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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-11

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    ईरान की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा के अनुसार जिस आहार का सेवन किया जाता है वह मुंह के पानी से मिलकर, चबाए जाने की प्रक्रिया और पाचनतंत्र की गतिविधियों से प्रभावित होकर जौ के सूप की भांति एक गाढ़े लेप में परिवर्तित हो जाता है जिसे अमाशय का कीलूस कहा जाता है। उसके बाद सूप की भांति यह पदार्थ रक्तवाहिनियों या नाड़ियों से होता हुआ यकृत में पहुंच जाता है और वहां से यह पदार्थ यकृत की गर्मी और अन्य चीज़ों से प्रभावित होकर यकृत के कैमूस में परिवर्तित हो जाता है।

    डाक्टर ख़ादिम इस संबंध में कहते हैं कि इससे पूर्व के कार्यक्रमों में हमने बताया था कि ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में आहार को तीन भागों में विभाजित किया गया है। पिछले कार्यक्रम में हल्के, भारी और संतुलित आहार के बारे में विस्तार से बताया गया था। अब आपको सालेहुल कैमूस और रेदतुल कैमूस नामक आहार के बारे मे बताऊंगा। सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि कैमूस क्या है? हम ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा के सिद्धांतों के अनुसार यह मानते है कि आहार का जब सेवन कर लिया जाता है और वह अमाशय में पहुंच जाती है तो पचने की क्रिया आरंभ हो जाती है और वह एक लेप के रूप में आ जाती है इसे किलोस कहा जाता है, यह लेप जब पाचन क्रिया के दूसरे चरण में यकृत में पहुंचता है उसे कैमूस कहते हैं। हमारा यह कहना है कि आहार या तो सालेहूल कैमूस है या रेदतुल कैमूस है। सालेहुल कैमूस का अर्थ वह आहार हैं जिनके पचने के बाद शरीर में लाभदायक और स्वस्थ पदार्थ पैदा होते हैं और उसके परिणाम स्वरूप मनुष्य स्वस्थ रहता है। रेदतुल कैमूस का अर्थ यह है कि आहार के पचने के पश्चात अस्तित्व में आने वाले वह पदार्थ लाभदायक नहीं होते। इसको यूं बयान किया जाता सकता है कि प्राचीन चिकित्सा के अनुसार मनुष्य के शरीर में चार प्रकार के तत्व या पदार्थ होते हैं। ख़िल्ते ख़ून, ख़िल्ते बलग़म, ख़िल्ते सफ़रा व ख़िल्ते सौदा। इसमें महत्त्वपूर्ण ख़िल्त रक्त या ख़ून है।

    प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में शरीर में मौजूद मूल पदार्थों को जो आहार में होने वाले विभिन्न परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आते हैं इस गाढ़े और तरल मिश्रण को ख़िल्त कहा जाता है।

    डाक्टर ख़ादिम का कहना है कि सालेहुल कैमूस वह आहार है जिसके पचने के बाद उसका परिणाम सकारात्मक हो और उसके पचने के परिणाम स्वरूप चार ख़िल्त शरीर की आवश्यकता के अनुरूप पैदा होते हैं। यह आहार शरीर की आवश्यकता के अनुसार ख़ून पैदा करते हैं जो शरीर का मूल मिश्रण है इसी प्रकार शरीर की आवश्यकता के अनुसार सफ़रा, सौदा और बलग़म को पैदा करते हैं। इस आहार से चारों ख़िल्त न तो अधिक पैदा होते हैं और न ही कम। सालूहुल कैमूस का उदहारण भेड़ बकरी और पक्षियों के ताज़े मांस से दी जा सकती है, कम उबला हुआ अंडा जिसे अधिक न पकाया गया हो, यह भी ऐसे आहार में शामिल है जिसके बारे में यह कह सकते हैं कि इनके पचने से शरीर में सकारात्मक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं और यह शरीर में उचित मात्रा में चारों ख़िल्त पैदा करते हैं जिनसे शरीर स्वस्थ रहता है और यह शरीर को किसी प्रकार से हानि नहीं पहुंचाते और इनसे शरीर को भरपूर लाभ होता है। ऐसे आहार को सालेहुल कैमूस कहा जाता है क्योंकि यह शरीर के विकास और उसे बीमारी से दूर रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

