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    नाई और रंगरेज़-3

    नाई और रंगरेज़-3
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    पिछली कड़ी में हमने आपको बताया था सिकंदरिया नगर में दो मित्र अबूक़ीर रंगरेज़ और अबूसीर नाई रहते थे। अबूक़ीर एक धोकेबाज़ व झूठा आदमी था। किन्तु अबूसीर सुशील एवं सच्चा व्यक्ति था। बाज़ार में मंदी के कारण वे दोनों एक दूसरे शहर चले गए। यात्रा के दौरान अबूक़ीर खाता और सोता रहता था जबकि अबूसीर काम करता था। परन्तु अधिक काम करने के कारण वह बीमार पड़ गया, अबूक़ीर कि जो ग़लत आदमी था उसने अबूसीर के पैसों को लिया कमरे को ताला लगाया और उसे बीमारी की हालत में छोड़ कर काम की खोज में चला गया, और चूंकि उस शहर के रंगरेज़ केवल काले रंग के अतिरिक्त कोई दूसरा रंग करना नहीं जानते थे इस लिए उसे राजा की सहायता से अच्छा काम मिल गया। संक्षेप में इस प्रकार अबूक़ीर ने अच्छा पैसा कमाया। शहर भर में अबूक़ीर का बोलबाला हो गया और उसकी दुकान राजा के घर के रंग के नाम से प्रसिद्ध हो गई।

    लेकिन चलिए देखते हैं कि अबूसीर का क्या हाल हुआ? जब अबूक़ीर उसे बीमारी की हालत में छोड़ कर चला गया तो वह तीन दिन तक बेहोशी की हालत में पड़ा रहा। चौथे दिन उसे होश आया तो उसने कराहना शुरु कर दिया। सराय का चौकीदार कमरे के पास से गुज़र रहा था। उसने कराहने की आवाज़ सुनी। कमरे के पास आया और देखा कि उसका दरवाज़े पर ताला लगा हुआ है। उसने चाबी लाकर ताला खोला और कमरे के अंदर गया। देखा कि अबूसीर बेसुध पड़ा है और कराह रहा है। उसने पूछा कि तुम्हारा दोस्त कहा हैं? अबूसीर ने उत्तर दिया मुझे कुछ नहीं पता, काफ़ी समय से में बेहोश था। मुझे आज होश आया और मैंने किसी को यहां नहीं पाया। मुझे बहुत भूख लगी है। इधर आओ और मेरी जेब से थैली निकालो। उसमें से पैसे निकालो और मेरे लिए खाना ले आओ। चौकीदार ने थैली को अबूसीर की जेब से निकाला, किन्तु थैली ख़ाली थी। अबूसीर समझ गया कि अबूक़ीर पैसे ले उड़ा। अबूसीर ने एक आह भरी और कहा वह मेरे पैसे लेकर भाग गया है। फिर उसने रोना धोना शुरू कर दिया। चौकीदार ने उसे दिलासा दिया और कहा चिंता मत करो ईश्वर उसके काम का उसे दंड देगा। उसके बाद वह कमरे से बाहर गया और एक प्याला गर्म सूप के साथ वापस आया। अबूसीर ने गर्म सूप खाया और उसके लिए दुआ की। सराय का चौकीदार कई दिन तक अबूसीर के लिए खाना औ पानी लाता रहा और उसकी देखभाल करता रहा। धीरे धीरे अबूसीर की हालत ठीक हो गई। उसने सेवा के लिए चौकीदार का आभार प्रकट किया और कहा हे भाई, यदि ईश्वर ने मुझे शक्ति प्रदान की तो मैं तुम्हारे उपकारों का प्रतिफल दूंगा। चौकीदार ने कहा मैंने जो कुछ भी सेवा की है वह ईश्वर की प्रसन्नता के लिए की है। अब मैं ईश्वर का धन्यवाद करता हूं कि तुम स्वस्थ हो गए। अबूसीर सराय से बाहर निकला, बाज़ार गया और इधर उधर देखने में व्यस्त हो गया। अचानक अबूक़ीर की दुकान पर पहुंचा। उसने देखा दुकान के सामने लोगों की भीड़ लगी है। आगे बढ़कर एक व्यक्ति से पूछा यहां क्या है और लोग यहां क्यों इकट्ठा हैं। एक