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    निफ़ास

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    514. बच्चे का पहला हिस्सा, माँ के पेट से बाहर आने के वक़्त से, जो ख़ून औरत को आए अगर वह दस दिन से पहले या दसवें दिन के खात्मे पर बन्द हो जाए तो वह ख़ूने निफ़ास है और निफ़ास की हालत में औरत को (नफ़्सा) कहते हैं।

    515. जो ख़ून औरत को बच्चे का पहला हिस्सा बाहर आने से पहले आए वह निफ़ास नहीं है।

    516. यह ज़रुरी नहीं है कि बच्चे की खिल्क़त मुकम्मल हो, बल्कि उसकी खिल्क़त नामुकम्ल हो, तब भी अगर उसे बच्चा जनना, कहा जा सकता हो, तो वह ख़ून जो औरत को दस दिन तक आए ख़ूने निफ़ास है।

    517. यह हो सकता है कि ख़ूने निफ़ास एक लह्ज़ा से ज़्यादा न आए, लेकिन वह दस दिन से ज़्यादा नही आता।

    518. अगर किसी औरत को शक हो कि इस्क़ात(गर्भ पात) हुआ है, या नही, या जो इस्क़ात हुआ, वह बच्चा था या नही, तो उसके लिए तहक़ीक़ करना ज़रुरी नहीं है और जो ख़ून उसे आए वह शरअन निफ़ास नहीं है।

    519. मस्जिद में ठहरना और वह दूसरे काम जो हाइज़ पर हराम हैं, एहतियात की बिना पर नफ़्सा पर भी हराम हैं और जो कुछ हाइज़ पर वाजिब है, वह नफ़्सा पर भी वाजिब है।

    520. जो औरत निफ़ास की हालत में हो, उसे तलाक़ देना और उससे जिमाअ(संभोग) करना हराम है, लेकिन अगर उसका शौहर उससे जिमाअ करे तो उस पर बिला इश्काल कफ़्फ़ारा नहीं।

    521. जब औरत निफ़ास के ख़ून से पाक हो जाए तो उसे चाहिए कि गुस्ल करे और अपनी इबादत बजा लाए और अगर बाद में एक या एक से ज़्यादा बार ख़ून आए तो ख़ून आने वाले दिनो को पाक रहने वाले दिनो से मिलाकर अगर दस दिन से कम हो तो सारा ख़ूने निफ़ास है। बीच में पाक रहने के दिनो में एहतियात की बिना पर जो काम पाक औरत पर वाजिब है उन्हें अंजाम देना ज़रूरी है, और जो काम नफ़्सा  पर हराम है उन्हें तर्क करे और अगर उन दिनो में कोई रोज़ा रखा है तो ज़रूरी है कि उसकी कज़ा करे। अगर बाद में आने वाला ख़ून दस दिन से ज़्यादा आए और वह औरत अदद की आदत न रखती हो तो ख़ून की वह मिक़्दार जो दस दिन के अन्दर आई है उसे निफ़ास और दस दिन के बाद आने वाले ख़ून को इस्तिहाज़ः क़रार दें। अगर वह औरत अदद की आदत रखती हो तो ज़रूरी है कि एहतियातन आने वाले ख़ून की तमाम मुद्दत में जो काम मुस्तहाज़ः के लिए हैं उन्हें अंजाम दे और जो काम नफ़्सा पर हराम है, उन्हे तर्क करे।

    522. अगर औरत ख़ूने निफ़ास से पाक हो जाए और एहतेमाल हो कि उसके बातिन में ख़ूने निफ़ास है, तो उसे चाहिए कि कुछ रूई अपनी शर्मगाह मे दाखिल करे और कुछ देर इन्तिज़ार करे फिर अगर वह पाक हो तो इबादत के लिए गुस्ल करे।

    523. अगर औरत को निफ़ास का ख़ून दस दिन से ज़्यादा आए और वह हैज़ में आदत रखती हो तो आदत के बराबर दिनो की मुद्दत निफ़ास और बाक़ी इस्तिहाज़ः है और अगर आदत ना रखती हो तो दस दिन तक निफ़ास और बाक़ी इस्तिहाज़ः है। एहतियाते मुस्तहब यह है कि जो औरत आदत रखती हो वह आदत के बाद के दिन से और जो औरत आदत ना रखती हो वह दसवें दिन के बाद से बच्चे की पैदाइश के अट्ठारवें दिन तक इस्तिहाज़ः के काम अंजाम दे और वह काम जो नफ़्सा  पर हराम है उन्हें तर्क करे।

