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    पाक करने वाली चीज़ें

    पाक करने वाली चीज़ें
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     मुतह्हिरात

    *(म.न.149) बारह चीज़ें ऐसी हैं जो निजडासत को पाक करती हैं और इनको मुतह्हरात कहा जाता है।

    1)पानी

    2)ज़मीन

    3)सूरज

    4)इस्तेहालह

    5)इंक़िलाब

    6)इंतिक़ाल

    7)इस्लाम

    8)तबइय्यत

    9)ऐने निजासत का ख़त्म हो जाना

    10)निजासत खाने वाले हैवान का इस्तबरा

    11)मुसलमान का ग़ायब होना

    12)ज़िबह किये गये जानवर के बदन से ख़ून का निकल जाना।

    इन मुतह्हिरात के बारे में पूरे अहकाम आने वाले मसलों में बयान किये जायेंगे।

    पानी-

    *(म.न.150) पानी चार शर्तों के साथ नजिस चीज़ को पाक करता है।

    1)पानी मुतलक़ हो- मुजाफ़ पानी से कोई नजिस चीज़ पाक नही होती।

    2)पानी पाक हो।

    3)नजिस चीज़ को धोते वक़्त पानी मुजडाफ़ न बन जाये, जब किसी चीज़ को पाक करने के लिए पानी से धोया जाये तो जब आखिरी बार धोया जा रहा हो तो लाज़िम है कि उस पानी में जिजासत का रंग, बू या ज़ायक़ा मौजूद न हो। लेकिन अगर धोने की सूरत मुख़तलिफ़ हो (यानी वह आख़री बार न हो) और पानी का रंग, बू या ज़ायक़ा बदल जाये तो इसमें कोई हरज नही है। मसलन अगर कोई चीज़

    क़लील या कुर पानी से धोई जा रही हो तो और उसे दो बार धोना ज़रूरी हो तो अगर पहली बार धोते वक़्त पानी का रंग,बू या ज़ायक़ा बदल जाये लेकिन दूसरी बार धोने में ऐसी कोई तबदीली न आये तो वह चीज़ पाक हो जायेगी।

    4) नजिस चीज़ को पानी से धोने के बाद उसमें ऐने निजासत के ज़र्रे बाक़ी न रहे। नजिस चीज़ को अगर क़लील पानी से पाक किया जाये तो इसकी कुछ शर्ते हैं जो इस तरह हैं।

    *(म.न.151) नजिस बरतन के अन्दरूनी हिस्से को क़लील पानी से तीन बार धोना ज़रूरी है और कुर व जारी पानी के बारे में भी एहतियाते वाजिब की बिना पर यही हुक्म है। लेकिन जिस बरतन से कुत्ते ने पानी या कोई दूसरी बहने वाली चीज़ पी हो उसे पहले मिट्टी से मानझना चाहिए बाद में क़लील, कुर या जारी पानी से दो बार धोना चाहिए। इसी तरह अगर कुत्ता किसी बरतन को चाटे और उसमें कोई चीज़ बाक़ी रह जाये तो उसे पाक करने से पहले मिट्टी से मानझना ज़रूरी है। और अगर किसी बरतन में कुत्ते की राल गिर जाये तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर उसे मिट्टी से मानझने के बाद तीन बार धोना ज़रूरी है।

    *(म.न.152) अगर किसी तंग मुँह वाले ऐसे बरतन को कुत्ता चाट जाये जिस के अन्दर हाथ न जा सकता हो तो उसमें मिट्टी डाल कर इस तरह हिलाया जाये कि मिट्टी बरतन के अन्दर तमाम जगह पर पहुँच जाये फिर उसको उस तरह धोयें जैसा कि उपर वाले मसले में बयान किया जा चुका है।

    (म.न.153) अगर किसी बरतन को सुवर चाट ले या उसमें से कोई बहने वाली चीज़ पी ले या उसमें कोई जंगली चूहाँ मर जाये तो उसे क़लील या कुर पानी से सात बार धोना ज़रूरी है। लेकिन मिट्टी से मानझना ज़रूरी नही है।

    (म.न.154) अगर कोई बरतन शराब से नजिस हो जाये तो उसे तीन बार धोना ज़रूरी है चाहे पानी क़लील हो या कुर।

    (म.न.155) अगर एक ऐसे बरतन को जिसे नजिस मिट्टी से तैयार किया गया हो या जिस में नजिस पानी चला गया हो कुर या जारी पानी में डाल दिया जाये तो बरतन में जहाँ जहाँ पानी पहुँच जायेगा वह पाक हो जायेगा और अगर इस बरतन के अन्दरूनी हिस्से को भी पाक करना मक़सद हो तो उसे कुर या जारी पानी में इतनी देर तक डाले रखना चाहिए जितनी देर में पानी बरतन के अन्दर तमाम जगहों पर पहुच जाये। और अगर इस बरतन में कोई ऐसी नमी मौजूद हो जो पानी के अन्दरूनी हिस्सों तक पहुँचने में रुकावट हो तो पहले उसे ख़ुश्क करे और बाद में कुर या जारी पानी में डाले।

    (157) अगर एक बड़ा बर्तन मसलन पतीला या मटका नजिस हो जाये तो तीन बार पानी से भरने और हर बार ख़ाली करने के बाद पाक हो जाता है। इसी तरह अगर उसमें तीन बार ऊपर से इस तरह पानी डालें कि बर्तन के अन्दर सब जगह पहुँच जाये और इसकी तली में इकठ्ठे होने वाले पानी को हर बार बाहर निकाल दें तो बर्तन पाक हो जायेगा। और एहतियाते मुस्तहब यह है कि दूसरी और तीसरी बार जिस बर्तन के ज़रिए पानी बाहर निकाला जाये उसे भी धो लिया जाये।

    (158) अगर नजिस तांबे वग़ैरा को पिघला कर पानी से धोया जाये तो उसका ज़ाहेरी हिस्सा पाक हो जायेगा।