आदमी ने उत्तर दिया, यहां राजा का रंगखाना है, अबूक़ीर नामक एक आदमी इसका स्वामी है। वह एक कुशल रंगरेज़ है। एक दूसरे शहर से यहां आया है और ऐसे रंगों में निपुण है जिन्हें हमारे नगर का कोई भी रंगरेज़ नहीं कर सकता। लोग उसकी दुकान के पास इस लिए इकट्ठे हुए हैं ताकि उसे कपड़ों पर रंग करते हुए देखें। अबूसीर को अपने दोस्त का नाम सुनकर प्रसन्नता हुई। फिर उसने स्वयं से कहा, अबूक़ीर के मेरे पास न आने का कारण यह है कि वह अपने काम में अधिक व्यस्त था, किन्तु निश्चित ही वह मेरी अच्छाईयों को भूला नहीं है। उस समय कि जब वह रोगी था मैं काम करता था और उसका खर्च उठाता था। अब यदि मुझे देखेगा तो प्रसन्न हो जायेगा। अबूसीर यह सोचकर दुकान के अंदर गया। देखा कि अबूक़ीर एक ऊंची कुर्सी पर बैठा हुआ है आठ सेवक सर झुकाए हुए उसके निकट खड़े हैं और दस कारीगर काम में व्यस्त हैं। आगे बढ़ा और अबूक़ीर के सामने खड़ा हो गया उसे प्रतीक्षा थी कि उसका दोस्त उसे देखकर प्रसन्न हो जायेगा। किन्तु जैसे ही अबूक़ीर ने उसे देखा तो चिल्लायाः अबे बदनाम चोर फिर से तू दुकान में आ गया? क्या मैंने नहीं कहा था दोबारा दुकान में क़दम नहीं रखना। उसके बाद उसने सेवकों की ओर देखा और चिल्लाकर कहा तुरन्त इस आदमी को पकड़ो और मेरी दुकान से बाहर फेंक दो। सेवकों ने अबूसीर को पकड़ा और जैसे ही दुकान से बाहर फेंकना चाहा अबूक़ीर चिल्लाया उसे मेरे पास लाओ, सेवकों ने अबूसीर के हाथ बांधे और अबूक़ीर के समक्ष ले गए। अबूक़ीर ने जो छड़ी अपने हाथ में पकड़ी हुई थी उठाई अबूसीर के पेट पर कई बार मारी और कहा यदि पुनः इधर दिखाई दिया तो तुझे राजा के पास भेज दूंगा ताकि तेरे सर काटने का आदेश जारी करे। अबूसीर अचंभे और अविश्वास से अबूक़ीर को देखता रह गया और ख़ामोश रहा। अबूक़ीर के सेवको ने उसे दुकान से बाहर फेंक दिया। जो लोग दुकान में थे उन्होंने अबूक़ीर से पूछा, उस व्यक्ति ने क्या किया था जो तमुने इस प्रकार उसके साथ आचरण किया? अबूक़ीर ने कहा उसने कई बार मेरी दुकान में चोरी की है और लोगों के कपड़े ले गया है। हर बार मैंने लोगों का नुक़सान भरा है और बहुत ही विनम्रता से उससे कहा कि चोरी छोड़ दे। किन्तु उसने बुरा काम नहीं छोड़ा और फिर से मेरी दुकान में चोरी करने आ गया। इस कारण मैंने इस बार उसे सज़ा दी है, ईश्वर की सौगंध यदि फिर से वह यहां दिखाई दिया तो राजा के पास भेज दूंगा ताकि वह उसे दण्डित करे। अबूसीर टूटे हुए दिल और घायल अवस्था में सराय वापस लौट गया। कुछ दिन तक अपने कमरे में रहा और आराम किया ताकि उसके घाव भर जाएं। उसके बाद सराय से बाहर निकला ताकि स्नानगृह जाए। एक व्यक्ति से पूछा स्नानगृह कहा हैं? उस व्यक्ति ने आश्चर्य से पूछा स्नानगृह क्या होता है? अबूसीर ने कहा, स्नानगृह वह स्थान होता है जहां स्नान करते हैं। उस व्यक्ति ने कहा हम स्नान के लिए नदी पर जाते हैं, अबूसीर समझ गया कि इस शहर में स्नानगृह नहीं है और यहां के निवासी स्नानगृह के बारे में नहीं जानते। उसे एक विचार सूझा और वह राजा के महल गया तथा भेंट की अनुमति मांगी। उसे राजा के पास ले गए… जारी है।