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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-16

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    ईरान की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए उसके सक्रिय रहने को आवश्यक समझती है। प्राचीन चिकित्सा की दृष्टि में मनुष्य के शरीर की गतिविधियों से चाहे वह प्रतिदिन के कामों के लिए गतिविधियां हो या फिर व्यायाम हो, मनुष्य के शरीर पर लाभदायक प्रभाव पड़ते हैं। अलबत्ता हर व्यक्ति के स्वभाव को देखते हुए इसके लिए व्यायाम का निर्धारण किया जाता है।

    डाक्टर ख़ादिम इस संबंध में कहते हैं कि मैं अपने श्रोताओ से यह कहना चाहता हूं कि गति और स्थिरता क्या होती है। यह वही चीज़ है जिसे हम शरीर की गतिविधियां या व्यायाम कहते हैं। आपनी वार्ता से पूर्व ईरान के महान और विश्व ख्याति प्राप्त हकीम अबू अली सीना का एक कथन आपकी सेवा में प्रस्तुत करना चाहता हूं कि आज आधुनिक चिकित्सा में व्यायाम पर जो इतना अधिक बल दिया जा रहा है, ईरान के प्राचीन हकीम ने एक हज़ार वर्ष पूर्व यह बात बयान कर दी थी और अपनी पुस्तक क़ानून में लिखा था कि मनुष्य के स्वास्थ और तन्दुरूस्ती के तीन आधार हैं प्रथम आहार, दूसरे नींद और तीसरे व्यायाम और इनमें से सबसे महत्त्वपूर्ण चीज़ व्यायाम है। इससे पता चलता है कि ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में वह समस्त चीज़ें बयान की गयीं थी जिनपर आज आधुनिक चिकित्सा भिन्न भिन्न प्रकार के परिक्षण और प्रयासों के बाद बल दे रही है। वास्तव में यह सारी बातें ईरान की प्राचीन चिकित्सा में बयान हो चुकी है जिससे पता चलता है कि ईरानी और इस्लामी चिकित्सक और हकीम मनुष्य के जीवन के समस्त आयामों पर पैनी दृष्टि रखते थे। मैंने आपको बताया था कि बिना आहार के जीवन असंभव है, वह जारी नहीं रह सकता और मनुष्य जो आहार का सेवन करता है उसमें से अतिरिक्त पदार्थ शरीर में बाक़ी रह जाते हैं, अब यह अतिरिक्त पदार्थ कहां जाते हैं, इसका एक भाग मूत्र के मार्ग से और दूसरा भाग पसीने के रूप में और कुछ मल के मार्ग से निकल जाता है किन्तु कुछ भाग तो शरीर में अवश्य ही बाक़ी रह जाता है। अब यदि मनुष्य अपने शरीर को सक्रिय न रखे और बिना हिले डुले कार्य करता रहे तो इससे बीमारियां पैदा होती हैं। संक्षेप में यह कि व्यायाम के बिना मनुष्य बीमार हो जाता है।

    वह लोग जो ठंडे स्वभाव के स्वामी हैं उनके लिए व्यायाम बहुत ही लाभदायक होता है उनके शरीर में व्यायाम से संतुलन बना रहता है किन्तु यदि अधिक काम काज या व्यायाम किया जाए तो शरीर में अधिक गर्मी पैदा होती है और तरलता कम हो जाती है। इसके विपरीत यदि व्यायाम न किया जाए और काम भी कम किया जाए तो शरीर में तरी और सर्दी उत्पन्न हो जाती है और बलग़मी बीमारियां पैदा हो जाती हैं विशेषकर मनुष्य के जोड़ों में दर्द और पीड़ा होने लगती है।

