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    पारंपरिक चिकित्सा शैली-9 (2)

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    खाना पीना केवल भूख और प्यास की आवश्यकता को दूर करना ही नहीं बल्कि मानवीय प्रवृत्ति के दृष्टिगत मनुष्य का मानसिक व आनंदमयी आयाम है। मनुष्य की इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए खाना पकाना और स्वादिष्ट पकवान तैयार करना एक कला में परिवर्तित हो गया है। ईरान का प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा भी इस बात से निश्चेत नहीं है और खानों व आहारों की गुणवत्ता पर विशेष रूप से ध्यान देता है।

    डाक्टर रेज़ाई ज़ादे कहते हैं कि हमारे हकीमों ने स्वास्थ की रक्षा और तन्दुरूस्ती बनाए रखने के छह सिद्धांत बनाए हैं, इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांत खाने पीने के बारे में है। इस बात का कारण क्या है कि खाने पीने से संबंधित सिद्धांत को सबसे अधिक महत्त्व दिया गया है? कारण यह है कि यह सिद्धांत मनुष्य के अधिकार व बस में है अब चाहे वह डाक्टर हो या बीमार अथवा स्वस्थ व्यक्ति। अर्थात प्रत्येक मनुष्य अपने आहार को सही ढंग से व्यवस्थित करके इनकी मात्रा और गुणवत्ता को सही प्रकार से परख कर अपने स्वास्थ की रक्षा कर सकता है, अपनी बीमारियों का उपचार कर सकता है या स्वयं को बीमारियों से सुरक्षित रख सकता है। खाने पीने की वस्तुएं मनुष्य के शरीर पर प्रभाव डालती हैं जिनसे मनुष्य के शरीर की दशा परिवर्तित हो जाती है। इसीलिए इन छह सिद्धांतों को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया गया है ताकि मनुष्य इनसे मार्गदर्शन प्राप्त करे। हकीमों और विद्वानों का मानना है कि खाने पीने की वस्तुओं में पानी के अतिरिक्त जिसकी विशेषताएं ही अलग हैं और वह वस्तु जो हम प्रतिदिन खाते पीते हैं हमारे शरीर की दशा व स्थिति को प्रभावित करती है। प्रभावी होती है। हकीमों और विद्वानों ने ऐसी समस्त वस्तुओं की सूची तैयार की है और उनको छह गुटों में विभाजित किया है कि कौन सी वस्तु का क्या प्रभाव होता है। हकीमों ने बताया है कि खाने पीने की वस्तुएं या तो पूर्णरूप से आहार हैं या औषधीय आहार हैं, या एसी औषधि है जो आहार भी है या पूर्णरूप से दवाएं हैं या विषैली दवाएं हैं या पूर्णरूप से विष हैं।

    यह बात बताना आवश्यक है कि मनुष्य को अपने स्वभाव, आयु, मौसम और क्षेत्र की जलवायु के दृष्टिगत ही दवा के रूप में दिए जाने वाले आहारों और आहारों के रूप में दी जाने वाली दवाओं को प्रयोग करना चाहिए, इस प्रकार मनुष्य के शरीर में संतुलन बना रहता है।

    डाक्टर रेज़ाई इस संबंध में कहते हैं कि कुछ पदार्थ जो बहुत कम हैं जब आप उन्हें प्रयोगक करें तो आपके शरीर पर केवल और केवल आहार का प्रभाव डालते हैं और खाने के पदार्थ होने के साथ साथ आपके शरीर की गुणवत्ता पर प्रभावित नहीं होते। यह दो चार चीज़ें हैं जैसे गेहूं की रोटी, भेड़ बकरी का मांस और छोटे पक्षियो का मांस मछली और ऐसे पेय जो मनुष्य के स्वभाव के अनुरूप होते हैं। डाक्टर रेज़ाई कहते हैं कि इनमें कुछ मिठाइयां भी सम्मलित हैं जैसे बादाम से बनाई जाने वाली मिठाई जिसे बादाम का चूर्ण कहा जाता है। हकीमों का कहना है कि केवल दो प्रकार के फल हैं जो केवल आहार की विशेषता से संपन्न हैं और यह अंगूर और अंजीर हैं। खजूर के बारे में भी हकीमों का कहना है कि यह पूर्ण आहार नहीं है बल्कि यह केवल उन लोगो के लिए पूर्ण रूप से आहार के आदेश में है जहां उसकी पैदावार अधिक होती है और अन्य स्थानों के लिए नहीं।

    दूसरे प्रकार के खाने औषधीय आहार हैं जो आहार होने के साथ साथ दवाओं की भी विशेषता के स्वामी होते हैं और मनुष्य के शरीर में परिवर्तन लाते हैं। मैंने जो उदाहरण पेश किए हैं उनसे आपको ज्ञात हो गया होगा कि हम लोग जो कुछ खाते हैं, चाहे नाश्ता हो, दोपहर या शाम का खाना हो, शाम का नाश्ता हो या खानों के मध्य कुछ फल या स्नेक्स हों, इन समस्त चीज़ों से हमारे शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारा शरीर उन वस्तुओं से बनता है जिसका हम सेवन करते हैं और दिनचर्या में खाने पीने वाली समस्त वस्तुओं का अपना विशेष प्रभाव होता है।

