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    परिवार का गठन

    परिवार का गठन
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    अगर आपको याद हो तो पिछले कार्यक्रम में हमने कहा था कि ईश्वरीय धर्म इस्लाम की दृष्टि में परिवार का गठन बहुत महत्व रखता है। जनसंख्या की दृष्टि से यद्यपि परिवार बहुत छोटा समाज है परंतु एक अच्छे समाज के गठन के लिए इस्लाम ने परिवार के गठन पर विशेष ध्यान दिया है।

    परिवार आराम व शांति का घर है और परिवार समाज की इकाई होता है। यहां पर यह सवाल किया जा सकता है कि परिवार का गठन कब होता है तो इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि परिवार का गठन उस वक्त होता है जब दो व्यक्ति एक दूसरे से विवाह करते हैं और दोनों विवाह के पवित्र बंधन में बंध जाते हैं।

    अच्छे समाज के गठन के लिए इकाई का अच्छा होना ज़रूरी है। उदाहरण स्वरूप अगर एक मकान में लगी समस्त ईंटे अच्छी होती हैं तो मकान मज़बूत होता है लेकिन अगर कुछ ईंटे खराब हों तो उनका प्रभाव पूरे मकान पर पड़ेगा। उसी तरह परिवार समाज की इकाई है अगर हम यह चाहते हैं कि समाज अच्छा हो तो सबसे पहले हमें उसकी इकाई की भलाई और उसके अच्छा होने के बारे में सोचना और उसके लिए प्रयास करना चाहिये। आज के कार्यक्रम में हम संयुक्त जीवन के अच्छे व सही सिद्धांतों की चर्चा करेंगे।
    इस्लाम की दृष्टि में परिवार गठन का आरंभिक बिन्दु विवाह है। विवाह के बाद पति-पत्नी की एक दूसरे पर बहुत सी ज़िम्मेदारियां एवं अधिकार हो जाते हैं। यहां पर महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम यह देंखे कि महिला और पुरूष विवाह क्यों करते हैं? क्या विवाह केवल सामाजिक परंपरा को निभाने के लिए किया जाता है या स्वाभाविक व प्राकृतिक आवश्यकता के कारण?

    विवाह लोग विभिन्न कारणों से करते हैं। कुछ लोग केवल आर्थिक कारणों से विवाह करते हैं। समाज में एसे लोग भी मिल जायेंगे जो भौतिक आनंद उठाने के लिए अपनी जवान लड़की का विवाह पूंजीपति से कर देते हैं। इसी तरह कुछ लोग एसे भी हैं जो पैसे वाली लड़की से केवल उसके पैसे और ज़मीन के कारण विवाह कर लेते हैं जबकि कुछ लोग सामाजिक और राजनीतिक शक्ति प्राप्त करने के लिए विवाह करते हैं। कुछ लोग सुन्दरता के कारण विवाह करते हैं और वे किसी भी मानवीय व सामाजिक मूल्य पर ध्यान नहीं देते हैं। कुल मिलाकर कहना चाहिये कि जो लोग माल, दौलत, खुबसूरती या शक्ति प्राप्त करने के लिए विवाह करते हैं उनके परिवार का आधार विदित व भौतिक चीज़ें होती हैं और इस प्रकार का परिवार उसी समय तक बाकी रहता है जब तक यह चीज़ें बाकी रहेंगी। जो व्यक्ति खुबसूरती के कारण विवाह करता है उसके विवाह की मज़बूती उसी वक्त तक है जब तक वह खुबसूरती है परंतु जब खुबसूरती समाप्त हो जाती है तो पति पत्नी के बीच वह मोहब्बत नहीं रह जाती जो खुबसूरती के समय थी। फिर दोनों यदि दोनों एक दूसरे के साथ रहते हैं तब भी उनके जीवन की मिठास खत्म हो चुकी होती है परंतु यदि हम धर्म की शिक्षाओं पर ध्यान दें जिनमें कहा गया है कि विवाह का आधार प्रेम और ईमान होना चाहिये और विवाह का आधार भी वही चीज़ें हो तो पति पत्नी का जीवन सदैव सुखमय व आनंदित कर देगा। क्योंकि प्रेम व ईमान वह चीज़ें हैं जिन्हें कभी भी बुढापा नहीं आता है। इस्लाम धर्म सुन्दरता आदि का विरोधी नहीं है उसका कहना है कि विवाह का आधार सुन्दरता न हो वह यह नहीं कह रहा है कि पति- पत्नी को सुन्दर नहीं होना चाहिये और वे एक दूसरे के माल और सुन्दरता से लाभ न उठायें बल्कि सुन्दरता भी हो तो ईश्वर ने ही दी है। ईश्वरीय धर्म इस्लाम का केवल यह कहना है कि भौतिक चीज़ों को विवाह का आधार नहीं होना चाहिये।

    इस्लामी शिक्षाओं में इस बात पर बल देकर कहा गया है कि पति- पत्नी एक दूसरे के पूरक होते हैं। केवल भौतिक वासनाओं व आवश्यकताओं की पूर्ति से वे परिपूर्णता तक नहीं पहुंच सकते यहां तक कि केवल बच्चा पैदा होने से भी वे सुखी नहीं बन सकते। महान ईश्वर ने महिला और पुरुष की सृष्टि इस प्रकार से की है कि दोनों एक दूसरे के साथ रहकर एक दूसरे की शारीरिक व मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं। क्योंकि महान ईश्वर ने इंसान के अस्तित्व में प्रेम रखा है और वह परिवार में प्रकट होता है। सूरये रूम की २१वीं आयत में हम पढ़ते हैः ईश्वर की एक निशानी यह है कि तुम्हारे लिंग से ही तुम्हारी पत्नियां बनाईं ताकि तम्हें उनके पास आराम व शांति मिल सके और तुम्हारे बीच प्रेम रखा। इसमें चिंतन मनन करने वाले गुट के लिए निशानी है”

