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    पारंपरिक चिकित्सा -6

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    हमने बताया था कि हर पदार्थ चार मूल तत्वों से मिलकर बनते हैं। तात्विक मिट्टी, तात्विक जल, तात्विक हवा और तात्विक अग्नि। हमने हर तत्व की मनोदशा भी बयान की थी।

    डाक्टर नासीरी कहते हैं कि हमने बताया था कि तात्विक मिट्टी की ज़िम्मेदारी स्थिर रखना है और सृष्टि की सारी चीज़ों को स्थिरता और सुदृढ़ता की आवश्यकता है। तात्विक जल की ज़िम्मेदारी रूप व आकार धारण करना और पदार्थों में लचक पैदा करना है। इसका उदाहरण इस प्रकार दिया जाता है कि आप जिस बर्तन में भी पानी डालें पानी उस बर्तन का रूप धारण कर लेता है। पानी को यदि गिलास में डालें तो वह गिलास का रूप धारण कर लेगा और यदि थाली में डालें तो वह थाली का रूप धारण कर लेगा। थोड़ा सा पानी यदि गिलास में रखें और दूसरे दिन आकर देखें तो पानी की मात्रा कम हो चुकी होगी और यदि एक सप्ताह बाद आकर देखें तो पानी समाप्त हो चुका होगा या कुछ बूंद ही बचा होगा। तात्विक मिट्टी इसके बिल्कुल विपरीत है। सृष्टि की हर चीज़ में तात्विक जल की क्या आवश्यकता है? इसका कारण यह है कि हर वस्तु को एक विशेष रूप धारण करने की आवश्यकता है और हर शरीर को परस्पर संबंध की आवश्यकता है विशेषकर मनुष्य के शरीर को। मनुष्य के शरीर को जिस ढंग से ढाला जाए ढल सकता है अलबत्ता अपनी सीमा में। शरीर वास्तव में रूप धारण करता है आप यदि एक मुठ्ठी मिट्टी लें और उसमें थोड़ा सा पानी मिला लें तो वह गीली मिट्टी में परिवर्तित हो जाएगी और अब आप उसे जो चाहें रूप दे सकते हैं। अब यदि मनुष्य के शरीर में पानी की मात्रा अधिक हो जाए तो जो उदाहरण हमने गीली मिट्टी का दिया है उसी प्रकार हो जाएगा अर्थात गीली मिट्टी पतली हो जाएगी और रूप धारण करने की अपनी योग्यता खो बैठेगी।

    मिट्टी, ठोसपन और सूखेपन का प्रतीक है। मिट्टी ठंडी और भारी होती है, उसकी विशेषता सुदृढ़ता और आकार प्रदान करना और रूप व आकार को बाक़ी रखना है। जिन लोगों में तात्विक मिट्टी अधिक होती है वह सौदावी स्वभाव के होते हैं और जिन में तात्विक पानी अधिक होता है वह बलग़मी स्वभाव के होते हैं।

    डाक्टर नासीरी का कहना है कि सृष्टि की कुछ चीज़ों में तात्विक पानी अधिक होता है तो ये चीज़े विभिन्न रूप धारण कर सकती हैं। कुछ लोगों के शरीर में भी तात्विक पानी की मात्रा सामान्य से बहुत अधिक होती है ऐसे लोग सामान्य रूप से अपने रवैये में लचकदार होते हैं। उदाहरण स्वरूप यदि किसी छात्र के शरीर में तात्विक पानी सामान्य से अधिक हो तो वह सब की बातें सुन लेता है कोई उसके काम पर सलाह दे तो उसे स्वीकार कर लेता है और यदि उसी समय कोई और सलाह दी जाए जो पहले वाली सलाह से बिल्कुल विपरीत हो तो उसे भी रद्द नहीं करता ऐसे लोगों के लिए विभिन्न दृष्टिकोण स्वीकार्य होते हैं, ऐसे लोग कभी कभी विरोधाभासी चीज़ों को भी एकत्रित करने का प्रयास करते हैं,  तात्विक मिट्टी वाले लोग इनके विपरीत होते हैं, वह एक दृष्टिकोण पर डटे रहते हैं और यदि एक दृष्टिकोण स्वीकार कर लेते हैं तो उसी को मानते हैं किन्तु जिन में तात्विक जल अधिक होता है वह सीमा से अधिक लचकदार होते हैं।