    अब देखते हैं कि रेदतुल कैमूस कैसे आहार को कहते हैं। यह वह आहार हैं जिनके पचने के बाद शरीर में चारों मिश्रण पैदा तो होते हैं किन्तु उनकी मात्रा उचित नहीं होती, कुछ कम होते हैं तो कुछ अधिक। इसी आधार पर कहा जाता है कि इस प्रकार के आहार का प्रयोग लंबी अवधि में शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है। प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा की दृष्टि से हम इन समस्त आहारों को जो आज फ़ास्ट फूड के नाम से प्रचलित हैं, रेदतुल कैमूस में शामिल कर सकते हैं। जैसे सासेज़ और डिब्बे में बंद खाने हैं। डिब्बे में बंद खाने यदि मांस वाले हैं तो इन्हें बासी मांस में शामिल किया जाएगा और निसंदेह यह स्वास्थ के लिए हानिकारक हैं। डिब्बे में बंद खानों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष प्रकार के पदार्थों का प्रयोग किया जाता है जिसे प्रिज़र्वेटिव कहा जाता है जो स्वयं स्वास्थ के लिए हानिकारक होते हैं और विदित रूप से ताज़े खानों और बासी खानों में तो अंतर होता ही है और इनके प्रभाव भी भिन्न होते हैं।

    यकृत के कैमूस में रक्त, सौदा, सफ़रा और बलग़म जैसे चार ख़िल्त पाये जाते हैं। इनमें से हर एक ख़िल्त स्वभाव की दृष्टि से विशेष गुणवत्ता का स्वामी होताहैं। सौदा ठंडा और शुष्क होता है, बलग़म ठंडा और तरल होता है, ख़ून गर्म और तरल होता है और सफ़रा गर्म और शुष्क होता है। इन चारों ख़िल्तों का संतुलित रहना स्वास्थ के लिए अत्यंत आवश्यक है और इनमें संतुलन बनाए रखने के लिए आहार और आहार की गुणवत्ता और प्रयोग महत्त्वपूर्ण भूमिका रखते हैं।

    डाक्टर ख़ादिम इस संबंध में कहते हैं कि वह लोग जो सामान्य रूप से उदाहरण स्वरूप फ़ास्ट फ़ूड का प्रयोग करते हैं या डिब्बे में बंद खाने खाते हैं और इनसे इन खानों की आदत पड़ गयी है तो चूंकि यह खाने रेदतुल कैमूस हैं इनके शरीर की आवश्यकता के अनुसार चारों ख़िल्त पैदा नहीं होते, कुछ ख़िल्त अधिक पैदा होते हैं और कुछ कम उत्पन्न होते हैं जिससे शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है और बीमारियां उत्पन्न होने लगती हैं। उदाहरण स्वरूप बासी खानों से शरीर में सौदा की मात्रा अधिक उत्पन्न होने लगती है और उसके चिन्ह भी त्वचा पर दिखने लगते हैं। उदाहरण स्वरूप आप गाय का मांस देखें, आज आप देख सकते हैं कि कुछ महिलाओं के चेहरों पर काले धब्बों की शिकायत होती है, यह काले धब्बे सही आहार का सेवन न करने के कारण हैं। प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा यह कहती है कि चेहरे पर काले धब्बे ऐसे आहार का सेवन करने से उतपन्न होते हैं जिनसे शरीर में सौदा की मात्रा आवश्यकता से अधिक पैदा होती है। इनका मुख्य कारण यही फ़ास्ट फ़ूड हैं, डिब्बे में बंद खाने हैं, गाये का मांस हैं, इन से यह समस्याएं उत्पन्न होती हैं। इसी प्रकार आप रोटी को ले लें, रोटी का आटा यदि सही रूप से गून्धा न गया हो और उसको गूधने के लिए सोडे का प्रयोग किया जाए तो वह भी रेदुतकैमूस आहार में शामिल हो जाएगा। यह समस्त चीज़ें शरीर में जाकर शरीर की व्यवस्था को उथल पुथल कर देती हैं और इनके प्रयोग से भांति भांति की बीमारियां उत्पन्न होती है।

    ईरान में जड़ी बूटियों और वनस्पतियों पर शोध करने का एक अन्य विभाग तेहरान विश्वविद्यालय की दवा निर्माण संकाय का हरबेरियम केन्द्र है। यह हरबेरियम वास्तव में तेहरान विश्वविद्यालय के यूनानी चिकित्सा के संकाय से जुड़ा हुआ है और यहां पर विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियों को उगाकर उनकी रक्षा की जाती है और उनको एकत्रित करके सुखाया भी जाता है और हर जड़ी बूटी की फ़ाइल बनाई जाती है और उसमें जड़ी बूटियों की विशेषताओं और चिकित्सा प्रभावों को वर्णित किया जाता है। यह फ़ाइलें जड़ी बूटियों के बारे में शोध करने वालों के लिए बहुत ही लाभदायक होती हैं।