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    पारंपरिक चिकित्सा – 7

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    जल की विशेषता व प्रवृत्ति तरल, बहने वाला, सक्रिय और द्रव होना है, पानी ठंडा और भारी है। जल की छिपी हुई विशेषता तरलता है इसी आधार पर ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा में से इस तत्व को तरल और ठंडा कहा गया है अर्थात तात्विक जल की गुणवत्ता व विशेषता ठंडी और तरल है। इसकी विशेषता और दायित्व शरीर में रूप ग्रहण करना और उसको लचकदार बनाना है। वह इस प्रकार से कि जिस शरीर में जितना तात्विक जल पाया जाएगा उसमें बहने की विशेषता अधिक होगी। जिन लोगों में तात्विक जल की मात्रा अधिक होती है उन्हें बलग़मी स्वभाव वाला कहा जाता है।

    इस संबंध में डाक्टर नासिरी कहते हैं कि इससे पूर्व हमने तात्विक जल की विशेषता विस्तारपूर्वक बयान की थी कि तात्विक जल शरीर को रूप धारण करने और लचक के योग्य बनाता है और यह मानवीय शरीर के लिए भी आवश्यक है। हमने कहा था कि मनुष्य के शरीर को जिस रूप में भी ढाला जाए वह उसे स्वीकार कर लेता है, दूसरों की बातें मान लेता है। मान लीजिए कि आपके सामने एक व्यक्ति बैठा है जो किसी से कुछ सीखने को तैयार नहीं है, आप ऐसे व्यक्ति से बात करके उसे समझा बुझाकर बड़ी सरलता से उससे अपनी बातें मनवा सकते हैं क्योंकि हर मनुष्य के शरीर में तात्विक मिट्टी से अधिक तात्विक जल पाया जाता है, इसका एक कारण यह है कि मनुष्य विभिन्न परिस्थितियों का सामना करता रहता है और उसे अपना व्यवहार परिवर्तित करना पड़ता है, उसे विभिन्न परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है किन्तु कुछ लोगों के शरीर में तात्विक जल की मात्रा बहुत अधिक होती है, ऐसे लोगों की विशेषता का उल्लेख हमने पहले ही कर दिया है। हमारे विद्वानों और हकीमों के अनुसार, कुछ आहार में तात्विक जल सामान्य से बहुत अधिक होता है, अब यदि कोई व्यक्ति जिसके शरीर में तात्विक जल अधिक हो और वह इन आहारों का सेवन करे तो उसके शरीर में तात्विक जल की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाएगी इस से उसे हानि होगी। उदाहरण स्वरूप दही है, हमारे हकीमों और विद्वानों के अनुसार, दही में तात्विक जल की मात्रा अधिक होती है, तात्विक मिट्टी के स्वामी लोगों के लिए दही अच्छी चीज़ है क्योंकि वह उनके स्वभाव में संतुलन बना देता है किन्तु उन लोगों के लिए जिनके शरीर में तात्विक जल अधिक है, उनके लिए लाभदायक नहीं है, क्योंकि उनमें सीमा से अधिक लचक पैदा कर देती है। तात्विक मिट्टी के स्वामी लोग यदि दही का अधिक सेवन करें तो उनके लिए हानिकारक है और उनकी स्मरणशक्ति को भी कमज़ोर कर सकता है और उनकी पाचन क्रिया को भी कमज़ोर बना सकता है क्योंकि आप जानते हैं कि जहां पानी की मात्रा अधिक होगी वहां पदार्थ डांवाडोल हो जाएगा और उसमें स्थिरता नहीं रहेगी।

    बलग़मी स्वभाव के लोगों का चेहरा सफ़ेद, त्वचा ठंडी और नर्म व स्वच्छ होती है। उनमें थूक अधिक उत्पन्न होता है, प्यास कम लगती है, उनके शरीर के अंग नर्म होते हैं और वह सुस्त होते हैं। वह खट्टी डेकारें लेते हैं, रिफ़लेक्स का शिकार रहते हैं, यह बलग़मी स्वभाव के लोगों की विशेषता और चिन्ह हैं। सहन शक्ति का अधिक होना, धीरे धीरे बात करना, सक्रिय रहना, जल्दी थक जाना, ख़ूब सोना और स्मरणशक्ति का कमज़ोर व सुस्त होना, इन लोगों की अन्य विशेषताएं हैं।

