैव की भांति पहले मज़दूरी ले ली और उससे कहा कि कल आना और रंग किया हुआ अपना कपड़ा ले जाना। वह अजनबी बहुबली व्यक्ति दिन प्रतिदिन रंगरेज़ की दुकान पर जाता किन्तु वह उसे वहां न मिलता। अबुक़ीर जैसे देखता कि वह बहुबली व्यक्ति उसकी दुकान की ओर बढ़ रहा है वह तुरंत अबुसीर नाई की दुकान भाग जाता और वहां छिप जाता था। कुछ दिनों के बाद बहुबली व्यक्ति समझ गया कि रंगरेज़ ने उसे धोखा दिया है और वह उसे कपड़ा लौटाना नहीं चाहता इसलिए वह न्यायधीश के पास गया और अबुक़ीर की शिकायत की। न्यायधीश ने एक व्यक्ति को उसके साथ रंगरेज़ का पता लगाने भेजा। बहुबली व्यक्ति न्यायधीश के आदमी के साथ अबुक़ीर की दुकान पर पहुंचा। दुकान के कोने कोने को भलिभांति देखा ताकि कपड़े के बदल में कुछ उठा ले किन्तु उसे कुछ नहीं मिला। न्यायधीश के आदमी ने दुकान को बंद कर उसे सील कर दिया और उसकी चाभी लेने के पश्चात रंगरेज़ के पड़ोसियों से कहाः रंगरेज़ से कहो कि यदि चाभी चाहता है तो इस व्यक्ति का कपड़ा उसे लौटा दे। अबुक़ीर ने जो अबुसीर की दुकान में बैठा सब कुछ देख रहा था कहाः अब क्या करूं मेरी दुकान तो सील कर दी। अबुसीर ने कहाः तुम्हारी ग़लती है लोगों की चीज़ लेते हो और उसे लौटाते नहीं। अबुक़ीर ने कहाः क्या करूं मेरे धंधे की मंदी है। अबुसीर ने कहाः मेरी भी दुकान नहीं चल रही है। अबुक़ीर ने कहाः चलो किसी दूसरे नगर चल कर वहां अपना भाग्य आज़माते हैं। इसके बाद दोनों यात्रा पर निकल पड़े और आपस में तय किया कि जो भी कमाएंगे उसे मिल कर ख़र्च करेंगे और जो बचेगा उसे एक थैले में रखेंगे और जब अपने वतन लौटेंगे तो आपस में बाट लेंगे और बाक़ी आयु राहत में बिताएंगे। वे एक समुद्र के तट पर पहुंचे। 120 दूसरे यात्री भी नाव पर सवार हो गए। संयोगवश उस नाव पर अबुसीर के सिवा कोई भी नाई नहीं था। अबुसीर ने अबुक़ीर से कहाः भाई हम लोगों को इस नाव में लंबे समय तक रहना होगा। इस दौरान खाने पीने की आवश्यकता होगी। तो मैं नाव के यात्रियों के बीच फिर रहा हूं शायद कोई अपना बाल बनवा ले। यदि मिल गया तो उसका बाल बना दूंगा और इसके बदले में पैसा, या रोटी या पानी का बर्तन उससे लेकर आउंगा ताकि गुज़ारा हो सके। अबुक़ीर ने कहाः अच्छा विचार है। जाओ काम आरंभ करो। यह कह कर नाव के फ़र्श पर सो गया। अबुसीर यात्रियों के बीच फिरता रहा ताकि कोई ग्राहक मिल जाए। अंततः एक व्यक्ति मिला जिसने उसे बाल बनवाई के बदले में एक सिक्का दिया। अबुसीर ने कहाः यदि इस सिक्के के बदले में मुझे एक रोटी दे दो तो वह मेरे लिए अधिक उपयोगी होगी। बाल बनवाने वाले व्यक्ति ने सिक्का वापस लिया और उसे एक रोटी और पनीर का एक टुकड़ा दिया और उसके प्याले को भी पानी से भर दिया। अबुसीर ख़ुशी ख़ुशी अबुक़ीर के पास लौटा तो देखा कि वह अभी तक सो रहा था। उसने उसे जगाया और कहाः उठो! देखो तुम्हारा मित्र तुम्हारे लिए रोटी, पनीर और मीठा पानी लेकर आया है। अबुक़ीर ने खाया-पिया और वह फिर सो गया। अबुसीर फिर ग्राहक की खोज में निकला। उसे दो और ग्राहक मिल गए। उसने उन दोनों के सिर के बाल बनाए। एक से रोटी और दूसरे से पनीर ली। धीरे धीरे उसका धंधा चल पड़ा। नाव के यात्री एक एक करके उसे बुलाते और अपने सर का बाल बनवाते। यात्रियों के