    डाक्टर ख़ादिम इस बारे में कहते हैं कि शायद लोगों के मन में यह प्रश्न उठे कि व्यायाम की संतुलित सीमा क्या है किस सीमा तक मनुष्य को संतुलन बनाए रखने के लिए व्यायाम करना चाहिए । प्राचीन चिकित्सा में संतुलित व्यायाम वह होता है जिससे मनुष्य को पसीना आ जाए और उसका रंग लाल हो जाए और सांस फूलने लगे। यदि सांस बहुत तेज़ी से चलने लगे और रंग लाल से पीला होने लगे और सीमा से अधिक पसीना आने लगे तो इस सीमा तक व्यायाम हानिकारक है। प्राचीन चिकित्सा में इस प्रकार के व्यायाम से मना किया गया है और इस बात पर बल दिया गया है कि व्यायाम को संतुलित होना चाहिए क्योंकि प्रत्येक दशा में मनुष्य के स्वास्थ और तंदुरूस्ती के लिए व्यायाम बहुत ही लाभदायक है और मनुष्य को प्रतिदिन व्यायाम करके अपने को स्वस्थ बनाए रखना चाहिए।

    युवा लोगों के लिए या वह लोग जो गर्म स्वभाव के हैं अधिक व्यायाम या काम करना हानिकारक सिद्ध हो सकता है इससे उनके सिर में दर्द हो सकता है और वह वज़्न और भूख की कमी का शिकार हो सकते हैं इसी प्रकार उनके शरीर में अधिक गर्मी पैदा हो सकती है। ऐसे लोगों को ठंडे स्थान पर विश्राम करना चाहिए। ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा के विशेषज्ञों का कहना है कि विश्राम करने से शरीर में तरलता लौट आती है और शरीर की गर्मी संतुलित हो जाती है। इस प्रकार मनुष्य में पुनः इतनी ऊर्जा और शक्ति लौट आती है कि वह अपने काम को अंजाम दे सके।

    डाक्टर ख़ादिम इस बारे में कहते हैं कि प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा के हकीमों ने व्यायाम को दो भागों में विभाजित किया है। एक सामान्य व्यायाम और दूसरा विशेष प्रकार का व्यायाम। सामान्य व्यायाम वह हैं जिनसे सारे शरीर के अंग प्रभावित होते हैं सामान्य व्यायाम का एक बेहतरीन उदारण दौड़ना है। इसमें पैदल चलना और आहिस्ता दौड़ना भी शामिल है। इस व्यायाम में शरीर के सारे अंग काम करते हैं। विशेष प्रकार के व्यायाम में शरीर के विशेष अंग प्रभावित होते हैं जैसे मुगदर चलाना या भारोत्तोलन, इसमें हाथों का काम अधिक होता है। हमारी कुछ प्राचीन पुस्तकों में अच्छी ध्वनि या संगीत को भी व्यायाम बताया गया है क्योंकि इससे गले और कंठ का व्यायाम होता है। अब प्रश्न यह उठता है कि व्यायाम किस समय किया जाना चाहिए? समय का ध्यान इस लिए रखा जाता है क्योंकि इससे सीधे हमारे शरीर के स्वास्थ पर प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि खाना खाने के दो घंटे के बाद व्यायाम किया जा सकता है क्योंकि इस प्रकार पाचन क्रिया का आरंभिक चरण अंजाम पा चुका होता है और आहार अमाशय से निकल चुका होता है। समय का ध्यान रखने से व्यायाम करने वालों को किसी प्रकार की कोई हानि होने की संभवना नहीं होती। खाने के तुरंत बाद व्यायाम करना बहुत ही हानिकारक है और इससे मना किया गया है। भूख की स्थिति में विशेषकर जब बहुत अधिक  भूख लगी हो तब भी व्यायाम नहीं करना चाहिए इससे भी हानि हो सकती है। विशेष स्वभाव के लोगों के लिए विशेष व्यायाम का सुझाव दिया गया है उदाहरण स्वरूप गर्म और शुष्क स्वभाव के लोगों के लिए कहा गया है कि उन्हें कड़े और थका देने वाले व्यायाम से बचना चाहिए क्योंकि उन लोगों के शरीर में तरलता की कमी होती है और यदि भारी व्यायाम और काम करें तो उनके शरीर में पाये जाने वाले तरल पदार्थ कम हो सकते हैं जिससे उन्हें हानि हो सकती है। उनके शरीर के तरल पदार्थ को संतुलित सीमा तक लाने के लिए पानी का प्रयोग बहुत ही आवश्यक है।