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    पारंपरिक चिकित्सा-5

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    ईरान के पारंपरिक प्राचीन चिकित्सा की थ्योरियों के अनुसार मनुष्य का शरीर चार मूल पदार्थों से बनता है और वह हैं तात्विक मिट्टी, तात्विक जल, तात्विक हवा और तात्विक आग। यह चार पदार्थ मनुष्य के शरीर में उचित मात्रा में मौजूद रहें तो उसका स्वभाव संतुलित रहता है और उसे कोई बीमारी नहीं होगी किन्तु यदि इन चार तत्वों में से कोई कम या अधिक हो तो शरीर में चार प्रकार के स्वभाव अस्तित्व में आते हैं और यह चार स्वभाव हैं बलग़मी स्वभाव, दमवी स्वभाव, सफ़रावी स्वभाव और सौदावी स्वभाव। सौदावी स्वभाव में सर्दी और शुष्क अधिक हो जाता है अर्थात तात्विक मिट्टी बढ़ जाती है। बलग़मी स्वभाव में आर्दर अधिक मात्रा में होती है अर्थात तात्विक जल की मात्रा अधिक होती है। दमवी स्वभाव में गर्मी और तरी अधिक होती है अर्थात तात्विक हवा अधिक हो जाती है और सफ़रावी स्वभाव में गर्मी और सूखापन अधिक होता है जिसके परिणाम में तात्विक आग की मात्रा अधिक हो जाती है।

    डाक्टर नासीरी का कहना है कि हमने इससे पूर्व संकेत किया था कि यह सृष्टि चार मूल तत्वों से अस्तित्व में आई है जिन्हें पदार्थों का पदार्थ भी कहते हैं। हर जीव के शरीर में यह पदार्थ पाये जाते हैं और उनकी मात्रा भी विभिन्न होती है। इनकी मात्रा में कमी या अधिक होने के आधार पर जीवों में अंतर पाया जाता है ये चार पदार्थ पानी, मिट्टी, हवा और आग हैं।

    नरेशनः तात्विक मिट्टी का रूझहान पूर्ण रूप से भारी और स्थिति ठंडी व शुष्क होती है। तात्विक जल का रूझहान आम तौर पर भारीपन की ओर होता है जबकि उसकी स्थिति ठंडी व तर होती है। तात्विक हवा आमतौर पर हल्की होती है और स्थिति गर्म व तर होती है जबकि तात्विक आग का रूझहान आम तौर पर हल्केपन की ओर होता है और गर्म व शुष्क होती है।

    प्राचीन हकीमों के अनुसार संसार की हर चीज़ इन चार पदार्थों से मिलकर बनी है और हर जीव के शरीर में यह चार चीज़ें पायी जाती हैं अब इन की मात्रा और इनकी प्रतिक्रिया शरीर में विशेष स्थिति पैदा करती हैं जिसे स्वभाव कहा जाता है।

    डाक्टर नासीरी कहते हैं कि तात्विक मिट्टी, मनुष्यों और जीवों के शरीर को सुदृढ़ करती है और उसे सुदृढ़ रखती है। यदि आप यहां थोड़ी से मिट्टी रख दें और कल आकर देखें तो यह मिट्टी आपको यहां मिल जाएगी, तात्विक मिट्टी इस मिट्टी से स्थिरता और सुदृढ़ता में मेल खाती है इसीलिए हमारे चिकित्सकों, बुद्धिजीवियों और विद्वानों ने एक तत्व का नाम मिट्टी रखा है क्योंकि उसकी विशेषताएं भी इस मिट्टी की तरह हैं और हकीमों ने ऐसी चीज़ों पर नाम रखा है कि उसकी विशेषताओं का मनुष्य आभास करे और अपनी आंख से देखे किन्तु वास्तविकता यह है कि तात्विक मिट्टी, मिट्टी नहीं है बल्कि उसका केवल नाम मिट्टी है व एक अलग वस्तु है। तात्विक मिट्टी शरीर में सुदृढ़ता को बाक़ी रखती है और शरीर को सुदृढ़ता और आकार प्रदान करती है।

