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    पराई चूपड़ी

    पराई चूपड़ी
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    पुराने समय की बात है एक नगर में एक बहुत ही निर्धन व्यक्ति रहता था जिसका पेशा पानी भरना था। वह पानी भर कर बड़ी मुश्किल से इतना कमा पाता था कि अपना और अपने बच्चों का पेट भर सके। इस निर्धन पानी बेचने वाले के पास एक गधा था। उसका गधा बहुत दुबला-पतला था। हर दिन पानी की कुछ मश्कें भरता और गधे पर लाद कर बेचने के लिए लोगों के घर के द्वार पर जाता था। बिचारा गधा बोझ लाद कर ले जाने और ताज़ा चारा न मिलने के कारण सूख कर काँटा हो गया था। उसकी पीठ पर काठी भी न थी। दुबलापे के कारण जीवन से थक गया था। चौबीस घंटे में केवल थोड़ी सूखी घास-पात खा लेता था। बेचारा गधा दिन में हज़ार बार मरने की दुआ करता था किन्तु उसकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होती थी। भूखे रह कर बोझ खींचता मगर कुछ नहीं कहता था। जानता था कि उसका स्वामी एक अच्छा व्यक्ति है किन्तु निर्धन है जो उसे पेट भर खाना नहीं दे सकता या उसके लिए जौ और ताज़ा चारा ख़रीद सके। बेचारा गधा काम करता, बोझ ढोता, तकलीफ़ उठता लेकिन कुछ न कहता।

    एक दिन की बात है गधे के मालिक की राजा के दरबार में सेना और बड़े अधिकारियों के घोड़ों के तबेले के प्रबंधक से मार्ग में भेंट हो गयी। तबेले के प्रबंधक की गधे के मालिक से पुरानी जान-पहचान थी।

    तबेले के प्रबंधक की नज़र जब पानी भरने वाले के गधे पर पड़ी तो उसे गधे पर बहुत दया आयी। बेचारे गधे की कमज़ोरी व दुबलेपन का उसके मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उसने पानी भरने वाले से गधे के दुबलेपन और कमज़ोरी का कारण पूछा। पानी भरने वाले ने बहुत ही दुख भरे मन से अपने सिर को कई बार हिलाया और कहाः भाई इन सबके पीछे कारण निर्धनता है। निर्धनता के कारण इस गधे को भर पेट चारा नहीं दे पाता। तबेले के प्रबंधक का मन करुणामय हो गया और उसने कुछ सिक्के पानी भरने वाले के हाथ पर रख दिए और कहाः प्रिय मित्र! ये पैसे रखो और कुछ दिन के लिए अपने गधे को काम से आज़ाद कर दो और मेरे हवाले कर दो ताकि कुछ दिन इसे राजा के तबेले में छोड़ दूं। अच्छा चारा खाने और आराम मिलने से शक्तिशाली हो जाएगा और फिर तुम इससे दोबारा काम ले सकोगे। पानी भरने वाले निर्धन व्यक्ति ने बड़ी ख़ुशी से इस सुझाव को स्वीकार कर लिया और अपना गधा तबेले के प्रबंधक के हवाले कर दिया ताकि वह राजशाही तबेले की सैर कर ले। जानता था कि वहां पर उसका गधा मोटा-तगड़ा हो जाएगा और जी भर कर ताज़ा चारा खा सकेगा। बेचारे पानी भरने वाले ने अपने मन में कहाः अच्छा ही हुआ! जाने देते हैं ताकि वहां शाही भोजन करे और उसमें कुछ जान आ जाए ताकि अचानक न मरे।

    तबेले के प्रबंधक ने पानी भरने वाले के गधे को अधिकारियों व सैनिकों के लंबे तगड़े घोड़ों के पास बांध दिया। बेचारे गधे ने जिसे अब तक जौ और हरा चारा नसीब नहीं हुआ था बड़ी ख़ुशी से चारों ओर मुंह चलाने लगा। हर ओर उसे बड़े-बड़े घोड़े दिखाई दे रहे थे। गधे ने गहरी सांस भरते हुए कहाः काश! मैं भी इन घोड़ों जैसा होता और इस सुंदर तबेले में जौ और हरे चारे खाता और बिना किसी काम के आराम करता। न बोझ उठाने की झंझट होती और न ही कोड़े खाता। काश! यहां सदैव रहने के लिए मिल जाए और यहीं पर वास्तविक सौभाग्य का आनंद लेता। गधा यह सब कह रहा था और घोड़ों की स्थिति देख कर उनके जैसे सौभाग्य की कामना कर रहा था और इस बात पर उसे दुख था कि ईश्वर ने उसे घोड़ा नहीं बनाया। अचानक गधे ने तबेले में एक शोर सुना। क्या देखता है कि कुछ लोग आए और उन्होंने घोड़े पर ज़ीन कसी और ले कर चले गए। गधे ने वहां मौजूद बूढ़े घोड़े से पूछाः इन घोड़ों को कहां ले गए हैं? बूढ़े घोड़े ने कहाः काम के लिए, रणक्षेत्र ले गए हैं। क्या तुम समझ रहे थे कि यूंही घोड़ों की देख भाल की जा रही थी और उन्हें चारे दिए जा रहे थे। वह दिन गुज़र गया और अगले दिन घोड़ों को तबेले में वापस छोड़ दिया गया। सभी घोड़े घायल और थके हुए थे क्योंकि रणक्षेत्र में युद्ध के समय उनके जिस्म पर भी तीर लगे थे और नाल लगाने वाले धारदार खंजर को आग में धिका कर उनके जिस्म से तीर निकाल रहे थे। जब गधे ने यह दृष्य देखा और घोड़ों की हृदयविदारक चीख़ सुनी तो जो उसने ईश्वर से घोड़ा बनने की इच्छा की थी उस पर पछताया और कहाः ईश्वर मैं अपनी निर्धन स्थिति में ही संतुष्ट हूं और मैं घोड़ों को पड़ने वाली मुसीबत में नहीं पड़ना चाहता।