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    पवित्र रमज़ान-20

    पवित्र रमज़ान-20
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    इमाम सज्जाद(अ) दुआ के इस भाग में ईश्वर से विनती करते हुये कहते हैः “हे पालनहार, मोहम्मद और उनके परिजनों पर सलाम भेज तथा मुझे जीवन के सभी कामों में सन्तुलन एवं मध्यमार्ग से लाभान्वित कर।”

    सन्तुलन एवं मध्य मार्ग, अतिवाद से दूरी का नाम है और यही वह सीधा रास्ता है जिसकी ओर मानवता को उन्मुख करने के लिये पैग़म्बरों को ईश्वर की ओर से भेजा गया है। जो लोग जीवन के विभिन्न चरणों में सन्तुलन व मध्य मार्ग का ध्यान रखते हैं वे अन्ततः सौभाग्य व कल्याण का स्वाद चखते हैं जबकि मध्यमार्ग को छोड़ने वाले अतिवाद के रोग में ग्रस्त होकर अपना सब कुछ गंवा देते हैं।

    हज़रत अली (अ) इस संबंध में कहते हैः जब ईश्वर किसी बंदे के लिये भलाई का इरादा करता है तो उसके मन में मध्यमार्ग एवं युक्ति डाल देता है तथा अतिवाद, कुव्यवस्था एवं खर्चीली प्रवृत्ति से उसे दूर कर देता है।

    नहजुल बलाग़ा में हज़रत अली(अ) एक ख़ुतबे में ईश्वर का भय रखने वाले पवित्र बन्दों की विशेषताओं का उल्लेख करते हुये उनके वस्त्रों के बारे में कहते हैः ईश्वरीय भय रखने वाले लोग जो वस्त्र पहिनते हैं वह सन्तुलन एवं मध्यमार्ग की सीमाओं में होता है।वे ऐसे वस्त्र नहीं पहिनते जो उन्हें पापी धनवानों के गुट में रख दे तथा दरिद्र लोगों की शत्रुता का कारण बने, न वे ऐसे वस्त्र पहिनते हैं कि लोगों द्वारा अपमानित किये जायें।

    धन के व्यय में यदि सन्तुलन एवं मध्य मार्ग अपनाया जाये तो वह धनी व दरिद्र हर एक के लिये लाभकारी माना जाता है। जिन लोगों की आय कम और सीमित हो और यदि वे चाहते हों कि समाज में उन्हें हीन दृष्टि से न देखा जाये तो उनको चाहिये कि रोज़ी कमाने तथा जीवन के ख़र्चों में मध्यमार्ग अपनायें, सन्तुलन बनाने का प्रयास करें तथा अपनी आय पर संतोष करें। ऐसे लोग यद्यपि कठिनाई में जीवन व्यतीत करते हैं परन्तु समाज में सिर उठा कर चलते हैं। जो लोग धनवान होते हैं और उनकी आय उनके ख़र्चों से अधिक होती है, वे यदि अपने जीवन में मध्य मार्ग अपनायें तो अपनी अतिरिक्त आय से अनेक लोगों की सहायता करके अपने लिये अत्यधिक सम्मान अर्जित कर सकते हैं तथा स्वयं को ईश्वरीय कृपा का पात्र बना सकते हैं।

    इस प्रकार, मध्य मार्ग एवं संतुलन मनुष्य को अपव्यय तथा कंजूसी दोनों से बचा सकता है। आय तथा व्यय में सीमाओं का ध्यान रखने से कम आय वाले सम्मान पूर्वक जीवन बिता सकते हैं जबकि धनवान लोग अपव्यय से बच सकते हैं। यह ऐसा विषय है जो समाज में सन्तुलन व सहयोग के बढ़ने तथा दरिद्रता के कम होने का कारण बनता है।

    साधारणतयः ईश्वर ने जो कुछ हमारे भाग्य में लिखा है उसे समझना हमारी शक्ति व क्षमता से परे होता है, परन्तु वह सदैव हमारे लिये लाभदायक होता है। इसी संबंध में हम आपको एक कहानी सुना रहे हैः