    524. अगर किसी ऐसी औरत को, जिसकी हैज़ की आदत दस दिन से कम हो उसकी आदत से ज़्यादा ख़ून आए तो उसे चाहिए कि अपनी आदत के दिनो की तादाद को निफ़ास क़रार दे, उसके बाद उसे इख़्तियार है कि दस दिन तक नमाज़ को तर्क करे या मुस्तहाज़ः के अहकाम पर अमल करे, लेकिन एक दिन की नमाज़ तर्क करना बेहतर है और अगर ख़ून दस दिन के बाद भी आता रहे तो उसे चाहिए कि आदत के दिनों के बाद दसवें दिन तक भी इस्तिहाज़ः क़रार दे और जो इबादत वह उन दिनों में बजा नहीं लाई है, उनकी क़ज़ा करे। मसलन जिस औरत की आदत छः दिनो की हो अगर उसे छः दिन से ज़्यादा ख़ून आए तो उसे चाहिए कि छः दिन को निफ़ास क़रार दे और सातवें, आठवें, नवें और दसवें दिन उसे इख़्तियार है कि या तो इबादत तर्क करे या इसतिहाज़ः के काम बजा लाए और अगर उसे दस दिन से ज़्यादा ख़ून आया हो तो उसकी आदत के बाद के दिन से वह इस्तिहाज़ः  होगा।

    525. जो औरत हैज़ में आदत रखती हो अगर उसे बच्चा जनने से बाद एक महीने या एक महीने से ज़्यादा मुद्दत तक लगातार ख़ून आता रहे तो उसकी आदत के दिनों की तअदात के बराबर ख़ूने निफ़ास है और जो ख़ून, निफ़ास के बाद दस दिन आए चाहे वह उसकी माहाना आदत के दिनों में आया हो इस्तिहाज़ः है। मसलन ऐसी औरत जिसके हैज़ की आदत हर महीने बीस तारीख़ से सत्ताइस तारीख़ तक हो अगर वह महीने की दस तारीख को बच्चा जने और एक महीने या उससे ज़्यादा मुद्दत तक उसे मुतवातिर ख़ून आए तो सत्तरहवीं तारीख़ तक निफ़ास और सत्तरहवीं तारीख से दस दिन का ख़ून हत्ताकि वह ख़ून भी जो बीस से सत्ताइस तक उसकी आदत के दिनों में आया है इस्तिहाज़ः होगा और दस दिन गुज़रने के बाद जो ख़ून उसे आए अगर वह आदत के दिनों में हो तो वह हैज़ है चाहे उसमें हैज़ की निशानियाँ हों या न हों और अगर वह ख़ून उसकी आदत के दिनों में आया दो तो उसके लिए ज़रूरी है कि अपनी आदत के दिनों का इन्तिज़ार करे अगरचे उसके इन्तिज़ार की मुद्दत एक महीना या एक महीने से ज़्यादा हो जाए और चाहे उस मुद्दत में जो ख़ून आए उसमे हैज़ की निशानयाँ हों और अगर वह वक़्त की आदत वाली औरत न हो और उसके लिए मुम्किन हो तो ज़रूरी है कि वह अपने हैज़ की निशानियों के ज़रीए मुअय्यन करे और अगर मुम्किन न हो जैसा कि निफ़ास के बाद दस दिन जो ख़ून आए वह सारा एक जैसा हो और एक महीना या चन्द महीने उन्हीं निशानियों के साथ आता रहे तो ज़रूरी है कि हर महीने में अपने कुंबे की कुछ औरतों के हैज़ की जो सूरत हो वही अपने लिए क़रार दे और अगर यह मुम्किन न हो जो अदद अपने लिए मुनासिब समझती है इख़्तियार करे और इन तमाम उमूर की तफ़्सील हैज़ की बह्स मे गुज़र चुकी है।

    526. जो औरत हैज़ में अदद के लिहाज़ से आदत न रखती हो अगर उसे बच्चा जनने के बाद एक महीने तक या एक महीने से ज़्यादा मुद्दत तक ख़ून आए तो उससे पहले दस दिनों के लिए वही हुक्म है जिसका ज़िक्र म.न. 523 मे आ चुका है और दूसरी दहाई में जो ख़ून आए वह इस्तिहाज़ः है और जो ख़ून उसके बाद आए मुम्किन है वह हैज़ हो मुम्किन है इस्तिहाज़ः हो और हैज़ क़रार देने के लिए ज़रूरी है कि उस हुक्म के मुताबिक अमल करे जिसका ज़िक्र पिछले मस्अले में गुज़र चुका है।