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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-21

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    नवजात शिशु अत्यंत कोमल एवं कमज़ोर होता है और उसे अत्यधिक देख-भाल की आवश्यकता होती है। ईरान के पारंपरिक चिकित्सकों के अनुसार नवजात शिशु की देख-भाल का समय तभी से आरंभ हो जाता है जब माता-पिता उसे संसार में लाने का निर्णय करते हैं। माता पिता का स्वास्थ्य, बच्चे की स्वास्थ्य की भूमिका होता है।

    गर्भवती महिला के लिए जो समस्याएं उत्पन्न होती हैं उनमें से एक भूख न लगना है। इस समस्या को दूर करने के लिए सामान्य व संतुलित ढंग से पैदल चलना बड़ा लाभदायक होता है। मीठे व्यंजन और मिठाई तथा चिकने भोजन कम खाने से भूख में वृद्धि होती है। इसी प्रकार मुस्तक व गोंद खाने और अनार व ज़िरिश्क या दारू हल्दी का शर्बत पीने से भी भूख बढ़ती है। गर्भावस्था में अधिकांश महिलाओं के लिए एक अन्य समस्या यह उत्पन्न हो जाती है कि बहुत से ऐसे पदार्थ उनके शरीर में एकत्रित हो जाते हैं जो पहले नियमित रूप से बाहर निकल जाया करते थे किंतु गर्भावस्था में वे एकत्रित हो जाते हैं जिसके कारण मतली और उलटी की स्थिति पैदा हो जाती है। यदि मतली और उलटी बहुत अधिक न हो और उससे माता के गर्भाशय एवं भ्रूण को तेज़ झटके न लगते हों तो फिर उसे न रोकना ही बेहतर है किंतु यदि उलटी के कारण तेज़ झटके लगें और भ्रूण के लिए ख़तरा उत्पन्न होने की आशंका हो तो फिर इस स्थिति को रोकने के लिए कई समाधान मौजूद हैं। इनमें सबसे पहला पैदल चलना है। पैदल चलना जिस प्रकार भूख बढ़ाने में सहायक होता है, उसी प्रकार मतली और उलटी को रोकने में भी सहायता करता है। एक अन्य समाधान यह है कि गर्भवती महिला के हाथों और पैरों की दिन में कई बार धीरे धीरे मालिश की जाए।

    गर्भावस्था में महिलाओं को एक अन्य समस्या यह आती है कि उनके पेट, पीठ, कमर तथा पहलुओं में दर्द रहने लगता है। इसके लिए अवश्य ही किसी विशेषज्ञ चिकित्सक के पास जाना चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि इसका कोई विशेष कारण तो नहीं है। प्रायः इस दर्द का कारण गर्भाशय का बढ़ना और इसके परिणाम स्वरूप गर्भाशय से जुड़े पट्ठों का खिंचना है अतः इसके उपचार की आवश्यकता नहीं होती और इसकी मालिश भी नहीं करनी चाहिए। संभव है कि दर्द के अतिरिक्त पेट, कमर, पीठ यहां तक कि हाथ, बांह और गर्दन में खिंचाव का भी आभास हो, इस स्थिति में गर्भवती महिला को बड़ा हल्का और जल्दी पच जाने वाला खाना खाना चाहिए। इसी प्रकार गुलाब के तेल से मालिश करने से खिंचाव कम या समाप्त हो जाता है। यदि गर्भवती महिला के पैरों में हल्की सूजन हो तो उसके उपचार की आवश्यकता नहीं है किंतु यदि सूजन अधिक हो और उससे पीड़ा का आभास हो तो फिर सिरके और नमक के पानी से पैरों की मालिश करनी चाहिए। गुलाब के तेल और सिरके से पैरों की मालिश करने से भी पैरों की सूजन को कम करने में सहायता मिलती है।

    गर्भवती महिला को गर्भधारण के दौरान यदि ख़ून दिखाई दे तो उसे अवश्य ही आराम करना चाहिए और खड़े मसूर, अनार के फूल और छिलके का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार से कि इन वस्तुओं को एक साथ उबाल कर उबले हुए पानी में बैठना चाहिए। इसी प्रकार से चना, लोबिया, बीन्ज़, तिल, मूली, मिर्च, सरसों और कच्चे ज़ैतून जैसी खाद्य सामग्रियों को प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि ये ऐसे पदार्थ हैं जो गर्भाशय से ख़ून निकलने या भ्रूण के गिरने का कारण बन सकते हैं। अतः गर्भ धारण की पूरी अवधि में इस प्रकार की खाद्य सामग्रियों से दूर रहना चाहिए विशेष कर उन महिलाओं को जिनके गर्भाशय से ख़ून निकलता हो।

