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    पवित्र रमज़ान-15

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    ईश्वरीय दूतों का कहना है कि रमज़ान के महीने में शैतान के हाथ पैर बांध दिए जाते हैं कि वह दूसरों को बहका न सके। दूसरे शब्दों में यह कहना चाहिए कि जब ईश्वर के सदाचारी बंदे रोज़ा रखते हैं तो उनके भीतर शैतान के बहकावों का मुक़ाबला करने की शक्ति बढ़ जाती है जो उन्हें सुरक्षित रखती है। आज की चर्चा को हम क़ुरआने मजीद की एक आयत से आरंभ करेंगे जिसमें शैतान के बहकावों का उल्लेख किया गया है। सूरए मोमेनून की आयत नम्बर 97 और 98 में कहा गया है व क़ुल अऊज़ो बेका मिन हमज़ातिश्शैतान व अऊज़ो बेका रब्बे अन यहज़ोरूनी अर्थात कहो मे पालनहार मैं शैतान के बहकावों से तेरी पनाह चाहता हूं। मैं तेरी पनाह चाहता हूं इससे कि वे मेरे पास आएं।

     

    वस्तुओं और घटनाओं से प्रसन्न या दुखी होना मानव स्वभाव और प्रवृत्ति का एक भाग है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से कुछ बातों से खुश और कुछ से दुखी होते हैं। प्रतिकूल वातावरण या मानसिक स्थिति का सामना होने पर मनुष्य क्षुब्ध होता है और वह चाहे या न चाहे उसे बुरा अवश्य लगता है। इसके विपरीत यदि परिस्थितियां अनुकूल हों तो मनुष्य प्रफुल्लित दिखाई पड़ता है। मनुष्य के पास चूंकि बुद्धि और विवेक है अतः वह अपनी चिंतन शक्ति को प्रयोग करके एसी परिस्थितियां उत्पन्न कर सकता है जो उसके लिए आनंददायक हों इसी प्रकार उन बातों से स्वयं को दूर रख सकता है जो उसके लिए पीड़ा दायक हैं। कभी कभी मनुष्य भविष्य के आराम और आनंद के लिए कुछ समय तक कठिनाइयां भी झेलने के लिए तैयार हो जाता है। जब कोई वैज्ञानिक वर्षों के कठिन अध्ययन और परिश्रम से गुज़रता है तो उसके मन में यही आशा होती है कि भविष्य में वह कोई अति मूल्यवान और आनंददायक अविष्कार करेगा। आनंद और सुख के कुछ प्रकार वे हैं जिनका स्रो मनुष्य की आत्मा और मन होता है।

    मनुष्य जब कोई भला काम और सुकर्म करता है तो स्वाभाविक रूप से उसे आनंद प्राप्त होता है चाहे उसे इस काम में कठिनाई का सामना ही क्यों न करना पड़ा हो। रमज़ान महीने का रोज़ा भी उन उपासनाओं में शामिल हैं जिनमें कठिनाई और भूख तथा प्यास का सामना करना पड़ता है किंतु इसके बदले में सदाचारी बंदों को ईश्वर के सामिप्त का आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है और उनमें दूसरों की सहायता की भावना प्रबल होती है। आइए एसे कुछ कामों के बारे में आपको बताएं जिनसे मनुष्य को आध्यात्मिक आनंद और सुख प्राप्त होता है। दूसरों की ग़लतियों को क्षमा और अनदेखा करना शिष्टाचारिक गुणों में शामिल है। रमज़ान के महीने में जो भलाई और सुकर्मों का महीना है हमारे लिए आवश्यक है कि दूसरों की ग़लतियों को क्षमा कर दें ताकि ईश्वर भी अपनी अपार कृपा से हमारे पापों को क्षमा कर दे। क्षमाशीलता की भावना मानव हृदय को कोमल और प्रकाशमय बनाती है तथा मनुष्य के मन व आत्मा को एक विचित्र सुखदायी स्थिति में पहुंचा देती है। क्षमाशीलता से आपसी संबंध मज़बूत होते हैं और मनुष्य के भीतर सामाजिक भावना प्रबल होती है। हज़रत अली अलैहिस्सलाम कहते हैं कि एक सज्जन व्यक्ति का सबसे अच्छा कर्म यह है कि दूसरों की ग़लतियों और बुरे बर्ताव की अनदेखी करे। पैग़म्बरे इस्लाम का भी एक कथन है कि इस पवित्र महीने में रोज़ेदारों के लिए उचित है कि हमेशा से बढ़कर सहिष्णुता और क्षमाशीलता का प्रदर्शन करें।

     