    ईरान की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली जीवन में स्वास्थ और बीमारी को छह सिद्धांतों के पालन करने या न करने का परिणाम मानती है। पहले सिद्धांत में हवा शामिल है जिससे हम सांस लेते हैं और दूसरा सिद्धांत शारीरिक गतिविधियां हैं, तीसरा सिद्धांत नींद और जागने का है, चौथा सिद्धांत खाने पीने का है और पांचवा सिद्धांत शरीर को अतिरिक्त और विषैले पदार्थों से सुरक्षित करने और आवश्यक पदार्थों को शरीर में बाक़ी रखने का है और छठा सिद्धांत मानसिक और आत्मिक स्थिति को नियंत्रित रखने का है।

    डाक्टर रेज़ाई कहते हैं कि तीसरा चरण औषधीय आहारों का है जिसे हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं किन्तु यह चीज़ें आहार होने से अधिक दवा होती हैं और चिकित्सकीय प्रभाव की स्वामी होती हैं, इनसे शरीर की गुणवत्ता में परिवर्तन आता है। इनमें विभिन्न प्रकार की सब्ज़ियां, विभिन्न प्रकार की चाय और अनेक प्रकार के फल शामिल हैं और समस्त चीज़े चिकित्सकीय प्रभाव की भी स्वामी हैं। आज आधुनिक चिकित्सा भी यही कहता है कि फलों और विभिन्न सब्ज़ियों में विटामिन, एंटी आक्सीडांन्टस होते हैं और उनके बारे में हम यह समझते हैं कि यह मनुष्य को फुर्तीला और स्वस्थ रखते हैं। इसका अर्थ यह है कि यह मनुष्य के शरीर पर दवा और औषधी की भांति प्रभाव डालते हैं। उदहारण स्वरूप हम कहते हैं कि दही से नींद आती है तो इसका अर्थ यह होता है कि दही में सरोटीनन होता है या जब हम कहते हैं कि ख़रबूज़े से एलर्जी हो सकती है तो इसका उद्देश्य यह है कि इसमें ऐसे पदार्थ पाये जाते हैं जिनका शरीर पर प्रभाव पड़ता है और वह एलर्जी का रूप धारण कर लेते हैं। आज खाने पीने की वस्तुओं के बारे में जो जानकारियां प्राप्त की गयी हैं, हमारे प्राचीन विद्वानों, चिकित्सकों और हकीमों ने उन्ही जानकारियों को चरणबद्ध किया था और उनको विस्तारपूर्वक बयान किया था और इस बात को समझाने का प्रयास किया था कि बहुत सी वस्तुएं जिन्हें हम प्रतिदिन प्रयोग करते हैं वह वास्तव में केवल आहार नहीं हैं बल्कि दवा का प्रभाव भी रखती हैं अर्थात हमारे स्वभाव और प्रकृति पर प्रभावित होती हैं और बहुत संभव है कि हमारे स्वभाव को परिवर्तित कर दें।

    इससे बढ़कर महत्त्वपूर्ण बिन्दु यह है कि आहार औषधी का बार बार सेवन करने और वह भी अधिक मात्रा में सेवन करने से मनुष्य के स्वभाव पर गहरा प्रभाव पड़ता है और संभव है कि मनुष्य का स्वभाव परिवर्तित हो जाए। यदि मनुष्य सोच समझकर इन वस्तुओं का प्रयोग करे तो वह विभिन्न बीमारियों से सुरक्षित रह सकता है और अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकता है किन्तु यदि उसे इन वस्तुओं की विशेषताओं का ज्ञान न हो तो उसे विभिन्न बीमारियां घेर सकती है या कुछ बीमारियां जटिल हो सकती हैं।

    चौथे प्रकार की वह वस्तुएं हैं जो दवाओं में शामिल हैं इनमें बहुत से मसाले भी शामिल हैं जो खानों में प्रयोग किए जाते हैं और खानों को स्वादिष्ट बनाते हैं। मैं यहां पर एक बात बताना चाहता हूं कि प्राचीन काल में ईरान में जो खाने पकाए जाते थे वह परिवार के स्वभाव को दृष्टि में रखकर पकाए जाते थे। विभिन्न प्रकार के पकवान पकाए जाते थे किन्तु सब में इस बात का ध्यान रखा जाता था कि इनके खाने से किसी को कोई बीमारी न हो बल्कि इससे लाभ ही हो और यह खाने परिवार के स्वभाव के अनुरूप हों।

    आइये अब हम ईरान की पारंपरिक प्राचीन चिकित्सा से संबंधित एक अन्य पुस्तक से आपका परिचय कराते हैं। आज हम आपको प्राचीन चिकित्सा की एक पुस्तक के बारे में बता रहे हैं जिसका नाम है गियाहाने दारूई व गियाहाने दरमानी। इस पुस्तक के लेखक डाक्टर मुहम्मद हुसैन सालेही सूरूमक़ी हैं। वह तेहरान विश्वविद्यालय में दवा निर्माण संकाय के एसिस्टैंट प्रोफ़ेसर हैं और उन्होंने इस पुस्तक में जड़ी बूटियों की विशेषताओं और उनके चिकित्सकीय प्रभाव को विस्तारपूर्वक बयान किया है। उन्होंने अपनी इस पुस्तक के पहले खंड में इस वास्तविकता को विस्तारपूर्वक बयान किया है कि संसार अब पुनः किसी कारणवश जड़ी बूटियों की उपचार शैली की ओर लौट कर आ रहा है। इस पुस्तक में आपको जड़ी बूटियों का पूर्ण विवरण मिल जाएगा। डाक्टर सूरूमक़ी ने बहुत ही विस्तार से जड़ी बूटियों से उपचार की शैली भी इस पुस्तक में बयान की है। दूसरे भाग में इन जड़ी बूटियों से बनायी जाने वाली दवाओं का उल्लेख भी किया गया है।