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    पारम्परिक चिकित्सा-1

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    मानवीय जीवन के आरंभ से ही मनुष्य को अपने स्वास्थ की चिंता होने लगी। जब से मनुष्य ने दुख और दर्द को पहचाना है, मृत्यु से अवगत हुआ है वह अपने शारीरिक व अध्यात्मिक दुखों का उपचार की चिंता में पड़ा हुआ है। उसने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए प्रकृति से सहायता ली, विभिन्न प्रकार के तथा विदित परीक्षण किए और सभ्यताओं के विकास के साथ साथ जब से लिखना पढ़ना आ गया तो उसने अनुभवों को लिखना आरंभ कर दिया। उसकी जानकारियां बढ़ती रहीं और उसने अपने इन ज्ञानों व जानकारियों को भी कई भागों में विभाजित करना आरंभ कर दिया और हर एक का अलग अलग नाम भी रख दिया। इस प्रकार वैज्ञानिक व ज्ञान संबंधी मत अस्तित्व में आ गए जिसमें एक मत प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा का भी है।

    डाक्टर शम्स अरदोकानी कहते हैं कि मनुष्य ईश्वर की संपूर्ण व श्रेष्ठ रचना होने के नाते अपने इतिहास में दो मूल विषयों की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहा है। पहली बात यह है कि वह अपने मार्ग में मौजूद रूकावटों व बाधाओं को हटाने के प्रयास में रहता है और दूसरी बात यह है कि अपनी परिपूर्णता के मार्ग पर अग्रसर रहता है। पहली बात के अंतर्गत मनुष्य के शारीरिक विषय जैसे बीमारियां और उसका बीमार होना शामिल है। मनुष्य ने जब से संसार में आंख खोली है अपनी इस समस्या के समाधान में लगा हुआ है। विभिन्न जातियों और राष्ट्रों के इतिहास के अध्ययन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मनुष्य ने सदैव से अपने स्वास्थ की रक्षा और स्वयं को बीमारियों से मुक्ति देने के लिए हर प्रकार के प्रयास जारी रखे हुए है। ईरान भी इन सभ्यताओं का भाग रहा है जिनमें मनुष्य ने स्वास्थ के विषय के समाधान के लिए अत्यंत गम्भीर प्रयास किए हैं और इनहीं प्रयासों के परिणाम स्वरूप ईरान का प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा अस्तित्व में आया है। दूसरी जातियों के इतिहास से स्पष्ट होता है कि इन जातियों ने परिश्रम करके अपने चिकित्सा मत को अस्तित्व तो प्रदान किया किन्तु उनके मत व उनकी विचारधारा ईरान के चिकित्सा मत की भांति व्यापक व विस्तृत नहीं हैं।

    पुराने समय में चीन, तिब्बत, ईरान, भारत, मिस्र और यूनान वैज्ञानिक केन्द्रों में गिने जाते थे। इन जातियों ने जो मूल्यवान व महत्त्वपूर्ण धरोहरें छोड़ी थीं उसमें उनकी आने वाली पीढ़ियों ने बहुत अधिक वृद्धि की है ताकि मनुष्य के सामने आने वाली समस्याओं का समाधान किया जा सके।

    डाक्टर शम्स अर्दोकानी कहते हैं कि ईरान में इस्लाम के आगमन से पूर्व ईरान में चिकित्सा विज्ञान के बड़े बड़े विशेषज्ञ और बड़े बड़े चिकित्सा केन्द्र थे। ऐसे केन्द्रों में जुन्दीशापूर विश्वविद्यालय का नाम लिया जा सकता है। इस विशाल विश्वविद्यालय की भांति आज तक कोई वैज्ञानिक केन्द्र अस्तित्व में नहीं आ सका है। जुन्दीशापुर एक विश्वविद्यालय और अस्पताल भी था और उसमें विभिन्न ज्ञानों की शिक्षाएं दी जाती थी। इस बात के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि ईरान में चिकित्सा विज्ञान को बहुत अधिक महत्त्व प्राप्त है।