    डाक्टर नासीरी का कहना है कि पानी समतल सतह पर फैलता है, यदि आप पानी को किसी सतह पर डालें तो वह फैल जाएगा और अर्थात क्षैतिज रूप में फैल जाएगा। आम तौर से जिन लोगों के शरीर में तात्विक जल की मात्रा अधिक होती है वह सोने के रिसिया होते हैं, उन्हें सोना अच्छा लगता है। अर्थात वह भी समतल रहना चाहते हैं। आम तौर पर इन लोगों की नींद अधिक होती है। अब देखते हैं कि इन लोगों की स्मरण शक्ति कैसी कैसी होती है। हमने इस बात की ओर संकेत किया कि यदि आप कोई चीज़ पानी पर लिखें या मिट्टी पर लिखें तो कैसी प्रतिक्रिया देखते हैं। इन लोगों की स्मरणशक्ति आम तौर पर पहले वाले गुट से कम होती है किन्तु यह शरीर और आकार की दृष्टि से बड़े और भारी भरकम होते हैं। हमारे बुद्धजीवियों का कहना है कि विकास और बढ़ने के लिए जो वस्तुएं आवश्यक हैं वह पानी और मिट्टी दोनों हैं। पौधे को बढ़ने के लिए मिट्टी की भी आवश्यकता होती हैं और सूर्य का प्रकाश अर्थात गर्मी की आवश्यकता होती है। यदि गर्मी अधिक हो और पानी कम हो तो पौधा पीला पड़ जाएगा और मुरझा जाएगा। यदि पानी अधिक हो और गर्मी कम हो तो पौधा सड़ गल जाएगा। इस आधार पर पौधे के बढ़ने के लिए पानी भी उचित मात्रा में आवश्यक है। आम तौर पर वह लोग जिन के शरीर में तात्विक पानी अधिक होता है वह इन लोगों की तुलना बड़े शरीर के स्वामी होते हैं जिन के शरीर में तात्विक मिट्टी अधिक होती है। दूसरे शब्दों में उनका शरीर बड़ा होता है और वे भारी भरकम शरीर के स्वामी होते हैं।

    यह बात ध्यान योग्य हैं कि पानी व हवा और मौसमी व भौगोलिक स्थिति मनुष्य के स्वभाव पर विभिन्न प्रभाव रखती है। उदाहरण स्वरूप ठंडे और बलग़मी स्वभाव के लोगों पर ठंडा, शुष्क और मरूस्थलीय मौसम, गर्म और गीली जलवायु से विभिन्न प्रभाव रखता है। इसी आधार पर हम यह कह सकते हैं कि ऐसे लोग यदि अपना स्थान बदल दें तो उन के ऊपर मौसम का कुछ और ही प्रभाव पड़ेगा।

    आज हम आपको मतलऊत्तिब्बे नासीरी नामक पुस्तक के बारे में बता रहे हैं। यह पुस्तक मिर्ज़ा अबुल हसन ख़ान ने लिखी है। उनका पूरा नाम मिर्ज़ा अबुल हसन ख़ान इब्ने अब्दुल वह्हाब तफ़रशी है। वह मिर्ज़ा अबुल हसन ख़ान डाक्टर के नाम से प्रसिद्ध थे। यह पुस्तक नासीरी काल के चिकित्सकों और डाक्टरों की पुस्तक का एक नमूना है जिन्होंने आधुनिक चिकित्सा के आधार पर पुस्तकें लिखी हैं। यह किताब ईरान में चिकित्सा विज्ञान के इतिहास और प्रगति की समीक्षा करने और कुछ शब्दावलियों की पहचान बताने के साथ ही यह भी बताती है कि किस प्रकार आधुनिक चिकित्सा ने प्राचीन चिकित्सा का स्थान लिया, यह जानने के लिए बहुत लाभदायक है। यह पुस्तक चिकित्सा के इतिहास से रूचि खने वाले शोधकर्ताओं के लिए भी बहुत लाभदायक है। यह पुस्तक 1299 हिजरी क़मरी में लिखी गई थी और इस की आफ़सेट कापी ईरान की संसद मजलिसे शूराए इस्लामी के पुस्तकालय में मौजूद है।