    (159) अगर तनूर पेशाब से नजिस हो जाये और उसमें ऊपर से एक बार यूँ पानी डाला जाये कि इसकी तमाम अतराफ़ तक पहुँच जाये तो तनूर पाक हो जायेगा और एहतियाते मुसतहब यह है कि यह अमल दो बार किया जाये। और अगर तनूर पेशाब के अलावा किसी और चीज़ से नजिस हुआ हो तो, निजासत दूर करने के बाद मज़कूरा तरीक़े के मुताबिक़ इसमें एक बार पानी डालना काफ़ी है। और बेहतर यह है कि तनूर की तह में एक गढ़ा खोद लिया जाये जिस में पानी जमा हो सके फिर इस पानी को निकाल लिया जाये और गढ़े को पाक मिट्टी से पुर कर दिया जाये।

    (160) अगर किसी नजिस चीज़ को कुर या जारी पानी में एक बार यूँ डुबो दिया जाये कि पानी इसके तमाम नजिस मक़ामात तक पहुँच जाये तो वह चीज़ पाक हो जायेगी और क़ालीन या दरी और लिबास वग़ैरा को पाक करने के लिए उसे निचोड़ना और मलना या पैर से रग़ड़ना ज़रूरी नहीं है और अगर बदन या लिबास पेशाब से नजिस हो गया हो तो उसे कुर पानी में भी दो बार धोना लाज़िम है।

    (161) अगर पेशाब से नजिस हुई, किसी चीज़ को क़लील पानी से पाक करना हो तो इस पर एक बार इस तरह पानी डाला जाये कि पेशाब उस चीज़ में बाक़ी न रहे, तो वह चीज़ पाक हो जायेगी। अलबत्ता लिबास और बदन को पाक करने के लिए उन पर पर दो बार पानी डालना ज़रूरी है, लेकिन जहाँ तक लिबास, क़ालीन, दरी और उन से मिलती जुलती चीजों का तअल्लुक़ है उन्हें एक बार पानी डालने के बाद निचोड़ना चाहिए ताकि उनमें से ग़ुसाला निकल जाये। (ग़ुसाला उस पानी को कहते हैं जो किसी धोई जाने वाली चीज़ से धुलने के दौरान या धुल जाने के बाद ख़ुद बखुद या निचौड़ने से निकलता है।)

    (162) जो चीज़, ऐसे शीरख़ार लड़के या लड़की के पेशाब से नजिस हुई हो, जिसने दूध के अलावा कोई दूसरी ग़िज़ा खाना शुरू न की हो और अहतियात की बिना पर वह दो साल का न हुआ हो, तो अगर उस चीज़ पर एक बार इस तरह पानी डाला जाये कि तमाम नजिस मक़ामात पर पहुँच जाये तो वह चीज़ पाक हो जायेगी। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उस पर दो बार पानी डाला जाये, क़ालीन और दरी वग़ैरा को निचोड़ना ज़रूरी नहीं।

    (163) अगर कोई चीज़, पेशाब के अलावा किसी दूसरी निजासत से नजिस हो जाये तो पहले उससे उस निजासत को दूर किया जाये बाद में उस पर एक बार क़लील पानी डाला जाये, जब वह पानी बह जाये तो वह चीज़ पाक हो जायेगी। अलबत्ता लिबास और उससे मिलती जुलती चीज़ों को निचौड़ लेना चाहिए ताकि उनके अन्दर का पानी निकल जाये।

    (164) अगर किसी नजिस चटाई को जो धागों से बनी हुई हो कुर या जारी पानी में डुबो दिया जाये तो ऐन निजासत दूर होने को बाद वह पाक हो जायेगी लेकिन अगर उसे क़लील पानी से धोया जाये तो जिस तरह भी मुमकिन हो उसका निचौड़ाना ज़रूरी है (चाहे उसमें पानी ही क्यों न चालाने पड़ें) ताकि उसका धोवन अलग हो जाये।

    (165) अगर गंदुम, चावल, साबुन वग़ैरा का ऊपर वाला हिस्सा नजिस हो जाये तो वह कुर या जारी पानी में डुबोने से पाक हो जायेगा, लेकिन अगर उनका अन्दरूनी हिस्सा नजिस हो जाये तो वह इस सूरत में ही पाक हो सकती हैं जब कुर या जारी पानी उन चीज़ों के अन्दर तक पहुँच जाये और पानी मुतलक़ ही रहे। लेकिन ज़ाहिर यह है कि साबुन और इससे मिलती जुलती चाज़ों के अन्दर आबे मुतलक़ बिल्कुल नहीं पहुँचता।

    (166) अगर किसी इंसान को इस बारे में शक हो कि नजिस पानी साबुन के अन्दुरूनी हिस्से तक पहुँचा है या नहीं तो वह हिस्सा पाक होगा।

    (167) अगर चावल या गोशत या ऐसी ही किसी चीज़ का ज़ाहरी हिस्सा नजिस हो जाये, तो किसी पाक बर्तन में रख़कर उस पर एक बार पानी डालने और फिर फेंक देने के बाद वह चीज़ पाक हो जाती है और अगर किसी नजिस बर्तन में रखें तो यह काम तीन बार अंजाम देना ज़रूरी है और इस सूरत में वह बर्तन  भी पाक हो जायेगा। लेकिन लिबास या किसी दूसरी ऐसी चीज़ को बर्तन में डाल कर पाक करना मक़सूद हो जिसका निचोड़ना लाज़िम है, तो जितनी बार उस पर पानी डाला जाये उतनी ही बार उसे निचोड़ना भी ज़रूरी है और बर्तन को उलट देना चाहिए ताकि जो धोवन उसमें जमा हो गया हो वह बह जाये।

