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    न्यायी राजा

    न्यायी राजा
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    पुराने समय की बात है एक राजा था जो बहुत ही न्यायी, ईमानदार और प्रजाप्रेमी था। उसके शासन काल में जनता बहुत ही प्रसन्न जीवन बिताती थी और किसी पर अत्याचार नहीं होता था। संयोग से एक वर्ष सूखा पड़ गया। सोतों के पानी सूख गए और नदियों में पानी का स्तर गिर गया। किसानों की ज़मीनें पानी के अभाव में फट गयीं, उनके उत्पाद सूख गए और चौपाये मर गए। सूखे का प्रभाव धीरे-धीरे इतना बढ़ा कि इसका प्रभाव लोगों पर पड़ने लगा। भूख ने लोगों पर पूरी शक्ति से यलग़ार किया और उनके जीवन की सुरक्षा ख़तरे में पड़ गयी। राजा के पास जो कुछ सोना-चादी था लोगों पर ख़र्च कर दिया। यहां तक कि उसके पास अपनी प्रजा की सहायता करने के लिए एक अतिमूल्यवान रत्न के सिवा और कुछ न बचा जो उसकी अंगूठी में जड़ा था। वह रत्न इतना बहुमूल्य था कि उसके जैसा रत्न दुनिया में कहीं नहीं मिलता। राजा सोच-विचार में पड़ गया। बहुत सोचने के बाद वह इस निष्कर्श पर पहुंचा कि अपनी अंगूठी के रत्न को पड़ोसी देश को बेच दे और उसके पैसों से प्रजा को भूख से मुक्ति दिलाए। न्यायी राजा के लिए प्रजा की भूख को सहन करना बहुत कठिन था। उससे यह नहीं हो सकता था कि वह आराम का जीवन बिताए और उसकी अंगूठी में मूल्यवान रत्न होते हुए उसकी प्रजा भूखी रहे।

    राजा के दरबारियों व निकटवर्तियों ने राजा को रत्न बेचने से रोकते हुए कहाः हे न्यायी राजा यह काम मत कीजिए। यह रत्न बहुमूल्य है। यदि इसे बेच दिया तो इसके जैसा रत्न आपको नहीं मिल पाएगा। राजा ने अपने निकटवर्तियों की बात पर ध्यान नहीं दिया और रत्न को एक पड़ोसी देश को बेच कर उससे प्राप्त धन से सूखाग्रस्त अपनी प्रजा के लिए रोटी का प्रबंध किया और थोड़े समय के लिए प्रजा को भूख से राहत मिली। प्रजा ने ईश्वर का आभार व्यक्त किया और न्यायी राजा की बाक़ी आयु के लिए दुआ की। राजा के निकटवर्तियों ने राजा की आलोचना भरे स्वर में कहाः न्यायी राजा आपने देखा कि किस प्रकार मूल्यवान रत्न बर्बाद हो गया। उससे प्राप्त धन मात्र एक हफ़्ते में ख़त्म हो गया। जितने में रत्न बेचा था उससे कहीं अधिक उसका मूल्य था। लोग तो भूख को सहन कर रहे थे एक सप्ताह और सहन करते। इस रत्न का जनता की स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह सूखे के विरुद्ध ढाल न बन सका। राजा अपने निकटवर्तियों की बातों से बहुत आहत हुआ। राजा ने अप्रसन्न होकर अपना सिर झुका लिया और उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसरे निकटवर्तियों को संबोधित करते हुए कहाः बहुत बुरी व अप्रिय बात है कि लोग कठिनाइयों में हों और राजा साज-सज्जा के चक्कर में रहे। मैं बिना अंगूठी के रह सकता हूं मगर प्रजा की कठिनाइयां मुझसे नहीं देखी जा सकतीं। राजा के निकटवर्ती भी उसकी बात सुनकर रोए। निकटवर्तियों ने राजा की प्रशंसा की, उसके लिए दुआ की और ज़मीन पर ईश्वर का सज्दा किया। उन सबने ईश्वर से सूखा से मुक्ति देने की प्रार्थना की। राजा जो अपने निकटवर्तियों के बीच प्रार्थना में लीन था, प्रार्थना के पश्चात कहाः मित्रो! यह बात सदैव याद रखो कि हम जनता के सेवक हैं। जनता ने इसलिए प्रशासन हमारे हाथ में सौंपा है कि हम उसके और इस भूमि के लिए परिश्रम करें और कठिनाइयों से संघर्ष करें। प्रजा भी हर कठिनाई और युद्ध के समय हमारे साथ थी। जिस प्रकार प्रजा कठिनाइयों में हमारे साथ थी हमें भी कठिनाइयों व विपत्तियों में उसके साथ होना चाहिए। कभी भी एक क्षण के लिए निर्धन जनता की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।