    ईरान के जुन्दीशापुर विश्वविद्यालय में बड़े बड़े और विश्वख्याति प्राप्त गुरु व उस्ताद शिक्षा देने की ज़िम्मेदारियां निभाते थे। यहा पढ़ने वाले छात्रों की संख्या भी बहुत अधिक थी जो पूरी मेहनत, लगन और परिश्रम से ज्ञान प्राप्त करते थे। इसी विश्वविद्यालय के हकीम और चिकित्सक सरकारों की समस्याओं का भी समाधान किया करते थे क्योंकि ज्ञान जहां होता है मानवता की सेवा करता रहता है।

    ईरान में इस्लाम के आगमन और ईरान के इस्लाम स्वीकार करने के बाद सारा ईरान इस्लाम की शरण में आ गया। ईरानी समाज में मूल परिवर्तन आ गए और ईरानवासी अब इस्लामी दृष्टिकोण से संसार को देखने लगे। ईरानियों के जीवन के समस्त भागों पर इस्लाम सत्तासीन हो गया जिससे चिकित्सा और ज्ञान के विभाग अलग नहीं है।

    डाक्टर शम्स अर्दोकानी कहते हैं कि ईरान में प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा के निखार और विकास के समय में जो कि इस्लाम आने के बाद था, अर्थात दूसरी हिजरी क़मरी में, हम देखते हैं कि ईरान में महान विद्वानों और बुद्धिजीवियों ने अपने अस्तित्व के प्रकाश से संसार को प्रकाशमयी कर दिया, उनमें कुछ हस्तियां ऐसी हैं जो शताब्दी की श्रेष्ठतम हस्तियां थीं। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात जो मैं आपको बताना चाहता हूं वह यह है कि ईरानी विद्वानों व बुद्धिजीवियों ने चिकित्सा विज्ञान में अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं, तीसरी बात यह है कि हमारे बुद्धिजीवियों और विद्वानों ने नई नई चीज़ों की खोज की है और इस ज्ञान में वृद्धि की है। चौथी बात यह है कि इन चीज़ों से लाभ उठाना चाहिए और यह क्रम जारी रहना चाहिए। वास्तव में चिकित्सा के इतिहास को बयान करने के लिए बहुत अधिक समय की आवश्यकता है और मैं यह समझता हूं कि यह कुछ शब्द भी पर्याप्त होंगे।

    ईरानियों के इस्लाम स्वीकार करने के बाद ईरानी हकीमों और चिकित्सकों ने जो कुछ अपने पूर्वजों से सीखा था उसको भी जनता के लाभ के लिए पेश कर दिया और अपने लाभदायक अनुभवों और दक्षता से ईरानी चिकित्सा को ऐसा बना दिया कि सब की ज़बान पर ईरानी चिकित्सा का नाम रहने लगा और इतिहास में श्रेष्ठ स्थान प्रदान किया। इस चिकित्सा को श्रेष्ठ बनाने में मुहम्मद बिन ज़करिया राज़ी, इब्ने अबी सादिक़ नैशापूरी, अबूब्रक रजअ इब्ने अहमद अख़वीनी बुख़ाराई और सबसे बढ़कर शैख़ अबू अली सीना हैं जिन्हीं के ज्ञान से पूरा संसार लाभान्वित हो रहा है।

    यहां हम आपको अबू अली सीना की क़ानून नामक पुस्तक से आपको परिचित कराना चाहते हैं। अबू अली सीना 300 हिजरी क़मरी में जन्में थे और वह वास्तविक अर्थों में शताब्दी के सबसे श्रेष्ठ व उत्तम विद्वान थे। इब्ने सीना ने इस्लामी चिकित्सा विज्ञान को आसमान पर पहुंचाया है और उनकी किताबें और पुस्तकें इस्लामी चिकित्सा का महत्त्वपूर्ण स्रोत समझी जाती हैं। चिकित्सा में उनकी पुस्तक क़ानून सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक मानी जाती है जिससे उनके समय से आज तक लाभ उठाया जा रहा है। इस पुस्तक से यूरोप ने सैकड़ों वर्षों तक लाभ उठाया। इस पुस्तक के पांच खंड हैं, इसमें मनुष्य की पहचान, स्वस्थ जीवन बिताने के मार्ग व सिद्धांत और नियम और बीमारियों की पहचान और उपचार के सिद्धांत व दवाओं की पहचान के नियम वर्णित हैं।