    प्राचीन काल में एक राजा था जिसका एक मंत्री था। मंत्री सदैव कहता रहता था कि जो घटना भी घटती है वह सदैव हमारे लिये लाभकारी होती है।

    एक दिन राजा ने फल काटने के लिये तेज़ छुरी मंगवाई परन्तु फल काटते हुये उसकी उंगली कट गयी। मंत्री जो वहीं पर बैठा हुआ था कहने लगा चिन्तित न हों जो कुछ भी हो रहा है सब आपकी भलाई में है।

    राजा मंत्री की यह बात सुनकर क्रोधित हो उठा और उसने उसे कारागार में डलवा दिया। थोड़े समय पश्चात राजा अपने सेवकों के साथ निकट ही स्थित एक जंगल की ओर गया परन्तु थोड़ी ही देर में अपने साथियों से आगे निकल गया। जंगल बहुत घना था, राजा वहां जा कर मार्ग भूल गया और एक ऐसे जंगली क़बीले में पहुंच गया जहां लोग अपने देवताओं के लिये भेंट चढ़ाने की तय्यारी कर रहे थे। वे लोग सुंदर व सज धज वाले राजा को देख कर बहुत प्रसन्न हुये और सोचने लगे कि यह उनके देवताओं के लिये उत्तम भेंट है। उन लोगों ने राजा को अपने देवता की मूर्ति के सामने बांध दिया ताकि उसका सिर काट कर देवता को प्रसन्न करें।

    अचानक क़बीले का एक व्यक्ति ज़ोर से चरल्लायाः हम इस व्यकित की भेंट कैसे चढ़ा सकते हैं, इसके शरीर में दोष है, देखो इसकी उंगली देखो यह कटी हुयी है। इस आधार पर राजा को स्वतन्त्र कर दिया गया और वह भेंट चढ़ने से बच गया। राजा अपने महल पहुंचा, उसने मंत्री को बुलाया और उससे कहने लगाः अब मुझे तुम्हारे कहने का अर्थ समझ में आया कि जो भी होता है सब हमारी भलाई के लिये होता है, मेरी उंगली का कटना मेरी जान बचने का कारण बन गया। परन्तु तुम्हारा क्या हुआ, तुम्हारा कारावास में जाना कैसे लाभदायक सिद्ध हुआ। मन्त्री ने उत्तर दियाः महाराज, यदि मैं कारावास में न होता तो सदैव की भान्ति आपके साथ शिकार पर जाता और क़बीले वाले आपको स्वतन्त्र करने के बाद मुझे ही भेंट चढ़ाने के लिये पकड़ लेते। तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मेरा कारावास जाना भी लाभदायक था।

    इमाम(अ) अपने धार्मिक भाइयों के प्रति जो कर्तव्य एक मुसलमान के होते हैं उनकी इमाम हसन को नसीहत करते हुये कहते हैः

    “मेरे बेटे, अपने धार्मिक भाई के बारे में इन बातों का ध्यान रखो, अगर उसकी ओर से संबंध वनच्छे किया जा रहा हो तो तुम संबंध बनाये रखो, क्रोध और दूरी के समय उनके निकट जाओ, उसकी कंजूसी के उत्तर में अधिक दानशीलता का प्रदर्शन करो, जब वह तुम से दूरी बरते तो उससे निकटता का प्रयास करो, वह कड़ाई करे तो तुम नर्मी और वह अपराध करे तो तुम उसकी क्षमा याचना को स्वीकार कर लो परन्तु याद रखो कि यह कार्य अनुचित स्थान पर न करना और न किसी ऐसे के साथ करना जो इसका योग्य न  हो। कभी अपने मित्र के शत्रु से मित्रता न करना क्योंकि इसका अर्थ यह है कि तुम अपने मित्र से शत्रुता पर उतर आये हो। अपने निष्ठा पूर्ण उपदेश अपने भाई को दिया करो चाहे यह उपदेश उसके लिये सुंदर व प्रसन्न करने वाले हों या बुरे व अप्रसन्न करने वाले।