    डाक्टर नासीरी कहते हैं कि यदि किसी मनुष्य के शरीर में तात्विक मिट्टी की मात्रा अधिक हो जाए तो क्या परिणाम निकलेगा? इस का परिणाम यह निकलेगा कि यह व्यक्ति अधिक सुदृढ़ होगा अर्थात उसका शरीर गठा हुआ होगा या वो गठीले शरीर का स्वामी होगा। यदि तात्विक मिट्टी अधिक हो जाए तो मनुष्य किस प्रकार बात चीत करेगा? ऐसा व्यक्ति बहुत धीरे धीरे और बहुत कम बातचीत करता है क्योंकि यह लोग अपने आप में रहते हैं और इनकी आदतें भी विशेष होती हैं। मैं एक बात आपको और बताऊं कि हमारे विद्वानों और हकीमों ने मनुष्य और सृष्टि में समानता की है और एक दूसरे को समन्वित किया है। उदाहरण स्वरूप हमारे विद्वानों का कहना है कि बैगन में दूसरी सब्ज़ियों की तुलना में तात्विक मिट्टी अधिक होती है इसीलिए इस सब्ज़ी को अधिक खाने वाले के शरीर में तात्विक मिट्टी बढ़ जाती है और इसके परिणाम स्वरूप उसका शरीर सुस्त पढ़ जाएगा। इस से त्वचा पर कैसे प्रभाव पड़ते हैं, इसकी त्वचा भी शुष्क हो जाती है। विद्वानों व बुद्धिजीवियों ने सृष्टि को इन ही चार तत्वों के अनुरूप बताया और इस प्रकार यदि मनुष्य अपना स्वभाव समझ ले तो वह दूसरे जीवों से भी समन्वित हो सकता है, उसे बहुत अच्छी तरह ज्ञात हो जाता है कि वह क्या खाये और क्या न खाए, किस चीज़ से बचे जो उसके स्वास्थ और सेहत के लिए लाभदायक हो सकता है।

    नरेशनः बसंत के मौसम में सौदावी स्वभाव के लोग संतुलित स्वास्थ के स्वामी होते हैं किन्तु पतझड़ में उन्हें परेशानियां होने लगती हैं। इन लोगों को पतझड़ के मौसम में गर्म और तर आहार लेना चाहिए जैसे आब गोश्त, हाफ़ ब्रस्ट अंडा, किशमिश व अंगूर का शीरा, इन आहारों से उन्हें लाभ पहुंचेगा।

    डाक्टर नासीरी कहते हैं कि एक बीमार जो तात्विक मिट्टी के अधिक होने से होती है, अवसाद है। यदि किसी बीमार के शरीर में तात्विक मिट्टी अधिक हो जाए तो उसे अवसाद हो सकता है। अवसाद अर्थात मनुष्य जोश व उत्साह से ख़ाली हो जाता है, उसे कोई चीज़ अच्छी नहीं लगती और मन ही मन में घुलता रहता है। कुछ लोगों के शरीर में प्राकृतिक रूप से तात्विक मिट्टी अधिक होती है जो बीमारी का कारण नहीं बनती, यह लोग स्वस्थ होते हैं और उनकी करनी कथनी और व्यवहार में सुदृढ़ता होती है। यदि यह लोग किसी दृष्टिकोण को अपना लें तो उस से नहीं हट सकते बल्कि ठोस तरीक़े से अपने दृष्टिकोण का बचाव करते हैं। यदि उनकी सोच ग़लत भी हो तो वह उस पर बल देते हैं, मानो आपने पत्थर पर एक लकीर खींच दी हो, वह मिट नहीं सकती। प्रत्येक दशा में तात्विक मिट्टी के स्वामी लोग ठोस दृष्टिकोण के मालिक होते हैं उनके स्वभाव में सुदृढ़ता पायी जाती है और यह उनकी शारीरिक विशेषताएं हैं जिन्हें आप देख सकते हैं।