बीच एक मिस्री यात्री भी था जिसका क़िबतान नाम था। वह उस नगर के राजा का कर्मचारी था जहां नाव जा रही थी। क़िबतान ने अबुसीर को आवाज़ दी और उससे बाल बनाने के लिए कहा। अबुसीर ने उसका बाल बनाना आरंभ किया और बाल बनाते समय उसे अपने और अपने मित्र के बारे में उसे बता दिया। क़िबतान ने जो एक दयालु व दानी व्यक्ति था कहाः हे भाई जब तक नाव में हो उस समय तक खाने पानी की चिंता मत करो हर रात अपने मित्र के साथ मेरे दस्तरख़ान पर आओ। अबु सीर ख़ुशी ख़ुशी अबुक़ीर के पास लौटा। अबुक़ीर सो रहा था। अबुसीर के आने से उठ बैठा और देखा कि उसके पास बड़ी मात्रा में खाना है। बैठ कर खाने लगा। अबुसीर ने उससे कहाः इस खाने को दूसरे समय के लिए रख देते हैं। आज रात हम और तुम नाव के एक यात्री के मेहमान हैं। अबुक़ीर ने कहाः समुद्र के वातावरण से मैं बीमार हो गया हूं तुम स्वयं जाओ मेहमानी में मैं इसी खाने को खा लेता हूं। अबुसीर अकेले क़िबतान के पास गया और अपने मित्र के न आने का बहाना पेश किया और फिर दस्तरख़ान पर बैठ कर खाने लगा। लौटते समय क़िबतान ने उसे खाने से भरा एक बर्तन दिया और कहाः यह लो अपने मित्र के लिए लेते जाओ। अबुसीर खाने का बर्तन लेकर अबुक़ीर की ओर पलट आया और उससे कहाः क़िबतान दानी व्यक्ति है। उसने तुम्हारे लिए भी भोजन दिया है। खेद की बात है कि तुम्हारा पेट भरा है और तुम इसे नहीं खा सकते। अबुक़ीर ने अबुसीर के हाथ से खाने का बर्तन लिया और इस प्रकार भोजन करने लगा मानो वर्षों से भूखा हो। अबुसीर उसे आश्चर्य से देखता रहा। अबुक़ीर खाना समाप्त करने के पश्चात फिर नाव के फ़र्श पर सिर रखकर लेट गया। बाद के दिन भी इसी प्रकार गुज़र गए। बीस दिनों के पश्चात नाव तट पर पहुंची। अबुसीर और अबुक़ीर नाव से उतरे और एक कारवांसराय की ओर गए और एक कमरा किराये पर लिया। अबुक़ीर कमरे में पहुंचते ही लेट कर सो गया। अबुसीर बाज़ार गया और रोटी और मांस ख़रीद कर सराय लौटा। उसने खाना पकाया और दस्तरख़ान बिछा कर अबुक़ीर को उठाया। अबुक़ीर ने खाना खाया और वह फिर सो गया। इस प्रकार चालीस दिन बीत गए। इस दौरान अबुसीर हर दिन नगर में घूमता और काम करता और अबुक़ीर घर में बैठा खाता, सोता और कहता थाः नाव की यात्रा के कारण अभी तक बीमार हूं मेरा सिर दर्द करता है। इस प्रकार चालीस दिन और बीत गए। इक्यासिवें दिन अबुसीर काम की थकान के कारण बीमार पड़ गया और उसमें घर से निकलने की भी शक्ति नही थी। कारवांसराय के द्वाररक्षक को बुलाया और उससे अपने लिए खाना लाने का अनुरोध किया। अबुक़ीर इसी प्रकार पड़ा पड़ा सोता रहता और अपने स्थान से हिलता भी न था। अबुसीर की बीमारी को चार दिन हो चुके थे। इस दौरान कारवांसराय का द्वाररक्षक अबुसीर के निवेदन पर उनके लिए बाज़ार से खाना ले आता था। पांचवे दिन अबुसीर बीमारी बढ़ने के कारण बेहोश हो गया। अबुक़ीर को भी खाने को कुछ न मिला और वह भी भूख के कारण कमज़ोरी का आभास करने लगा। स्वयं को अबुसीर के सिरहाने पहुंचाया। उसके जेब को टटोला और कुछ सिक्के उसे मिल गए। सिक्के लिए और कमरे से निकल गया और कमरे में ताला लगा दिया और बिना कुछ कहे कारवांसराय से निकल गया। बाज़ार गया वहां नया कपड़ा ख़रीदा और उसे पहन कर नगर में घूमने फिरने लगा। ………..