    हज़रत अली(अ) अपने पत्र के इस भाग में कुछ उपदेशों के रूप में मुसलमानों के उन कर्तव्यों का वर्णन करते हैं जो उन्हें अपने धार्मिक भाइयों के लिये निभाने चाहिये। इमाम इन उपदेशों में मित्रों के बुरे व्यवहार के उत्तर में वैसा ही व्यवहार अपनाने से अपने सुपुत्र को रोकते हैं क्योंकि बुरा व्यवहार मित्रता को ख़तरे में डाल देता है तथा मनुष्य अपने मित्र से हाथ धो बैठता है। परन्तु यदि शत्रुता के जवाब प्रेम से दिया जाये और बुराई के बदले में भलाई हो तो आपका क्रोधित मित्र थोड़े ही समय में अपनी ग़लती को समझ लेगा और अपने किये पर लज्जित होगा तथा आपके प्रति उसकी निष्ठा बढ़ जायेगी और इस प्रकार आपकी मित्रता पहले से भी अधिक सुदृढ़ हो जायेगी।

    इमाम के यह शब्द क़ुरआन की उस आयत की व्याख्या करते हैं जिसमें ईश्वर कहता है “बुराई को भलाई से दूर करो कि अचानक देखोगे कि वही व्यक्ति जिस से तुम्हारी शत्रुता है तुम्हारा गहरा मित्र बन गया। परन्तु उनके अतिरिक्त जो धैर्य व संयम वाले हैं कोई दूसरा इस स्थान तक नहीं पहुंचता तथा अत्यधिक ईमान व ईश्वरीय भय रखने वालों के अतिरिक्त कोई यह काम नहीं कर पाता।

    यद्यपि यह आयत शत्रुओं के संबंध में है परन्तु मित्रों पर भी लागू होती है। पैग़म्बरे इस्लाम(स) तथा अन्य सभी महान लोग थोड़े से अपवादों के अतिरिक्त सभी अवसरों पर इस बात पर बल देते हैं कि बुराई के बदले में भलाई की जाये। परन्तु कुछ नीच प्रवृत्ति वाले लोग इस बात से ग़लत फ़ायेदा उठा सकते हैं इसी लिये हज़रत अली अपने सुपुत्र से कहते हैं कि याद रखो कि यह काम अनुचित स्थान पर तथा उस व्यक्ति के लिये न करना जो इसका योग्य न हो।

    हज़रत अली अपनी बात आगे बढ़ाते हुये कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने मित्र से भी मित्रता करता है और उसके शत्रु का भी मित्र होता है उसकी मित्रता सत्य पर आधारित नहीं होती और उसका लक्ष्य यह होता है कि दोनों से अपने हित साधे। ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि इमाम की नसीहत केवल व्यक्तयों के बारे में नहीं है बल्कि गुटों, राष्ट्रों एवं सरकारों के बारे में भी पूरी उतरती है। आज की दुनिया में ऐसी अनेक सरकारें हैं जो युद्ध के दोनों पक्षों की मित्र बनी रहती हैं।उनका शान्ति करवाने और शत्रुता समाप्त करवाने का कोई इरादा नहीं होता बल्कि वे दोनों से अपने हित साधना चाहती हैं।

    हज़रत अली(अ) अपने पत्र में आगे चल कर कहते हैः अपने निष्ठापूर्ण उपदेश अपने भाई को दो। ऐसा बहुत देखने में आता है मित्र लोग इस लिये किसी को नसीहत नहीं करना चाहते कि कहीं कोई बुरा न मान जाये और वे वास्तविकता को छिपा लेते हैं, ऐसे लोग आपके वास्तविक मित्र नहीं हैं। किसी को उसकी बुराई या कठिनाई से अवगत कराना वास्तव में उसे किसी क्षति या पाप से मुक्ति दिलाता है चाहे वह व्यक्ति कुछ समय के लिये बुरा ही क्यों न मान जाये । क्योंकि यह बात इससे कहीं उचित है कि अपनी ज़बान बंद रखें और दूसरे को ख़तरे में पड़ने दें। इस स्थिति में ज़बान बंद रखने वाला व्यक्ति वास्तव में ईश्वर को भी अप्रसन्न करता है और लोगों से भी विश्वास घात करता है।