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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-8

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    आग प्रकृति में गर्मी की प्रतीक है। आग हल्की और गर्म है। इसकी छिपी हुई विशेषता शुष्क है और यह उस शरीर का चिन्ह है जिसकी प्रवृत्ति बहुत ही गर्म हो। इसी विशेषता के आधार पर प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा के हकीमों ने इस तत्व का नाम तात्विक आग रखा है। जिन लोगों के शरीर में तात्विक आग की मात्रा अधिक होती है वह सफ़रावी स्वभाव के होते हैं।

    इस संबंध में डाक्टर नासिरी कहते हैं कि मनुष्य के शरीर में तात्विक आग की मात्रा तात्विक वायु और तात्विक जल से कम होती है किन्तु मनुष्य के शरीर में तात्विक आग का होना बहुत आवश्यक है। मनुष्य गतिविधियों और सक्रियता के कारण जीवित है, सामाजिक जीवन जो गतिविधियों से भरा हुआ होता है मनुष्य के जीवित होने का चिन्ह है। तात्विक आग की विशेषता अधिक से अधिक तरल और सक्रिय होना है। जिस समाज के लोगों में तात्विक आग कम होती है वह काम काज और गतविधियां अंजाम देने से कतराते हैं और वे एक दूसरे से अधिक मिलना जुलना भी पसंद नहीं करते। क्या ऐसा समाज विकास और प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है? किसी समाज के लोगों में तात्विक अग्नि की मात्रा उनके उत्साह, उनकी उत्सुकता और उनकी गतिविधियों को प्रकट करती है। जिन लोगों के शरीर में तात्विक आग की मात्रा अधिक होती है, उनका बदन गठा हुआ होता है, इसका एक कारण उनके शरीर में तरल पदार्थों की कमी का होना भी है। वे अधिक चलफर होते हैं और कुछ न कुछ करने के प्रयास में लगे रहते हैं। उनके बात करने का ढंग कैसा होता है? यह लोग तेज़ तेज़ बात करते हैं, तेज़ तेज़ चलते हैं और समझदार होते हैं। अब यहां पर एक प्रश्न उठता है कि क्या वह सोते भी अधिक हैं? जिन लोगों के शरीर में तात्विक जल अधिक होता है उनकी तुलना में इनकी नींद कम होती है। अग्नि का रूझहान ऊंचाई की ओर होता है। तात्विक आग वाले लोग तीन से पांच घंटे सोने के बाद ठीक ठाक रहते हैं, प्रफुल्लता का आभास करते हैं किन्तु जिन लोगों के शरीर में तात्विक पानी अधिक होता है उनके लिए आठ घंटे की नींद की पर्याप्त नहीं होती उसके बाद भी वह बोझल रहते हैं और उनकी स्मरण शक्ति असमान्य होती है।

    इन लोगों के चेहरे और आंख का रंग हल्का पीला होता है। त्वचा गर्म और शुष्क और मुर्दा होती है। मुंह और नाक शुष्क होती है। ज़बान कड़ी और शुष्क और कभी कड़वी होती है। इन लोगों को प्यास बहुत लगती है और भूख कम लगती है।

    डाक्टर नासीरी इस बारे में कहते हैं कि यदि किसी में तात्विक आग सीमा से अधिक बढ़ जाए तो ऐसे लोग वैचारिक चिंता का शिकार हो जाते हैं और अनिंद्रा में ग्रस्त हो जाते हैं और उनके विचार बिखर जाते हैं किन्तु तात्विक आग का मनुष्य की समझ बूझ में बहुत सीमा तक हस्तक्षेप होता है और इसी समझबूझ के कारण मनुष्य अपने सामाजिक जीवन को संवारता है। मानवीय अस्तित्व के लिए तात्विक आग बहुत आवश्यक है और जिसमें यह तत्व नहीं पाया जाता मानो उसका अस्तित्व ही नहीं है। मनुष्य के लिए आवश्यक है कि उसके अस्तित्व में तात्विक आग पायी जाए। एक खाद्य पदार्थ जिसमें तात्विक आग अधिक होती है, मधु है। इस आधार पर इसका प्रयोग कम किया जाना चाहिए। इसी प्रकार मिर्च भी है। विभिन्न देशों में मसालों के साथ मिर्च प्रयोग की जाती है इन में तात्विक आग की मात्रा अधिक पायी जाती है।

    अग्नि स्वभाव के लोगों के लिए सर्दियों का मौसम बहुत अच्छा होता है, गर्मियों में स्वभाव की दृष्टि से उन्हें समस्याओं का सामना होता है। गर्मियों में इन लोगों को ठंडा और तरल आहार जैसे दही और मठ्ठा इत्यादि का सेवन करना चाहिए जबकि मधु और मसालेदार खानों से बचना चाहिए। युवा वर्ग के लोग सामान्य रूप से अग्नि स्वभाव के होते हैं।

    डाक्टर नासीरी इस बारे में कहते हैं कि जिन लोगों में तात्विक आग अधिक होती है उन्हें ऐसे खाद्य पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए जो गर्म होते हैं जैसे मधु और मिर्च मसाला। अलबत्ता कुछ मसालों को कम मात्रा में प्रयोग करने से ऐसे लोगों के स्वभाव में संतुलन आ जाता है जिसके परिणाम में वह अपने काम काज बेहतरीन ढंग से अंजाम दे सकते हैं और समाज के लिए लाभदायक हो सकते हैं।

    किसी से प्राप्त स्वभाव के बारे में यह कहा जाता है कि मनुष्य की आयु उसके स्वभाव पर प्रभावित होती है अर्थात मनुष्य का स्वभाव आयु के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा विद्वानों और हकीमों ने आयु के अनुसार स्वभाव को विभाजित किया है। पहले चरण को विकास व प्रगति और पलने व बढ़ने का नाम दिया गया है जो जन्म से तीस वर्ष तक होता है। इस चरण में मनुष्य में तरलता और गर्मी अधिक होती है और स्वभाव दमवी होता है। दूसरा चरण युवाकाल का है जो तीस से चालीस वर्ष तक होता है, इस चरण में मनुष्य के शरीर में गर्मी और सूखापन अधिक होता है और स्वभाव का रूझहान सफ़रावी होता है। इस चरण में सर्दी और सूखेपन का राज होता है और स्वभाव का रूझहान सौदावी होता है। अंतिम चरण को बुढ़ापा या वृद्धचरण कहा जाता है जो साठ से आरंभ होता है इस चरण में शरीर सर्द और तरल होता है और स्वभाव का रूझहान बलग़मी होता है।

    आज हम आपको अलमुफ़ीदुल ख़ास फ़ी इल्मिल ख़वास नामक पुस्तक के बारे में बता रहे हैं। यह पुस्तक ईरान के प्रसिद्ध चिकित्सक मुहम्मद बिन ज़करिया राज़ी ने लिखी है। ज़करिया राज़ी चौथी शताब्दी हिजरी में रहा करते थे। उन्होंने इस पुस्तक में चिकित्सा, कृषि, घोड़ों की देखभाल और शिकारी पक्षियों, जड़ी बूटियों की विशेषता, विषैली वस्तुओं और कीड़े मकोड़ों तथा सांप बिच्छु के विष के उपचार के बारे में बहुत ही लाभदायक बातें लिखी हैं। इस पुस्तक में बहुत ही सरल भाषा में चिकित्सा की बातें बयान की गयी हैं और जहां आवश्यकता पड़ी है वहां डायाग्राम अर्थात चित्र भी बनाए गए हैं।