    (168) अगर किसी ऐसे नजिस लिबास को जिसे नील या उस जैसी किसी चीज़ से रंगा गया हो, कुर या जारी पानी में डुबो दिया जाये और कपड़े के रंग की वजह से पानी मुज़ाफ़ होने से पहले सब ज़गह पहुँच जाये तो वह लिबास पाक हो जायेगा और अगर उसे क़लील पानी से धोया जाये और निचोड़ने पर उसमें से मुज़ाफ़ पानी न निकले तो वह लिबास पाक हो जायेगा।

    (169) अगर कपड़े को कुर या जारी पानी में धोया जाये और कपड़े में काई वग़ैरा नज़र आये तो अगर यह एहतेमाल न हो कि यह कपड़े के अंदर पानी के पहुँचने में रुकावट बनी है तो वह कपड़ा पाक है।

    (170) जब तक ऐने निजासत किसी चीज़ से अलग न हो वह पाक पाक नही होगी लेकिन अगर बू या निजासत का रंग उसमें बाक़ी रह जाये तो कोई हरज नहीं। लिहाज़ा अगर लिबास पर से ख़ून को हटाने के बाद उसे धोलिया जाये तो अगर ख़ून का रंग लिबास पर बाक़ी भी रह जाये तो लिबास पाक होगा। लेकिन अगर बू या रंग की वजह से यह यक़ीन या एहतेमाल पैदा हो कि निजासत के ज़र्रे उसमें बाक़ी रह गये हैं तो वह नजिस माना जायेगा।

    (171) अगर कुर या जारी पानी में बदन से निजासत दूर कर ली जाये, तो बदन पाक हो जाता है। लेकिन अगर बदन पेशाब से नजिस हुआ हो तो इस सूरत में एक बार में पाक नहीं होगा। लेकिन पानी से निकल आने के बाद दोबारा उसमें दाख़िल होना ज़रूरी नहीं है बल्कि अगर पानी के अंदर ही बदन पर हाथ फेरले कि पानी दो बार बदन तक पहुँच जाये तो काफ़ी है।

    (172) अगर दाँतों की रीख़ों में नजिस ग़िज़ा रह जाये, तो अगर मुँह में पानी भर कर उसको अन्दर ही अन्दर इस तरह घुमाया जाये कि वह उस ग़िज़ा में हर जगह पहुँच जाये तो वह पाक हो जायेगी।

    (173) अगर सिर व सूरत के बालों को क़लील पानी से पाक किया जाये और वह बाल घने न हो तो उनसे पानी निकालने के लिए उन्हें निचोड़ना ज़रूरी नहीं है, क्योंकि आम तौर पर उनसे पानी ख़ुदबख़ुद जुदा हो जाता है।

    (174) अगर बदन या लिबास का कोई हिस्सा क़लील पानी से धोया जाये तो नजिस मक़ाम के पाक होने से उस मक़ाम से मुत्तसिल वह ज़गहें भी पाक हो जायंगी जिन तक धोते वक़्त आम तौर पर पानी पहुँच जाता है। मतलब यह है कि नजिस मक़ाम के अतराफ़ को अलग धोना ज़रूरी नहीं बल्कि वह नजिस मक़ाम को धोने के साथ ही पाक हो जाते हैं और अगर एक पाक चीज़ एक नजिस चीज़ के बराबर रख दें और दोनों पर पानी डालें तो उस का भी यही हुक्म है। लिहाज़ा अगर एक नजिस उंगली को पाक करने के लिए सब उंगलियों पर पानी डालें और नजिस और पाक पानी सब उंगलियों तक पहुँच जाये तो नजिस उंगली के पाक होने के साथ साथ तमाम उंगलियां पाक हो जायेगीं।

    (175) अगर गोश्त या चिकनाई नजिस हो जाये तो उन्हें आम चीज़ों की तरह ही पाक किया जायेगा और  उस लिबास को भी इसी तरह पाक किया जायेगा जिस पर थोड़ी सी चर्बी लगी हो और वह कपड़े तक पानी पहुँचने में रुकावट न हो।

    (176) अगर बर्तन या बदन नजिस होने के बाद इतना चिकना हो जाये कि उस तक पानी न पहुँच सके और बर्तन या बदन को पाक करना हो तो पहले उनसे चिकनाई दूर करनी चाहिए ताकि पानी उन तक पहुँच सके बाद मे उन्हे पाक किया जाये।

    (177) जो नल कुर पानी से मुत्तसिल हो वह कुर पानी का हुक्म रखता है।

    (178) अगर किसी चीज़ को पाक करने के बाद यह यक़ीन हो जाये कि वह पाक हो गई है, और बाद में यह शक पैदा हो कि उससे ऐने निजासत को दूर किया है या नहीं तो ज़रूरी है कि उसे दोबारा पाक किया जाये और उससे ऐने निजासत के दूर होने का यक़ीन कर लिया जाये।

    (179) वह ज़मीन जिसमें पानी जज़ब हो जाता है मसलन ऐसी ज़मीन जिसकी ऊपरी सतह पर रेत या बजरी हो, अगर नजिस हो जाये तो क़लील पानी से पाक हो जाती है।

    (180) अगर वह सख़्त ज़मीन जिसमें पानी जज़ब न होता हो या वह ज़मीन जिस पर पत्थर या ईंटों का फ़र्श हो, नजिस हो जाये तो क़लील पानी से पाक हो सकती है लेकिन ज़रूरी है कि उस पर इतना पानी डाला जाये कि वह उस पर बहने लगे, जो पानी उस पर डाला जाये अगर वह किसी सुराख़ से बाहर न निकल सके और किसी जगह जमा हो जाये तो उस जगह को पाक करने का तरीक़ा यह है कि जमा शुदा पानी को कपड़े या बर्तन से बाहर निकाल दिया जाये।

    (181) अगर नमक का डला या उस जैसी कोई और चीज़ ऊपर से नजिस हो जाये तो क़लील पानी से पाक हो सकती है।

