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    पक्षी और शिकारी

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    पुराने समय की बात है एक पक्षी अच्छी जलवायु वाली जगह ढूंढ़ने के उद्देश्य से अपने मित्रों से अलग हो गया। वह एक हरे- भरे बग़ीचे में पहुंचा और रहने के लिए उसी स्थान को चुन लिया। पक्षी कुछ क़दम की दूरी पर एक शिकारी ने जाल बिछा रखा था और थोड़ा सा गेहूं जाल के भीतर बिखेर कर वह पक्षियों की प्रतीक्षा में बैठा था। वह किसी को दिखाई न दे इसलिए शिकारी ने स्वयं को वृक्षों के पत्तों और हरी घास आदि से छिपा रखा था ताकि दूर से एक हरी- भरी-झाड़ी प्रतीत हो। पक्षी ने शिकारी को देख लिया और समझ गया कि वह झाड़ी नहीं बल्कि एक मनुष्य है। शिकारी जब यह समझ गया कि उसके सामने चालाक व चतुर पक्षी है और उसकी चाल का रहस्य खुल गया है तो उसने झूठ बोलना आरंभ कर दिया और स्वयं को दुनिया की मोह- माया से मुक्त त्यागी बताने लगा। उसने पक्षी से कहा मेरा पड़ोसी अचानक मर गया और उसके परिणाम में मेरे अंदर यह आध्यात्मिक बदलाव आ गया है और मैंने स्वयं को दुनिया की मोह- माया से मुक्त कर लिया है। मैं इस बग़ीचे में आया और शांति से ईश्वर की उपासना में लीन हो गया। शिकारी ने फिर कहा, काफी समय तक मैंने एश्वर्य में जीवन बिताया है अतः मैंने निर्णय किया कि ईश्वर के लिए कुछ समय तक अपने शरीर को कठिनाइयॉ सहन करने का आदी बनाऊं ताकि मेरा आध्यात्मिक विकास हो सके। इस पर पक्षी ने कहा यदि तुम्हारे स्थान पर मैं होता तो घर में रहता। मेरी दृष्टि में तुमने जो रास्ता चुना है वह ग़लत है। इस पर शिकारी ने कहा क्यों? क्या ईश्वर की उपासना करना ग़लत कार्य है? पक्षी ने कहा ईश्वर की उपासना ग़लत कार्य नहीं है परंतु तुम्हारा कार्य सही नहीं है। धार्मिक हस्तियों ने कहा है कि दुनिया को छोड़कर वैरागी बन जाना ग़लत कार्य है। ईश्वर ने तुम्हें लोगों के मध्य जीवन व्यतीत करने के लिए पैदा किया है। क्या धार्मिक हस्तियों ने नहीं कहा है कि यदि लोगों के मध्य रहकर और सामूहिक रूप से उपासना की जाये तो उसका पुण्य अधिक है? तुम्हें चाहिये कि लोगों के मध्य जाओ, उनके साथ रही और लोगों के दुख-सुख में शामिल रहो। पक्षी कहता जा रहा था उसने शिकारी को बहुत सारा उपदेश दे डाला। उसे इस बात का पता ही नहीं था कि वह एक निर्दयी शिकारी है न कि उपासक। शिकारी का हृदय पक्षी की नसीहत व उपदेश सुनते- सुनते थक गया था वह चाहता था कि छलांग लगाकर पक्षी को पकड़ ले परंतु वह ऐसा नहीं कर सकता था। क्योंकि उसके और पक्षी के बीच की दूरी इतनी नहीं थी कि वह पक्षी को पकड़ लेता। वह इस प्रतीक्षा में बैठा रहा कि पक्षी शायद गेहूं का दाना खाना के लिए जाल को ओर जाए और फंस जाये। पक्षी शिकारी को उसी तरह नसीहत करता जा रहा था कि अचानक उसकी दृष्टि गेहूं के दानों पर पड़ गयी और उसने शिकारी से पूछा ये दाने कैंसे हैं? क्या तुम इन दानों को खाते हो? शिकारी ने, जो यह सोच रहा था कि वह अपने लक्ष्य से निकट हो रहा है, प्रसन्नता से कहा नहीं ये दाने मेरे नहीं हैं! यदि तुम सच में जानना चाहते हो तो ये दाने अनाथों के हैं। पक्षी ने कहा अनाथों के? तो ये दाने तुम्हारे पास क्या कर रहे हैं? शिकारी ने कहा चूंकि लोग मुझ पर विश्वास करते हैं इसलिए उन्होंने ये दाने मेरे पास अमानत रखे हैं। पक्षी ने कहा यानी तुम यह कहना चाहते हो कि ये दाने अनाथों के हैं और उनका खाना मेरे जैसे यात्री पक्षी के लिए भी हराम है? इस पर शिकारी ने कहा सही पूछो तो मैं यह बात ठीक से नहीं जानता। शायद हराम हो, शायद हराम न हो! पक्षी ने कहा प्रिय वैरागी तुम किस तरह नहीं जानते? तुम एक ईमान वाले आदमी हो। तुम ईश्वर से निकट व्यक्ति हो, तुम्हें जानना चाहिये कि जो पक्षी भूखा- प्यासा है उसके लिए अनाथों का माल हराम नहीं है। यदि मैं इन दानों में से केवल कुछ दाने खा लूं तो क्या आसमान ज़मीन पर आ जायेगा और ईश्वर की सृष्टि को आघात पहुंच जायेगा? नहीं, निश्चित है कि नहीं पहुंचेगा। इन दानों का खाना मेरे लिए न केवल हराम नहीं है बल्कि ईश्वर भी इससे प्रसन्न होगा। हां इस प्रकार के गेहूं के दाने मेरे जैसे पक्षियों के लिए हलाल है।हलाल बिल्कुल हलाल ! शिकारी ने कहा इस विषय का संबंध तुमसे है। तुम्हें मेरी क़ब्र में या मुझे तुम्हारी क़ब्र में नहीं डाला जायेगा। यदि तुम इन दानों को खाना चाहते हो खाओ परंतु अपनी ज़िम्मेदारी पर। यानी यदि तुम इन दानों को खाते हो और बाद में गेहूं के मालिक आये और दानों को गिनों तथा पूछे कि ये दाने कम क्यों हैं? तो तुम्हीं उचित उत्तर देना। चूंकि यदि तुम इसकी ज़िम्मेदारी नहीं लेते हो और गेहूं खाकर चले जाते हो तो गेहूं के मालिक सोचेंगे कि मैंने उन्हें खा लिया है। उस समय लोगों का मुझ पर से विश्वास उठ जायेगा। इस आधार पर तुम्हें कुछ सोचना चाहिये। गेहूं खाने की ज़िम्मेदारी स्वीकार करने के लिए तुम्हें मुझे एक गारंटी देनी होगी।