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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-13

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    समय बीतता जाता है और प्रकृति में परिवर्तन आते रहते हैं, समय रंग बदलता रहता है और मौसम एक के बाद एक आते रहते हैं, बसंत के बाद गर्मियां, उसके बाद पतझड़ और फिर सर्दियों का मौसम आ जाता है। हर मौसम की अपनी विशेषताएं होती हैं और वह अपने प्रभाव छोड़ता है।

    इस संबंध में डाक्टर रेज़ाई ज़ादे कहते हैं कि ईरान की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में चार मौसम या चार फ़सलें अर्थात बसंत, गर्मी, पतझड़ और सर्दी अपना अपना स्वभाव रखती हैं। इसका यह अर्थ है कि हर मौसम की अलग गुणवत्ता होती है और वह मनुष्यों पर अपने प्रभाव डालते हैं। ईरान के चिकित्सा विद्वानों और चिकित्सकों के निकट बसंत का मौसम या ऋतु संतुलित स्वाभाव की स्वामी होती है। इसको इस प्रकार बयान किया जा सकता है कि बसंत ऋतु गर्म और तर होती है। बहरहाल चारों मौसमों में बसंत का मौसम सबसे संतुलित होता है। गर्मियों का मौसम गर्म और शुष्क होता है। पतझड़ की विशेषता ठंडी और शुष्क होती है जबकि सर्दियों की विशेषता ठंड और तर होती है। यह स्थिति लगभग हर देश और क्षेत्र में होती है अलबत्ता कुछ देशों और कुछ क्षेत्रों में हो सकता है कि वर्ष में यह चारों मौसम न हों या उनके नामों में कुछ अंतर हो, महत्त्वपूर्ण वह स्थिति है जो इस मौसम में प्रकट होती है। संभव है कि कुछ स्थानों पर बसंत ऋतु कैलेंडर के हिसाब से जल्दी आ जाए या देर में आए इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। हमें बसंत के मौसम से यह आशा रहती है कि यह मौसम संतुलित होगा और मनुष्य के शरीर पर इसका प्रभाव गर्म और तर होगा।

    बसंत का मौसम दमवी स्वभाव के लोगों के लिए उचित नहीं होता और बढ़ने वाले बच्चे और युवा अधिकतर इस मौसम में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में ग्रस्त हो जाते हैं किन्तु यह मौसम अधेड़ आयु वालों और सौदावी स्वभाव के लोगों के लिए बहुत उचित है।

    डाक्टर रेज़ाई ज़ादे इस संबंध में कहते हैं कि चार मौसमों में मनुष्य चाहे इसका स्वभाव कुछ भी हो इन मौसमों के अनुरूप अपने स्वभाव को ढाल लेता है और इसे हम प्राप्त करने वाला स्वाभाव कहते हैं। उदाहरण स्वरूप आप एक सत्तरह अट्ठारह वर्ष के युवा को लें, उसकी प्रवृत्ति में गर्मी और तरी है जो उसके शरीर की आवश्यकता और मांग है अब बसंत का मौसम आता है तो इस युवा के शरीर में पहले से तरी और गर्मी है और बहार की विशेषता भी गर्मी और तरी है यह दोनों मिलकर दुगनी गर्मी पैदा नहीं करते बल्कि एक प्रकार से मौसम के आधार पर इनमें संतुलन आ जाता है। अर्थात व्यक्ति जब पतझड़ के मौसम का सामना करता है तो चूंकि उसके शरीर में गर्मी और तरी होती है और पतझड़ में ठंडा और शुष्क होता है तो इसका स्वभाव बिगड़ता नहीं बल्कि शरीर सर्दी और तरी के अनुरूप ढल जाता है और मनुष्य अपने आप को इस मौसम के अनुरूप ढाल लेता है इस प्रकार से मनुष्य मौसमों को सहन करने के योग्य हो जाता है और इस पर मौसमों के गहरे प्रभाव नहीं पड़ते।