    (182) अगर नजिस शकर से क़ंद बाना लें और उसे कुर या जारी पानी में डाल दें तो वह पाक नहीं होगा।

    2- ज़मीन

    (183) ज़मीन पैर के तलवे और जूते के निचले हिस्से को चार शर्तों के साथ पाक करती है।

    (1) यह कि ज़मीन पाक हो।

    (2) एहतियात की बिना पर ज़मीन ख़ुश्क हो।

    (3) एहतियाते लाज़िम की बिना पर निजासत ज़मीन पर चलने से लगी हो।

    (4) अगर ऐने निजासत जैसे ख़ून व पेशाब या मुतनज्जिस चीज़ जैसे नजिस गारा, पैर के तलवे या जूते के निचले हिस्से में लगी हो वह रास्ता चलने से या पैर ज़मीन पर रगड़ने से दूर हो जाये तो पैर या जूते का तलवा पाक हो जायेगा। लेकिन अगर पैर या जूते के तलवे से ऐने निजासत ज़मीन पर चलने या ज़मीन पर रग़ने से पहले दूर हो गई हो तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर ज़मीन से पाक नहीं होंगे। यह भी  ज़रूरी है कि जिस ज़मीन पर चला जाये उसके ऊपरी हिस्से पर मिट्टी, पत्थर, ईंटों का फ़र्श या उन से मिलती जुलती कोई और चीज़ हो, क़ालीन, दरी चटीई और घास आदि पर चलने से पैर या जूते का नजिस का तलवा पाक नहीं होता।

    (184) अगर पैर का तलवा  या जूते का निचला हिस्सा नजिस हो, तो डामर या लकड़ी के बने हुए फ़र्श पर चलने से उनका पाक होना मुश्किल है।

    (185) पैर के तलवे या जूते के निचले हिस्से को पाक करने के लिए बेहतर है कि पंद्रह हाथ या उससे ज़्यादा फ़ासिला ज़मीन पर चले चाहे पंद्रह हाथ से कम चलने या पैर ज़मीन पर रगड़ने से निजासत दूर हो गई हो।

    (186) ज़रूरी नहीं है कि पैर या जूते का नजिस तलवा तर ही हो बल्कि अगर ख़ुश्क भी हों तो ज़मीन पर चलने से पाक हो जाते हैं।

    (187) जब पैर या जूते का नजिस तलवा, ज़मीन पर चलने से पाक हो जाये तो उसके अतराफ़ के वह हिस्से भी जिन्हें आम तौर पर कीचड़ वग़ैरा लग जाती है पाक हो जाते हैं।

    (188) अगर कोई इंसान हाथ की हथेलियों और घुटनों के बल चलता हो और उसका घुटना या हथेली नजिस हो जाये, तो ज़मीन पर चलने से उसकी हथेली या घुटने का पाक होना मुश्किल है। यही सूरत लाठी और मसनूई टांग के निचले हिस्से, चौपायों के नाल, मोटर गाडियों वग़ैरह के पहिय्यों की है।

    (189) अगर ज़मीन पर चलने के बाद निजासत की बू या रंग या वह बारीक ज़र्रे जो नज़र न आते हों पैर या जूते के तलवे से लगे रह जायें, तो कोई हरज नहीं है अगरचे एहतियाते मुस्तहब यह है कि ज़मीन पर इतना चला जाये कि वह भी ख़त्म हो जायें।

    (190) जूते का अंदरूनी हिस्सा ज़मीन पर चलने से पाक नहीं होता और ज़मीन पर चलने से मोज़े के निचले हिस्से का पाक होना भी मुश्किल है। लेकिन अगर मोज़े का निचला हिस्सा चमड़े या चमड़े से मिलती जुलती किसी चीज़ से बना हो तो वह ज़मीन पर चलने से पाक हो जायेगा।

    3- सूरज

    (191) सूरज- ज़मीन, इमारत और दीवार को इन पाँच शर्तों के साथ पाक करता है।

    (1) नजिस चीज़ इस तरह तर हो कि अगर दूसरी चीज़ उससे लग जाये तो तर हो जाये। लिहाज़ा अगर वह चीज़ ख़ुश्क हो तो उसे किसी तरह तर कर लेना चाहिए ताकि धूप से ख़ुश्क हो।

    (2) अगर किसी चीज़ में ऐन निजासत हो तो धूप से ख़ुश्क करने से पहले उस चीज़ से निजासत को दूर कर लिया जाये।

    (3) कोई चीज़ धूप में रकावट न डाले। अगर धूप परदे, बादल या ऐसी ही किसी चीज़ के पाछे से नजिस चीज़ पर पड़े और उसे ख़ुश्क करदे तो वह चीज़ पाक नहीं होगी। अलबत्ता अगर बादल इतना हलका हो कि धूप को न रोके तो कोई हरज नहीं है।

    (4) सूरज तनहा नजिस चीज़ को ख़ुश्क करे। लिहाज़ा अगर नजिस चीज़ हवा और धूप से ख़ुश्क हो तो पाक नहीं होगी। हाँ अगर हवा इतनी हलकी हो कि यह न कहा जा सके कि नजिस चीज़ को ख़ुश्क करने में उसने भी कोई मदद की है तो फ़िर कोई हरज नहीं।

    (5) इमारत की बुनियाद या वह हिस्से जो नजिस हो गये है, वह धूप से एक ही बार में ख़ुश्क हों। लिहाज़ा अगर धूप एक बार नजिस ज़मीन या इमारत पर पड़े और उसके ऊपरी हिस्सा को ख़ुश्क कर दे और दूसरी बार उसके अन्दरूनी हिस्से को ख़ुश्क करे, तो उसका ऊपरी हिस्सा तो पाक हो जायेगा लेकिन अन्दरूनी हिस्सा नजिस रहेगा।