    जब पति- पत्नी दोनों एक दूसरे को समझने लगें, एक दूसरे पर विश्वास करने लगें और दोनों एक दूसरे के सुख- दुःख में बराबर के भागीदार हों तो उन दोनों के जीवन में मिठास भर जायेगी। यह वही मवद्दत व प्रेम है जिसकी बात पवित्र कुरआन करता है। महिला और पुरूष को एक दूसरे की आवश्यकता है और जब दोनों एक दूसरे को समझ लेते हैं तब सुख व शांति मिलती है। पति पत्नी के संयुक्त जीवन से भौतिक समस्याओं व आवश्कताओं का दूर करना आवश्यक है परंतु उसे बाक़ी व जारी रहने के लिए काफी नहीं है। महत्वपूर्ण मामला यह है कि पति- पत्नी के संयुक्त जीवन में प्रेम होना चाहिये और यह प्रेम ही है जो दोनों के जीवन को सुखमय बना सकता है। धन- सम्पत्ति बहुत सी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं परंतु अगर पति- पत्नी के बीच प्रेम नहीं है तो वह उनके जीवन को सुखमय नहीं बना सकता। अगर किसी परिवार में शारीरिक संबंध ही पति- पत्नी के संबंधों का आधार हों और दोनों एक दूसरे की मानसिक व आत्मिक आवश्यकताओं पर ध्यान न दें तो उन दोनों की आत्मा तृप्त नहीं होगी। इस प्रकार की स्थिति में दोनों के चेहरों से विफलता और निराशा झलकने लगेगी।

    स्पष्ट है कि जिस परिवार में पति- पत्नी एक दूसरे की शारीरिक व मानसिक आवश्यकताओं का ध्यान रखते हैं उनके संयुक्त जीवन के हर क्षेत्र में प्रेम व निष्ठा को भलिभांति देखा जा सकता है। पति- पत्नी इस चरण पर पहुंच जाते हैं कि दोनों स्वयं को एक दूसरे से अलग नहीं समझे। उस समय इंसान यह समझता है कि परिवार, पति- पत्नी की शांति का स्थान है।

    ईश्वरीय धर्म इस्लाम में विवाह के कुछ सिद्धांत हैं जबकि दूसरे धर्मों व संस्कृतियों में इन सिद्धांतों से भिन्न सिद्धांत हो सकते हैं। इस्लाम में विवाह के लिए कुछ सिद्धांतों को दृष्टि में रखना चाहिये। अगर इन सिद्धांतों को ध्यान में नहीं रखा जायेगा तो भविष्य में उनके संयुक्त जीवन में कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती हैं। इस्लामी संस्कृति में जिन चीज़ों का ध्यान रखा जाना चाहिये वे इस प्रकार हैं जैसे व्यवहार, धर्मपरायणता और प्रेम। इस्लाम में एसे विवाहों से कड़ाई के साथ मना किया गया है जिसका आधार व मापदंड भौतिक चीज़ें हों। अलबत्ता इसका मतलब यह नहीं है कि इन चीज़ों को ध्यान में ही नहीं रखना चाहिये बल्कि तात्पर्य है कि ये चीज़ें अस्ल नहीं होनी चाहिये। यह संभव है कि एक व्यक्ति विदित में सुन्दर हो परंतु अंदर से वह भ्रष्ठ व अर्धर्मी हो। स्पष्ट है कि इस प्रकार के व्यक्ति से विवाह करना बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं है बल्कि पैग़म्गबरे इस्लाम के हवाले से आया है कि अगर कोई व्यक्ति केवल सुन्दरता के कारण उससे विवाह करता है तो अपने विवाह में अच्छाई नहीं देखेगा और यह भी संभव है कि वह अपने लक्ष्य को न प्राप्त कर सके और उसका जीवन समस्याओं से भरा रहे। इसी कारण सिफारिश की गयी है कि पति व पत्नी के चयन में धर्म को मापदंड बनाया जाना चाहिये। इस संबंध में पैग़म्बरे इस्लाम फरमाते हैः जो कोई केवल महिला की सुन्दरता के कारण उससे विवाह करेगा वह उसमें वह चीज़ नहीं पायेगा जिसे पसंद करता है और जो केवल धन के लिए किसी महिला से विवाह करेगा ईश्वर उसे उसी धन के हवाले कर देगा तो तुम्हारे लिए आवश्यक है कि धार्मिक व्यक्तियों से विवाह करो”

    इस्लाम में विवाह के लिए एक मापदंड परिवार की शराफत है। अगर किसी व्यक्ति के पास पारिवारिक शराफत न हो और उसका पालन- पोषण धर्म व ईश्वरीय भय पर न हुआ हो तो निश्चित रूप से एसे विवाह का आधार कमज़ोर होगा। पैग़म्बरे इस्लाम इस बारे में कहते हैः हे लोगों उस हरी- भरी घास से बचो जो घूर पर उगी हो वहां पर उपस्थित लोगों ने पैग़म्बरे इस्लाम से पूछा कि इसका क्या मतलब है? उत्तर में फरमाया सुन्दर लड़की जो बुरे परिवार में पली बढ़ी हो”

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