    रमज़ान के महीने में जिन बातों की बड़ी अनुशंसा की गई है उनमें ईश्वर से प्रार्थना और क्षमा याचना करना है। इससे मनुष्य को आत्मिक और आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है। इस महीने में रोज़ा रखने वाले बड़ी दुआए पढ़ते हैं जिनमें ईश्वर से क्षमायाचना को बार बार दोहराया गया है। रमज़ान के महीने के 23वें दिन की दुआ में हम पढ़ते हैं कि हे ईश्वर हमारे पापों को धो दे और हमें अवगुणों से पवित्र बना दे। क्षमायाचना से मनुष्य पापों के बोझ से मुक्ति प्राप्त करता है। तौबा का सार बिंदु यह है कि मनुष्य को अपने पाप पर वास्तव में पछतावा हो। अर्थात मनुष्य अपने बुरे काम पर पश्चातताप और इस बात का दृढ़ संकल्प करे कि सुकर्मों और भलाई के मार्ग पर चलेगा। ईश्वर ने प्रायश्चित करने वालों के लिए यह वचन दिया है कि उनके बुरे कर्मों को क्षमा कर देगा। तौबा के समय ईश्वर की क्षमाशीलता और कृपा से आशा बांधना मनुष्य को विशेष आध्यात्मिक आनंद प्रदान करता है। नातेदारों और संबंधियों का ध्यान रखना भी एसा कर्म है कि रमज़ान के महीने में जिस संबंध में विशेष रूप से सिफ़ारिश की गई है। एसा करने से लोगों के बीच रिश्ते मज़बूत होते हैं यही कारण है कि इस्लाम में इस पर विशेष रूप से बल दिया गया है तथा इस बारे में अनेक कथन मौजूद हैं। पैग़म्बरे इस्लाम का एक कथन है कि अपने रिश्तेदारों से संपर्क रखो। रमज़ान का पवित्र महीना और इफ़तार के सुशोभित दस्तरख़ान रिश्तेदारों के आपस में मिलने जुलने का अति उत्तम अवसर समझे जाते हैं जहां विशेष उत्साह और प्रेम देखने में आता है। यह परम्परा हृदयों को आपस में एक दूसरे से निकट करती है और रिश्तेदारी का आनंद उठाने का अवसर उपलब्ध कराती है। पैग़म्बरे इस्लाम के पौत्र हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम इफ़तारी करवाने के संबंध में कहते हैं कि जो कोई भी किसी रोज़ेदार को इफ़तारी दे उसे वही सवाब मिलेगा जो रोज़ा रखने का सवाब रोज़ा रखने वाले को मिलेगा। रिश्तेदारों से मिलने जुलने के साथ ही यदि मनुष्य लोगों की कठिनाइयों और समस्याओं के निदान के बारे में भी प्रयास करे तो फिर इस कर्म का महत्व और सवाब कई गुना बढ़ जाता है।

     

    रिश्तेदारों की समस्याओं का निदान करना भी उन कर्मों में है जिनका बहुत अधिक महत्व है और जिसकी बड़ी अनुशंसा की गई है। इस कर्म से मनुष्य ईश्वर का सामिप्य प्राप्त करता है तथा रोज़ेदार का स्थान और ऊंचा होता है। इसके विपरीत रिश्तेदारों के संबंध में उदासीनता और उनकी समस्याओं की उपेक्षा ईश्वरीय कृपा के बंद हो जाने का कारण बनता है। हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का कथन है कि निःसंदेह लोगों को तुम्हारी सहायता की आवश्यकता वस्तुतः तुम्हारे लिए ईश्वर की विभूतियों का भाग है अतः उनकी आवश्यकताएं पूरी करने से कभी परेशान नही होना चाहिए वरना यह विभूतियां दूसरों का भाग्य बन जाएंगीं। अंत में हम आपको एक घटना के बारे में बताना चाहेंगे। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने आभास किया कि उनके घर का ख़र्च बढ़ रहा है। उन्होंने व्यापार के माध्यम से ख़र्च पूरा करने के बारे में सोचा। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने एक हज़ार दीनार का बंदोबस्त किया और अपने सेवक मुसादिफ़ को देकर कहा कि यह हज़ार दीनार लो और व्यापार के लिए मिस्र की यात्रा की तैयारी करो। मुसादिफ़ ने वह रक़म ली और उससे जाकर वह वस्तुएं ख़रीदीं जो मिस्र ले जाकर बेची जाती थीं। मुसादिफ़ मिस्र जाने वाले एक कारवां के साथ हो लिए। जब कारवां मिस्र के निकट पहुंचा तो मिस्र से लौटने वाला एक कारवां दिखाई दिया। दोनों कारवानों के लोगों ने एक दूसरे से हाल चाल पूछा। बातचीत से मालूम हुआ कि मदीने से मिस्र पहुंचे कारवां के पास जो सामान है उसकी मिस्र में बड़ी आवश्यकता है और उसका बड़ा अच्छा मूल्य है। कारवां के लोग यह सुनकर बहुत ख़ुश हुए क्योंकि उनके पास वह सामान था जो किसी भी मूल्य पर बिकने वाला था। कारवां के लोगों ने यह जानकारी हो जाने के बाद आपस में तय किया कि सामान को दुगने दाम पर बेचेंगे। सब मिस्र पहुंचे तो देखा वास्तव में वही स्थिति है जैसा उन्होंने सुना था। कारवां के लोगों ने अपना सामान दोहरे दाम बेचना आरंभ कर दिया। परिणाम स्वरूप जब मुसादिफ़ मिस्र से मदीना लौटे तो एक हज़ार दीनार का लाभ उनके पास था। वह ख़ुशी के साथ इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की सेवा में पहुंचे और दीनारों की दो थैलियां उनके सामने रख दीं। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने पूछा यह क्या है।

     

    मुसादिफ़ ने कहा कि एक थैली में आपकी पूंजी और दूसरी में इसी मात्रा में मिलने वाला लाभ है। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने कहा कि लाभ तो बहुत अधिक है तुमने इतना लाभ कैसे कमाया। मुसादिफ़ ने उत्तर दिया कि हुआ यूं कि जब हम मिस्र के निकट पहुंचे तो पता चला कि मिस्र में हमारे सामान की भारी आवश्यकता है। हमने आपस में तय किया कि दुगने मूल्य पर अपना सामान बेचेंगे। हमने एसा ही किया। इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने अप्रसन्न होकर कहा कि तुम लोगों ने आपस में तय किया कि कालाबाज़ारी करोगे और दुगने मूल्य पर अपना सामान बेचोगे? मुझे इस प्रकार का लाभ नहीं चाहिए। यह कह कर इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम ने एक थैली उठा ली और कहा कि यह मेरी पूंजी है और दूसरी थैली से मुझे कोई मतलब नहीं है।