    (192) सूरज, नजिस चटाई को पाक कर देता है लेकिन अगर चटाई धागे से बनी हुई हो तो धागों का पाक होना मुश्किल है। इसी तरह घास दरख़्तों, दरवाज़ों और ख़िड़कियों का सूरज के ज़रिये पाक होना मुश्किल है।

    (193) अगर धूप नजिस ज़मीन पर पड़े, उसके बाद शक हो कि धूप पडते वक़्त ज़मीन तर थी या नहीं, या उसकी तरी धूप के ज़रिये ख़ुश्क हुई या नहीं, तो वह ज़मीन नजिस होगी। और अगर शक पैदा हो कि धूप पड़ने से पहले ऐने निजासत ज़मीन पर से हटा दी गई थी या नहीं, या यह कि कोई चीज़ धूप को माने थी या नहीं, तो फ़िर भी यही सूरत होगी (यानी ज़मीन नजिस रहेगी)।

    (194) अगर धूप नजिस दीवार की एक तरफ़ पड़े और उसके ज़रिये दीवार उस तरफ़ से भी ख़ुश्क हो जाये जिस पर धूप नहीं पड़ी, तो बईद नहीं की दिवार दोनों तरफ़ से पाक हो जाये।

    4- इस्तेहाला

    (195) अगर किसी नजिस चीज़ की जिन्स इस तरह बदल जाये कि वह एक पाक चीज़ की शक्ल इख़्तियार कर ले तो वह पाक हो जाती है। मिसाल को तौर पर अगर नजिस लकड़ी जल कर राख हो जाये, या कुत्ता नमक की खान में गिर कर नमक बन जाये तो वह पाक होगें। लेकिन अगर किसी नजिस की जिन्स न बदले, मसलन नजिस गेहूँ को पीस कर आटा बना लिया जाये या नजिस आटे की रोटी बना ली जाये तो वह पाक नहीं होगी।

    (196) मिट्टी का लोटा या कोई दूसरी ऐसी चीज़ जो नजिस मिट्टी से बनाई जायें नजिस हैं। लेकिन वह कोयला जो नजिस लकड़ी से तैयार किया जाये अगर उसमें लकड़ी की कोई ख़ासियत बाक़ी न रहे तो वह पाक है।

    (197) ऐसी नजिस चीज़ जिसके बारे में इल्म न हो कि आया उसका इस्तेहाला हुआ या नहीं (यानी जिन्स बदली है या नहीं) नजिस है।

    5- इंक़िलाब

    (198) अगर शराब ख़ुदबख़ुद या किसी चीज़ के मिलाने से, मसलन नमक मिलाने से सिरका बन जाये तो पाक हो जायेगी है।

    (199) वह शराब जो नजिस अँगूर या उस जैसी किसी दूसरी चीज़ से तैयार की गई हो या कोई दूसरी निजासत शराब में गिर जाये तो वह शराब सिरका बन जाने पर पाक नहीं होगी।

    (200) नजिस अंगूर, नजिस किशमिश और नजिस खज़ूर से जो सिरका तैयार किया जाये, वह नजिस है।

    (201) अगर अंगूर या ख़जूर के डंठल भी उनके साथ हों और उनसे सिरका तैयार किया जाये तो कोई हरज नहीं बल्कि अगर उनके साथ खीरे और बैगन वग़ैरा भी डालें जाये तो कोई हरज नहीं है, चाहे उन्हें अंगूर या खजूर सिरका बनने से पहले ही डाल दिया जाये, इस शर्त के साथ कि सिरका बनने से पहले उनमें नशा न पैदा हुआ हो।

    (202) अगर अंगूर के रस में, आंच पर रखने से या ख़ुद बख़ुद जोश आ जाये तो वह हराम हो जाता है और अगर वह उतना उबल जाये कि उसका दो तिहाई हिस्सा कम हो जाये और एक बाक़ी रह जाये तो हलाल हो जाता है और मसला (214) में बताया जा चुका है कि अंगूर का रस जोश देने से नजिस नहीं होता।

    (203) अगर अंगूर के रस का दो तिहाइ बग़ैर जोश में आये कम हो जाये और जो बाक़ी बचे उसमें जोश आ जाये तो अगर लोग उसे अंगूर का रस कहें, शीरा न कहें तो एहतियाते लाज़िम की बिना पर वह हराम है।

    (204) अगर अंगूर के रस के बारे में मालूम न हो कि जोश में आया है या नहीं तो वह हलाल है। लेकिन अगर जोश में आ जाये और यह यक़ीन न हो कि उसका दो तिहाई कम हुआ है, तो वह हलाल नहीं होगा।

    (205) अगर कच्चे अंगूर के गुच्छे में कुछ पक्के अंगूर भी हों और उस गुच्छे से निकले हुए रस को लोग अंगूर का रस न कहें, तो अगर उसमें जोश आ जाये तो उसका पीना हलाल है।

    (206) अगर अंगूर का एक दाना किसी ऐसी चीज़ में गिर जाये जो आग पर जोश खा रहीं हो और वह भी जोश खाने लगे, तो अगर वह फट कर उस चीज़ में न मिल हो तो फ़क़त उस दाने का खाना हराम है।

    (207) अगर कुछ देग़ों में शीरा पकाया जा रहा हो तो जो चमचा जोश में आई हुई देग़ में ड़ाला जा चुका हो, उसको ऐसी देग़ में डालना भी जायज़ है जिसमें अभी जोश न आया हो।

    (208) जिस चीज़ के बारे में यह मालूम न हो कि वह कच्चे अंगूरों का रस है या पक्के अंगूरों का, अगर उसमें जोश आ जाये तो वह हलाल है।