    शिशु को दूध पिलाने की अवधि में माताओं के लिए जो वस्तुएं अधिक खाने की सिफ़ारिश की गई है उनमें गेहूं, चावल, भुट्टा, बकरे का ताज़ा मांस, ताज़ा मछली, बादाम, हेज़लनट, सलाद पत्ता तथा पालक शामिल हैं। इसी प्रकार जिन खाद्य सामग्रियों से दूध पिलाने वाली माताओं को दूर रहना चाहिए उनमें मांस तथा फ़्रीज़र में रखी हुई सामग्रियां, खड़ा मसूर, प्याज़, कुछ विशेष प्रकार के साग, अधिक नमकीन, अधिक खट्टे एवं अधिक तीखे खाने और इसी प्रकार अधिक गर्म एवं अधिक ठंडा प्रभाव रखने वाले भोजन शामिल हैं।

    ईरान की प्राचीन चिकित्सा पुस्तकों में वर्णित है कि शिशु के लिए सर्वोत्तम दूध, माता का दूध है और बच्चे को अवश्य ही दोनों स्तनों से दूध पिलाया जाना चाहिए। जो माता बच्चे को दूध पिलाना चाहती है उसे शारीरिक दृष्टि से संतुलित होना चाहिए। वह जो दूध अपने शिशु को पिलाना चाहती है उसे भी न तो बहुत गाढ़ा और न ही बहुत पतला बल्कि संतुलित होना चाहिए। इसी प्रकार दूध की मात्रा भी संतुलित होनी चाहिए अर्थात न तो दूध कम होना चाहिए और न अधिक क्योंकि इससे यह पता चलता है कि स्थिति पूर्णतः स्वाभाविक नहीं है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि किसी महिला को अधिक दूध होता है तो इसका अर्थ यह है कि उसके दूध में पानी की मात्रा अधिक है और से ठीक किया जाना चाहिए। एक अन्य बात यह है कि दूध का रंग सफ़ेद होना चाहिए, उसका स्वाद मीठा होना चाहिए तथा उसमें दुर्गंध नहीं होनी चाहिए। जो महिला अपने बच्चे को दूध पिलाना चाहती है उसमें मानसिक शांति होना आवश्यक है और पैदल चलने जैसा हल्का फुल्का व्यायाम, सही ढंग से दूध पिलाने में सहायक हो सकता है।

    ईरान की पारंपरिक चिकित्सा की किताबों में कहा गया है कि दूध पिलाने की अवधि कम से कम एक वर्ष और नौ महीने और अधिक से अधिक दो वर्ष होनी चाहिए। दो वर्ष से अधिक दूध पिलाने से बच्चा मंद बुद्धि हो सकता है। दूध छुड़ान की प्रक्रिया अचानक नहीं अपितु क्रमबद्ध ढंग से होनी चाहिए। दूध छुड़ाने के लिए सबसे अच्छा मौसम, शीत ऋतु के अंत, वसंतु ऋतु के आरंभ और ग्रीष्म ऋतु के अंत का होता है अर्थात जब मौसम में ठंडक और गर्मी संतुलित होती है। एक अन्य बात यह है कि बच्चे का दूध उस समय छुड़ाया जाए जब उसके दांत न निकल रहे हों बल्कि दांत निकलने के बीच की जो अवधि होती है, उसमें दूध छुड़ाया जाना चाहिए।

    ईरान की पारंपरिक चिकित्स के अनुसार दो प्रकार के लोगों को चिकित्सक के पास जाना चाहिए। प्रथम वे स्वस्थ लोग, जिन्हें अपने स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक सुझावों की आवश्यकता होती है और दूसरे वे रोगी जिन्हें रोग की पहचान, उपचार और पूर्ण स्वास्थ्य की आवश्यकता होती है। इस चिकित्सा शैली में आरंभ में चिकित्सक को, व्यक्ति के बारे में सामान्य प्रश्न पूछने चाहिए, उसकी चेकअप करना चाहिए और उसके स्वभाव को पता लगाना चाहिए। इसके बाद चिकित्सक, व्यक्ति के जीवन स्थान व पर्यावरण, उसकी आयु तथा अन्य आवश्यक बातों के दृष्टिगत उसे स्वास्थ्य की रक्षा या रोग के उपचार के लिए आवश्यक सुझाव देता है।