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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-10

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    क्या खाएं क्या न खाएं और किस प्रकार खाएं यह प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा का एक महत्त्वपूर्ण विषय है जिस पर प्राचीन चिकित्सा के हकीम विशेष रूप से ध्यान दिया करते थे और बहुत सी समस्या जैस जलवायु, आयु का बढ़ना आदि जो कि मनुष्य की क्षमता व शक्ति से बाहर हैं और एक प्रकार से उसके भाग्य का हिस्सा हैं उनपर भी विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था।

    इस संबंध में डाक्टर ख़ादिम कहते हैं कि आप जानते हैं कि वास्तव में ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में स्वास्थ्य के सिद्धांत बीमारियों से बचाव के अर्थ में हैं। हकीम और चिकित्सक इस बात पर विश्वास रखते थे कि मानवीय समाज की इस प्रकार देखभाल की जाए कि मनुष्य पहले तो बीमार न हो और यदि बीमार पड़ जाए तो उस समय उपचार के विशेष सिद्धांतों के अंतर्गत उसका उपचार किया जाए अर्थात उसे दवा दी जाए। प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली का यह सिद्धांत था कि मनुष्य को पहले तो बीमार न होने दिया जाए और उसके स्वास्थ की रक्षा की जाए। स्वास्थ्य की रक्षा छह सिद्धांतों पर आधारित है और इसका एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि किस प्रकार आहार का सेवन किया जाए, कौन से आहार लिए जाए और कब आहार का सेवन किया जाए। हम सबको ज्ञात है कि आहार, आहार की विविधता और गुणवत्ता हमारे स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालते हैं। यह चिकित्सकों का दायित्व है कि वह बीमार का निरिक्षण करके और उसकी बीमारी की समीक्षा करके सबसे पहले उसके स्वाभाव को निर्धारित करे और उसके बाद उसके लिए आहार का चयन करे जो वास्तव में उसके स्वस्थ होने के लिए होते हैं और उनसे ही उसके शरीर को शक्ति मिलती है। ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में हर मनुष्य को उसके स्वभाव के दृष्टिगत एक पुस्तक के रूप में माना जाता है। हमारे पास आहार का कोई एक सिद्धांत नहीं है या विभिन्न लोगों के लिए आहार के समान सिद्धांत नहीं हैं बल्कि हमें हर व्यक्ति के लिए उसके विशेष स्वभाव के अनुसार अलग अलग आहार निर्धारित करना पड़ता है और हर बीमार के लिए आहार अलग होते हैं।

    नरेशनः हमने आपको बताया कि ईरान की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में स्वास्थ्य की रक्षा के लिए छह सिद्धांत बनाए गये हैं। इनका पालन करके हम स्वभाव में संतुलन स्थापित कर सकते हैं।

    डाक्टर ख़ादिम इस बारे में कहते हैं कि आहार शरीर की ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करता है। अर्थात जो ऊर्जा शरीर से समाप्त हो चुकी होती है उसे पुनः उत्पन्न करता है। आहार से ही शरीर के विभिन्न अंग और भाग ऊर्जा और शक्ति प्राप्त करते हैं और इन्हीं प्रभावों के अंतर्गत शरीर में विभिन्न परिवर्तन उत्पन्न होते हैं। कभी कभी यह परिवर्तन सकारात्मक होते हैं और कभी नकारात्मक होते हैं। आहार मनुष्य के शरीर और मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालता है। इन सब बातों से यह पता चलता है कि आहार मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण आधार का स्थान रखता है और प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में इसे बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त है। हमारी पवित्र पुस्तक क़ुरआने मजीद में भी मनुष्य के आहार को बहुत महत्त्व दिया गया है और कहा गया है कि मनुष्य को अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए, मुसलमानों के लिए यह एक धार्मिक आदेश है। प्राचीन चिकित्सा प्रणाली हो या आधुनिक चिकित्सा प्रणाली इनमें आहार के महत्त्व पर बल दिया गया है, चिकित्सा विज्ञान कहता है कि आहार मनुष्य के शरीर को ऊर्जा प्रदान करने के अतिरिक्त दूसरे अन्य भी प्रभाव रखता है जो बहुत अधिक स्पष्ट होते है। आहार न केवल शरीर बल्कि आत्मा पर भी प्रभाव डालता है।

    मनुष्य में संतुलन बनाए रखने और स्वास्थ्य की रक्षा का एक मात्र मार्ग आहार है।

    डाक्टर ख़ादिम इस बारे में कहते हैं कि ईरान की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में चूंकि आहार को मनुष्य के स्वास्थ्य का आधार समझा जाता है अतः आहार को तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले प्रकार के आहार हल्के हैं और दूसरे प्रकार के आहार भारी और तीसरे प्रकार के आहार संतुलित हैं। इनमें से कुछ की परिभाषा बयान करूंगा। एक प्रकार के आहार को हम सालेहुल कैमूस कहते हैं और दूसरे प्रकार के आहार को हम रदतुल कैमूस कहते हैं और तीसरे प्रकार के आहार को हम संतुलित आहार का नाम देते हैं। दूसरे शब्दों में कुछ आहार बहुत भारी और शक्तिशाली होते हैं और कुछ मध्यम दर्जे की शक्ति के स्वामी होते हैं और कुछ संतुलित होते हैं। मैं अपने श्रोताओं को यह बताता चलूं कि हमारी प्राचीन चिकित्सा की पुस्तकें चूंकि अरबी भाषा में है इसीलिए हम अरबी भाषा की इन शब्दावलियों को प्रयोग करने में विवश हैं। वास्तव में उस काल की वैज्ञानिक भाषा अरबी थी और इसी आधार पर हमारे विद्वानों ने अपनी पुस्तकें अरबी भाषा में लिखी हैं। ईरान के महान विद्वान और हकीम यद्यपि वह ईरानी थे किन्तु उन्होंने अपनी समस्त पुस्तकें अरबी भाषा में लिखी हैं जो हमारे लिए महान धरोहर हैं बल्कि इस्लामी जगत के लिए यह पुस्तकें अनमोल धरोहरें हैं। यही कारण है कि हम आज भी अरबी शब्दावलियों का प्रयोग करते हैं।

    तेहरान विश्वविद्यालय में दवानिर्माण संकाय में विभिन्न विभाग हैं जिनमें शोधकर्ता जड़ी बूटियों के बारे में शोध करते रहते हैं। एक विभाग जड़ी बूटियों के उगाने और उन्हें रखने का भी है जिसे हरबेरियम कहते हैं। यह विभाग यूनानी चिकित्सा के प्रोफ़ेसरों और छात्रों के प्रयासों से स्थापित हुआ है और इसमें विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां बोइ जाती हैं और विभिन्न जड़ी बूटियों के बारे में शोध किए जाते हैं। इस संकाय में विभिन्न हरबेरियम बनाए गये हैं।