    6- इंतेक़ाल

    (209) अगर इंसान या ख़ूने जहिन्दादार हैवान का ख़ून, कोई ऐसा हैवान जिसमें आम तौर पर ख़ून नहीं होता, इस तरह चूसले कि वह ख़ून उस हैवान के बदन का जुज़ हो जाये, मसलन जिस तरह मच्छर, इंसान या हैवान के बदन का ख़ून चूसले, तो वह ख़ून पाक हो जाता है और उसे इंतेक़ाल कहते हैं। लेकिन इलाज़ की ग़रज़ से इंसान का जो ख़ून, जोंक चूसती है वह जोंक के बदन का जुज़ नहीं बनता बल्कि इंसानी ख़ून ही रहता है इस लिए वह नजिस है।

    (210) अगर कोई इंसान अपने बदन पर बैठे मच्छर को मार दे और वह ख़ून जो मच्छर ने चूसा हो उसके बदन से निकले तो ज़ाहिर यह है कि वह ख़ून पाक है, क्योंकि वह ख़ून इस क़ाबिल था कि मच्छर की ग़िज़ा बन जाये चाहे मच्छर के ख़ून चूसने और मारे जाने के बीच थोड़ा ही फ़ासला हो। लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि इस ख़ून से इस हालत में परहेज़ किया जाये।

    7- इसलाम

    (211) अगर कोई काफ़िर शहादतैन पढ़ले यानी किसी भी ज़बान में अल्लाह की वहदानियत और ख़ातेमुल अम्बिया हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स0) की नबूवत की गवाही दे, तो मुसलमान हो जाता है। अगरचे वह मुसलमान होने से पहले नजिस के हुक्म में था लेकिन मुसलमान हो जाने के बाद उसका बदन, थूक, नाक का पानी और पसीना पाक हो जाता है । लेकिन मुसलमान होने के वक़्त अगर उसके बदन पर कोई ऐने निजासत हो तो उसे दूर करना और उस मक़ाम को पानी से पाक करना ज़रूरी है। बल्कि अगर मुसलमान होने से पहले ही ऐने निजासत दूर हो चुकी हो तब भी एहतियाते वाजिब यह है कि उस मक़ाम को पानी से पाक किया जाये।

    (212) एक काफ़िर के मुसलमान होने से पहले अगर उसका गीला लिबास उसके बदन से छू गया हो तो चाहे उसके मुसलमान होने के वक़्त वह लिबास उसके बदन पर हो या न हो, एहतियाते वाजिब की बिना पर उससे परहेज़ करना ज़रूरी है।

    (213) अगर काफ़िर शहादतैन पढ़ले और यह मालूल न हो कि वह दिल से मुसलमान हुआ है या नहीं तो वह पाक है और अगर यह इल्म हो कि वह दिल से मुसलमान नहीं हुआ है लेकिन ऐसी कोई बात उससे ज़ाहिर न हुई हो जो तौहीद और रिसालत की गवाही के ख़िलाफ़ हो, तो तब भी यही सूरत है। (यानी वह पाक है।)

    8- तबइयत

    (214) तबइयत का मतलब यह है कि कोई नजिस चीज़ किसी दूसरी चीज़ के पाक होने की वजह से पाक हो जाये।

    (215) अगर शराब सिरका हो जाये तो उसका बर्तन भी उस जगह तक पाक हो जाता है जहाँ तक शराब जोश खाकर पहुँची हो और अगर कपड़ा या कोई दूसरी चीज़ जो आम तौर पर उस (शराब के बर्तन ) पर रखी जाती हो और उससे नजिस हो गई हो, तो वह भी पाक हो जाती है लेकिन अगर बर्तन का बाहरी हिस्सा उस शराब से सन गया हो तो एहतियाते वाजिब यह है कि शराब के सिरका हो जाने के बाद बर्तन के उस बाहरी हिस्से से परहेज़ किया जाये।

    (216) काफ़िर का बच्चा तबीयत के ज़रिये दो सूरतों में पाक हो जाता है।

    (1) अगर काफ़िर मर्द मुसलमान हो जाये तो उसका बच्चा तहारत में उसके ताबे है। और इसी तरह अगर बच्चे की माँ या दादी या दादा मुसलमान हो जायें तब भी यही हुक्म है। लेकिन इस सूरत में बच्चे की तहारत का हुक्म इस शर्त के साथ है कि बच्चा उस नये मुसलिम के साथ और उसके ज़ेरे किफ़ालत हो, और उस बच्चे का कोई सबसे नज़दीक का काफ़िर रिशतादार, उस बच्चे के साथ न हो।

    (2) वह काफ़िर बच्चा जिसे किसी मुसलमान ने क़ैद कर लिया और उस बच्चे के बाप या बुज़ुर्ग (दादा या नाना वग़ैरा) में से कोई एक भी उसके साथ न हो। इन दोनों सूरतों में बच्चे के तबइयत की बिना पर पाक होने की शर्त यह है कि वह मुमय्यज़ होने की सूरत में अपने आपको काफ़िर ज़ाहिर न करे।

    वह तख़ता या सिल जिस पर मय्यित को ग़ुस्ल दिया जाये और वह कपड़ा जिससे मय्यित की शर्मगाह को ढका जाये और ग़स्साल (ग़ुस्ल देने वाला) के हाथ ग़ुस्ल मुकम्मल होने के बाद पाक हो जाते हैं।

    (219) अगर कोई इंसान किसी चीज़ को पोनी से पाक करे तो उस चीज़ के पाक होने पर उस इंसान का वह हाथ भी पाक हो जाता है जिससे उस चीज़ को पाक किया है।

    (220) अगर लिबास या उस जैसी किसी दूसरी चीज़ को क़लील पानी से धोया जाये और उसका पानी निकालने के लिए उसे इतना निचोड़ा दिया जाये जितना आम तौर पर निचोड़ा जाता है, तो जो पानी उसमें बाक़ी रह जाये, वह पाक है।

    (221) अगर नजिस बर्तन को क़लील पानी से पाक किया जाये, तो जो पानी बर्तन को पाक करने के लिए उस पर डाला जाता है, उसके बह जाने के बाद जो मामूली सा पानी उसमें बाक़ी रह जाता है वह पाक है।