    इस संबंध में डाक्टर नासिरी कहते हैं कि एक बीमारी है जिसका नाम रिफ़्लेक्स है। हमारे विद्वानों के अनुसार, भोजन नलिका की ओर अमाशय में उपस्थित पदार्थों का उलटा बहाव या रिफ़्लैक्स, इसलिए होता है कि भोजन नलिका के निचले सिरे पर एक इस्फ़िंक्टर या छल्ला सा होता है जिसका यह दायित्व होता है कि वह अमाशय से मुंह की ओर तेज़ाब और आहार की वापसी की क्रिया को रोके रखे। चूंकि इस्फ़िंक्टर या छल्ले में तात्विक मिट्टी की मात्रा अधिक होती है और वह स्थिर होता है और उसकी ज़िम्मेदारी यह है कि वह अमाशय में मौजूद और अमाशय में जाने वाले खाने की रक्षा करे। अतः यदि कोई व्यक्ति जिसके शरीर में तात्विक जल की मात्रा अधिक हो और वह अधिक फल खा ले या अधिक खीरे ककड़ी खा ले या दूध अधिक पी ले तो भोजन नलिका से जुड़े इस्फ़िंक्टर में तात्विक जल की मात्रा बढ़ जाएगी और ऐसी स्थिति में न केवल यह व्यक्ति सुस्त हो जाता है बल्कि उसके शरीर का यह भाग अर्थात इस्फ़िंक्टर अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर पाता और ढीला पड़ जाता है। उस हाथ की भांति जो देर तक पानी में डूबा रहा हो, या यदि आप बहुत देर तक पैरों को पानी में भिगोए रखें तो सफ़ेद हो जाता है और उस पर सूजन आ जाती है। अर्थात ढीला पड़ जाता है जिसका परिणाम यह होता है कि पाचनतंत्र के तेज़ाब और आहार, भोजन नलिका की ओर लौटने का प्रयास करते हैं। हमारे समाज के लगभग 15 प्रतिशत लोग इस बीमारी में ग्रस्त हैं, अब यदि हम अपने प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली से इस बीमारी का उपचार करने में डाक्टरों की सहायता करें और चिकित्सा के क्षेत्र में अपने छात्रों को भी इस सिद्धांत से परिचित कराएं तो इस प्रकार से हम अपने समाज की बहुत अधिक सेवा कर सकते हैं।

    इन लोगों के लिए संतुलित मौसम गर्मी का मौसम है। सर्दियों में ऐसे लोगों में बलग़मी बीमारियां और तेज़ हो जाती हैं। उन्हें दही, मठ्ठा और ठंडे खानों से पूर्ण रूप से बचने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि अधिकतर वृद्ध लोगों का स्वभाव ठंडा और तरल होता है।

    डाक्टर नासिरी कहते हैं कि मैंने लगभग कुछ समय पहले पाचनतंत्र की बीमारियों के विशेषज्ञ से हकीमों के इस सिद्धांत के बारे में बात की। उन्होंने मेरी बात की पुष्टि की और एक छात्र को इस पर काम करने की ज़िम्मेदारी सौंपी, बानवे बीमारों पर यह शोध आरंभ किया गया, यह बानवे लोग RESISTANT REFLEX का शिकार थे, दो तीन प्रकार की दवाएं जैसे ओमीप्राज़ोल ले रहे थे, कुछ बीमार, रेनिटिडीन ले रहे थे और कुछ एल्यूमीनियम एम जीएस का भी प्रयोग कर रहे थे, किन्तु उन्हें कोई लाभ नहीं हो रहा था, इन बीमारों को दो गुटों में विभाजित किया गया और हमने उनका उपचार बहुत साधारण सी दवा तुख़्मे बालंग-ए-शीराज़ी से आरंभ किया।

    हकीमों का यह मानना है कि यह ऐसी दवा है जो तरलता को कम करती है। डेढ़ महीने बाद पुनः विशेषज्ञों ने इन बीमारों का चेकअप किया। तुख़्मे बालंग- ए- शीराज़ी से सत्तर प्रतिशत बीमारों को लाभ पहुंचा था और तीस प्रतिशत बीमार भरपूर तरीक़े से ठीक हो गए थे। इससे हम यह समझते हैं कि हमारी प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा इन बीमारियों के उपचार में हमारी आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की सहायता कर सकती है। मैं यहां पर उन बीमारों को एक सलाह देना चाहता हूं जो रिफ़्लैक्स की बीमारी में ग्रस्त हैं। इन्हें फल विशेषकर खीरा और ककड़ी अधिक नहीं खाना चाहिए, इसी प्रकार तरबूज़ और अन्य फलों के सेवन से बचना चाहिए जिनमें तरलता अधिक होती है।

    आइये अब ईरान के प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा जगत की एक प्रसिद्ध पुस्तक से आपका परिचय कराते हैं। किताबे तशरीह, मिर्ज़ा अबूल हसन ख़ान बिन अब्दुल वह्हाब तफ़रीशी की पुस्तक है। वह मिर्ज़ा अबुल हसन ख़ान डाक्टर के नाम से प्रसिद्ध थे। वह 1312 हिजरी क़मरी अर्थात लगभग 1891 इसवी में नासिरीद्दीन शाह के काल के एक विख्यात चिकित्सक थे। उनकी यह पुस्तक क़ाजारी शासन काल की महत्त्वपूर्ण चिकित्सा पुस्तकों में गिनी जाती है जो यूरोपी चिकित्सा प्रणाली के आधार पर लिखी गयी है। इस पुस्तक में ईरान की प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा शब्दावलियों का प्रयोग किया गया है।