    पतझड़ का मौसम ठंडा और शुष्क होता है और यह मौसम सौदावी स्वभाव वालों के लिए उचित नहीं होता, इसी मौसम में त्वचा की बीमारियां अधिक देखने को मिलती हैं और एगज़ेमा और पैरों और होठों का फटना आम हो जाता है। इस मौसम में सौदावी स्वभाव विशेषकर अधेड़ आयु के लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए। पतझड़ के मौसम में ठंडी हवाओं से बचने का प्रयास करें क्योंकि यह हवाएं विशेष रूप से बच्चों के लिए हानिकारक होती हैं। गर्म और तर आहार जैसे सूप हाफ़ ब्वाएल अंडा, सब्ज़ियां, साग, किशमिश, खजूर, अंगूर, बादाम और पिस्ते का प्रयोग का करना चाहिए।

    डाक्टर रेज़ाई ज़ादे इस संबंध में कहते हैं कि एक और उदाहरण पेश करता हूं एक युवा को अपने दृष्टिगत रखें उदारहण स्वरूप एक आरकी  टेक्ट जिसकी आयु पैंतीस वर्ष की हो, वह जन्मजात गर्म और शुष्क स्वाभाव का स्वामी हो क्योंकि यह उस आयु में है जिसके लिए यह आवश्यक होता है कि वह गर्म और शुष्क हो। अब यह व्यक्ति यदि गर्मियों में काम करना चाहता है और ऐसे स्थान पर काम करना चाहता है जो मरूस्थलीय है। अब मरूस्थल की गर्मी में यदि यह व्यक्ति काम करे तो इसे बहुत अधिक पीड़ा होगी क्योंकि दो प्रकार की गर्मियां मिल जाएंगी और यह व्यक्ति परेशान हो जाएगा। मन लगाकर अपना काम नहीं कर पाएगा और चिंता और परेशानी में ग्रस्त हो जाएगा। हम ऐसे लोगों को यह सुझाव देते हैं कि वह गर्मियों में दोपहर में काम न करें बल्कि सुबह बहुत जल्दी और सूर्योदय के समय अपना काम आरंभ करें या उस समय अपना काम आरंभ करे जब सूर्य की गर्मी हल्की हो जाए और मौसम थोड़ा सही हो जाए। गर्म स्वाभाव के लोगों को गर्मियों में पानी, दही, काहू, नारंगी परिवार वाले फल और ठंडे शरबत और वह चीज़ें जो तरी प्रदान करती हैं उन्हें प्रयोग करना चाहिए। गर्म स्वाभाव के लोगों को हल्के गर्म पानी से जो सर्दी की ओर झुकाव रखता हो उससे नहाना चाहिए, उन्हें दिन में दोपहर के समय विश्राम करना चाहिए ताकि उनके शरीर की गर्मी अधिक न हो जाए। जब सूर्यास्त होने लगे तो अपना कार्य आरंभ करना चाहिए।

    अब आइये पतझड़ की बात करते हैं, आप जानते हैं कि पतझड़ का मौसम शुष्क और ठंडा होता है जिन लोगों का स्वाभाव ठंडा और शुष्क है उन्हें इस मौसम में तनिक परेशानी हो सकती है यह लोग अवसाद का शिकार और दुखी हो सकते हैं। इन्हें त्वचा की बीमारियां हो सकती हैं अलबत्ता यदि इन्हें अवसाद और मानसिक बीमारियां हैं तो यह बीमारियां बढ़ सकती हैं इसी प्रकार वृद्ध लोग अर्थात पचास साठ वर्ष के लोगों को अमाशय या जोड़ों में दर्द की बीमारी लग सकती है और यह बीमारियां बढ़ सकती हैं।

    सर्दियों का मौसम ठंडा और तर होता है इसका स्वाभाव बलग़मी है। बलग़मी स्वाभाव के लोगों को इस मौसम में बहुत अधिक परेशानियां हो सकती हैं विशेषकर यदि वह वृद्ध भी हों। इस मौसम में बलग़मी स्वाभाव के लोगों में सर्दी और तरी बढ़ जाती है और जिस से उनके शरीर का संतुलन बिगड़ जाता है। सर्दियों में वृद्ध लोगों को गर्म और शुष्क आहार लेना चाहिए। उन्हें मुर्ग़ी, झींगे, ऊंट का मांस, विभिन्न प्रकार के मसाले वाले खाने, फलों में अंगूर, नारियल, केला, अंजीर, आख़रोट, सूर्यमुखी के बीज, केसर और शहद जैसी वस्तुओं का सेवन करना चाहिए।  इन वस्तुओं से वृद्ध लोगों को ऊर्जा और शक्ति मिलती है।