    9- ऐने निजासत का दूर हो जाना

    (222) अगर किसी हैवान का बदन ऐने निजसात मसलन ख़ून या नजिस शुदा चीज़ मसलन नजिस पानी से भीग जाये तो उस निजासत के दूर हो जाने के बाद हैवान का बदन पाक हो जाता है। यही सूरत इंसानी बदन के अन्दरूनी हिस्सों की भी है मिसाल के तौर पर अगर मुँह ,नाक और कान के अन्दरूनी हिस्से में बाहर से कोई निजासत लग जाये तो वह नजिस हो जायेंगे, लेकिन जैसे ही वह निजासत दूर हो जायेगी, वह खुद ब ख़ुद पाक हो जायेंगे। लेकिन दाख़ली निजासत की वजह से   अन्दरूनी हिस्से नजिस नहीं होते जैसे अगर मसूड़ों से खून निकले तो वह मुँह के अन्दरूनी हिस्से को नजिस नही करता। इसी तरह अगर कोई बाहरी चीज़ बदन के दाखली हिस्से में किसी नजिस चीज़ से मिल जाये तो वह नजिस नही होती, इस बिना पर अगर मसनूई दाँत पर क़ुदरती दाँतों के मसूड़ों से निकला हुआ ख़ून लग जाये तो उन दाँतों को पाक करना लाज़िम नहीं है। लेकिन अगर उन मसनूई दाँतों को नजिस ग़िज़ा लग जाये तो उनका पाक करना लाज़िम है।

    (223) अगर दाँतों की दरारों में ग़िज़ा लगी रह जाये और फ़िर मुँह के अन्दर खून निकल आये तो वह ग़िज़ा ख़ून से मिलने से नजिस नहीं होगी।

    (224) होँटों और आँख की पलकों के वह हिस्से जो बंद करते वक़्त एक दूसरे से मिल जाते हैं वह अन्दरूनी हिस्से के हुक्म में आते हैं। अगर उस अन्दरूनी हिस्से में बाहर से कोई निजासत लग जाये तो उस अन्दरूनी हिस्से को पाक करना ज़रूरी नहीं है। लेकिन बदन के वह हिस्से जिनके बारे में इंसान को यह शक हो कि यह अन्दरूनी हिस्सा है या बाहरी, तो अगर उनमें बाहर से कोई निजासत लग जाये तो उन्हें पाक करना चाहिए।

    (225) अगर कपड़े, ख़ुश्क क़ालीन, दरी या ऐसी ही किसी चीज़ को नजिस मिट्टी लग जाये और कपड़े वग़ैरा को यूँ झाड़ा दिया जाये कि उससे नजिस मिट्टी अलग हो जाये, तो अगर बाद में कोई चीज़ कपड़े वग़ैरा को छू जाये, तो वह चीज़ नजिस नहीं होगी।

    10- निजासात खाने वाले हैवान का इस्तबरा

    (226) जिस हैवान को इंसानी निजासत खाने की आदत पड़ गई हो, उसका पेशाब पाख़ाना नजिस है और अगर उसे पाक करना मक़सूद हो तो उसका इस्तबरा करना ज़रुरी है। यानी एक अर्से तक उसे निजासत न खाने दें और पाक ग़िज़ा दें हत्ता कि इतनी मुद्दत गुज़र जाये की फिर उसे निजासत खाने वाला न कहा जा सके और एहतियाते मुसहब की बिना पर निजासत खाने वाले ऊँट को चालीस दिन तक, गाय को बीस दिन तक, भेड़ को दस दिन तक, मुर्गी को सात या पाँच दिन तक और पालतू मुर्ग़ी को तीन दिन तक निजासत खाने से रोके रखा जाये। अगरचे यह मुद्दत गुज़रने से पहले ही उन्हें निजासत खाने वाले हैवान न कहा जा सके (तब भी उस मुद्दत तक उन्हें निजासत खाने से रोके रखा जाये।

    11- मुसलमान का ग़ायब हो जाना

    (227) अगर बालिग़ और पाक व ना पाक की समझ रखने वाले मुसलमान का बदन या दूसरी चीज़े ,मसलन बर्तन और दरी वग़ैरा जो उसके इस्तेमाल में हों, नजिस हो जायें और फिर वह वहाँ से चला जाये तो अगर कोई इंसान यह समझे कि उसने यह चीज़ें पाक की हैं तो वह पाक होगीं लेकिन एहतियाते मुस्तहब यह है कि उनको पाक न समझे मगर नीचे लिखीं कुछ शर्तों के साथ वह पाक है।

    (1) जिस चीज़ ने उस मुसलमान के लिबास को नजिस किया हो वह उसे नजिस समझता हो। लिहाज़ा अगर मिसाल के तौर पर उसका लिबास तर हो और काफ़िर के बदन से छू गया हो और वह उसे नजिस समझता हो तो उसके चले जाने के बाद उसके लिबास को पाक नहीं समझना चाहिए।

    (2) उसे इल्म न हो कि उसका बदन या लिबास नजिस चीज़ से लग गया है।

    (3) कोई इंसान, उसे उस चीज़ को ऐसे काम में इस्तेमाल करते हुए देखे जिसमें उसका पाक होना ज़रूरी हो, मसलन उसे उस लिबास के साथ नमाज़ पढ़ते हुए देखे।

    (4) इस बात का एहतेमाल हो कि वह मुसलमान उस चीज़ के साथ जो काम कर रहा है उसके बारे में उसे इल्म है कि इस काम के लिए उस चीज़ का पाक होना ज़रूरी है। मिसाल के तौर पर अगर वह मुसलमान यह नहीं जानता कि नामाज़ पढ़ने वाले का लिबास पाक होना चाहिए और नजिस लिबास के साथ ही नमाज़ पढ़ा रहा हो तो ज़रूरी है कि इंसान उस लिबास को पाक न समझे।

    (5) वह मुसलमान नजिस और पाक चीज़ में फ़र्क़ करता हो। अगर वह मुसलमान नजिस और पाक में लापरवाही करता हो तो ज़रूरी है कि इंसान उस चीज़ को पाक न समझे।

    (228) अगर किसी इंसान को यक़ीन या इत्मिनान हो कि जो चीज़ पहले नजिस थी अब पाक हो गयी है या दो आदिल इंसान उसके पाक होने के बारे में गवाही दें और उनकी गवाही उस चीज़ की पाकी का जवाज़ बने तो वह चीज़ पाक है। इसी तरह अगर कोई इंसान जिसके पास कोई नजिस चीज़ हो, वह कहे कि वह चीज़ पाक हो गयी है और वह ग़लत बयान न हो या किसी मुसलमान ने एक नजिस चीज़ को पाक किया हो, चाहे यह मालूम न हो कि उसने उसे ठीक पाक किया है या नहीं, तो वह चीज़ पाक है।

    (229) अगर किसी ने एक इंसान का लिबास पाक करने की ज़िम्मेदारी ली हो और वह कहे कि मैंने उसे पाक कर दिया है और उस इंसान को उसके यह कहने से तसल्ली हो जाये तो वह लिबास पाक है।

    (230) अगर किसी इंसान की यह हालत हो जाये कि उसे किसी नजिस चीज़ के पाक होने का यक़ीन ही न हो पाता हो तो अगर वह उस चीज़ को इस तरह धो ले जिस तरह दूसरे इंसान किसी नजिस चीज़ को आम तौर पर धोते हैं तो काफ़ी है।

    12- मामूल के मुताबिक़ (ज़बीहे के) ख़ून का बह जाना

    (231) जैसा कि मसला (98) में बताया गया है कि किसी जानवर को शरई तरीक़े से ज़िबह करने के बाद जब उसके बदन से मामूल के मुताबिक़ (ज़रूरी मिक़दार में) ख़ून निकल जाये, तो जो ख़ून उसके बदन में बाक़ी रह जाता है वह पाक है।

    (223) ऊपर मसला नम्बर 231 में बयान किया गया हुक्म एहतियात की बिना पर उस जानवर से मख़सूस है जिसका गोश्त हलाल है। जिस जानवर का गोश्त हराम हो उस पर यह हुक्म जारी नहीं हो सकता। बल्कि एहतियाते मुस्तहब यह है कि यह हुक्म, हलाल गोश्त जानवर के बदन के उन हिस्सों पर भी जारी नहीं हो सकता जो हराम हैं।

    बर्तनों के अहकाम

    (233) जो बर्तन कुत्ते, सुअर या मुर्दार के चमड़े से बनाये गये हों उनमें किसी चीज़ का खाना पीना जबकि तरी उसकी निजासत का सबब बनी हो, हराम है। उस बर्तन को वुज़ू और ग़ुस्ल और ऐसे किसी भी दूसरे काम में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जिसे पाक चीज़ से अंजाम देना ज़रूरी हो और एहतियाते मुस्तहब यह है कि कुत्ते, सुअर और मुर्दार के चमड़े को बर्तनों के अलावा दूसरी चीज़ों में न भी हो इस्तेमाल न किया जाये।

    (234) सोने और चाँदी के बरतनों में खाना पीना और एहतियाते वाजिब की बिना पर उनको दूसरे कामों में भी इस्तेमाल करना हराम है। लेकिन उनसे कमरा वग़ैरा सजाने या उन्हें अपने पास रखने में कोई हरज नहीं है, जबकि बेहतर यह है कि इससे भी परहेज़ किया जाये। सजावट या अपने पास रखने के लिए सोने और चाँदी के बर्तन बनाने और उन्हे ख़रीदने व बेचने का भी यही हुक्म है।

    (235) अगर इस्तेकान (शीशे का छोटा सा गिलास जिसमें क़हवा पीते हैं) का होलडर सोने या चाँदी से बना हुआ हो, तो अगर उसे बर्तन कहा जाये तो वह सोने, चाँदी के बर्तन के हुक्म में है और अगर बर्तन न कहा जाये तो उसके इस्तेमाल में कोई हरज नहीं है।

    (236) जिन बर्तनों पर सोने या चाँदी की पालिश हो, उनके के इस्तेमाल में कोई हरज नहीं है।

    (237) अगर जस्त को चाँदी या सोने में मख़लूत करके बर्तन बनाए जाये और जस्त इतनी ज़्यादा मिक़दार में हो कि उस बर्तन को सोने या चाँदी का बर्तन न कहा जाये तो उसके इस्तेमाल में कोई हरज नहीं हैं।

    (238) अगर ग़िज़ा सोने या चाँदी के बर्तन में रखी हो और कोई इंसान उसे दूसरे बर्तन में निकाल ले, तो अगर दूसरा बर्तन आम तौर पर पहले बर्तन में खाने का ज़रिया शुमार न हो तो ऐसा करने में कोई हरज नहीं है।

    (239) हुक़्क़े के चिलम का सुराख़ वाल ढकना, तलवार या छुरी, चाक़ू का म्यान और क़ुरान मजीद रखने का डब्बा अगर सोने या चाँदी से बने हों तो कोई हरज नहीं है। जबकि एहतियाते मुस्तहब यह है कि सोने चाँदी के बने हुए इत्र दान, सुर्मे दानी और अफ़ीम दीनी को इस्तेमाल न किया जाये।

    (240) मजबूरी की हालत में सोने चाँदी के बरतों में, इतना खाने पाने में कोई हरज नहीं जिससे भूक मिट जाये लेकिन उससे ज़्यादा खाना पीना जायज़ नहीं है।

    (241) जिसके बर्तन के बारे में यह मालूम न हो कि यह सोने, चाँदी से बना हुआ है या किसी और चीज़ से, तो उसको इस्तेमाल करने में कोई हरज नहीं है।