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    पैग़म्बरे इस्लाम स. की ज़िंदगी के कुछ पहलू

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    पैग़म्बरे इस्लाम स. की ज़िंदगी के कुछ पहलू

    सुप्रीम लीडर के बयानात की रौशनी में

    कुछ बहुत विश्वसनीय रिवायतों के अनुसार 28 सफ़र सन 11 हिजरी क़मरी को रसूले इस्लाम (स.अ) की वफ़ात हुई। उस समय आप (स.) की उम्र 63 साल थी। हिजरत से 52 साल पहले मक्के में आपका जन्म हुआ। सच्चाई और अमानत दारी में आप बचपन में ही मशहूर हो गए थे।

    लोग आपको सादिक़ और अमीन के नाम से याद करते थे। चालीस साल की उम्र में अल्लाह के हुक्म से आपने अपनी रिसालत का ऐलान किया और लोगों को एक और अकेले अल्लाह की परस्तिश व इबादत, न्याय व इंसाफ़ और बराबरी की दावत दी। जातीय और क़ौमी भेदभाव खत्म करने की ज़रूरत पर जोर दिया। यहाँ हम आपकी सीरत के बारे में हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली ख़ामेनई के विचार बयान कर रहे हैं।

    पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) का अख़लाक़
    पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ) इस्लामी अख़लाक़ और मूल्यों को समाज में और लोगों की रूह, अक़ीदों और ज़िंदगी में प्रचलित करने के लिए, ज़िंदगी के वातावरण को इस्लामी मूल्यों से मालामाल करने की खोज में रहते थे।

    पैग़म्बरे इस्लाम की नरमी और सख्ती
    क़ुरआने करीम पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) के लोगों से नरमी से पेश आने की सराहना करता है और कहता है कि आप कड़ाई से पेश नहीं आते है।

    “فبما رحمۃ من اللہ لنت لھم و لو کنت فظا غلیظ القلب لانفضوا من حولک”

    यही कुरआन दूसरी जगह पर पैग़म्बर (स.) से कहता है कि

    یا ایھا النبی جاھد الکفار والمنافقین واغلظ علیھم”

    काफ़िरों और मुनाफ़िकों से सख्ती से पेश आएं। वही सख्ती जो पहली आयत में बयान हुई थी यहाँ भी है, लेकिन यहाँ कानून लागू करने और समाजिक मामलों को चलाने और अनुशासन और शांति स्थापित करने में है। वहाँ सख्ती बुरी है, यहाँ सख्ती अच्छी है. वहाँ सख्ती से काम लेना बुरा है और यहाँ सख्ती से काम लेना अच्छा है।

    पैग़म्बरे इस्लाम की अमानतदारी
    आपका अमीन होना और आपकी अमानतदारी ऐसी थी कि जाहेलियत के ज़माने में आपका नाम अमीन पड़ गया और लोग जिन अमानतों को बहुत कीमती समझते थे, उसे आपके पास रखवाते थे और संतुष्ट हो जाते थे कि यह अमानत सही और सालिम उन्हें वापस मिल जाएगी। यहां तक कि इस्लाम की दावत शुरू होने और क़ुरैश की दुश्मनी और बैर में बढ़ोतरी आने के बाद भी, उन हालात में भी, वही दुश्मन अगर कोई चीज़ कहीं अमानत रखवाना चाहते थे तो आ के रसूले इस्लाम (स.अ) के सुपुर्द करते थे। इसलिए जब रसूले इस्लाम (स.अ) ने मदीना हिजरत की, तो अमीरुल मोमिनीन (अ.स.) को मक्के में छोड़ा ताकि लोगों की वस्तुएं उन्हें वापस लौटा दें। इससे पता चलता है कि उस समय भी हज़रत रसूले इस्लाम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही व सल्लम) के पास लोगों की अमानतें थीं। मुस्लिम की अमानतें नहीं बल्कि काफ़िरों और उन लोगों की चीज़ें थीं जो आपसे दुश्मनी करते थे।

    पैग़म्बरे इस्लाम का संयम
    आप में धैर्य और संयम इतना ज़्यादा था कि जिन बातों को सुनके दूसरे आपे से बाहर हो जाते थे, उन बातों से आपके अंदर बेताबी पैदा नहीं होती थी। कई बार मक्का में आपके दुश्मन आप के साथ ऐसा व्यवहार करते थे कि उनमें से एक के बारे में जब जनाबे अबू तालिब ने सुना तो इतना ग़ुस्सा हुए और फिर जितने लोगों ने गुस्ताखी की थी उनमें से हर एक के साथ वही काम किया और कहा कि तुम में से जो भी ऐतराज़ करेगा उसके साथ सख़्ती से पेश आऊंगा, मगर पैग़म्बर स.अ ने वही गुस्ताखी संयम के साथ सहन की। एक बार अबू जहेल ने आपका बड़ा अपमान किया लेकिन हज़रत (स.) ने संयम से काम लिया और ख़ामोश रहे। किसी ने जाके जनाबे हम्ज़ा को सूचित कर दिया कि अबू जहेल ने आपके भतीजे के साथ ऐसा व्यवहार किया है। जनाबे हम्ज़ा ग़ुस्सा हो गए, आप गए और कमान से अबू जहेल के सिर पर इतनी ज़ोर से मारा कि उसके होश ठिकाने आ गए और फिर उसी घटना के बाद उन्होंने इस्लाम का ऐलान किया। कभी कभी कुछ लोग मस्जिद में आते थे, पैर फैला कर रसूल (स.अ) से कहते थे कि मेरे नाखून काट दीजिए, पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ.) भी पूरे संयम के साथ गुस्ताखी और बे अदबी को बर्दाश्त करते थे।

    अच्छे अख़लाक़ की दावत
    लोगों को हमेशा अच्छी बातों यानी, माफी और क्षमा, अनदेखा कर देना, मेहरबानी, एक दूसरे से प्यार, कामों में मज़बूती, धैर्य, संयम, गुस्सा पर कंट्रोल, विश्वासघात न करना, चोरी न करना, बुरा व्यवहार न करना, किसी का बुरा न चाहना, और दिल में कीना व ईर्ष्या न रखना आदि की नसीहत और हिदायत करें। लोगों को इन बातों की हमेशा जरूरत रहती है। किसी ऐसे ज़माने की कल्पना नहीं की जा सकती जब अच्छी बातों की जरूरत न रहे। लोगों को हमेशा इन मूल्यों की ज़रूरत रहती है। अगर समाज में मूल्य नहों तो चाहे जितनी तरक़्क़ी हो समाज बुरा और अस्वीकार्य होगा।

    पैगम्बर (स.अ.) का संयम
    जाहेलियत के ज़माने में मक्के वालों के बीच कई समझौते थे। उनके अलावा एक समझौता, “हल्फ़ुल फ़ुज़ूल” के नाम से भी था जिसमें पैग़म्बरे इस्लाम (स.) भी शामिल थे। कोई अजनबी मक्का आया और उसने अपना सामान बेचा जिसने उसका सामान खरीदा, उसका नाम “आस इब्ने वाइल” था जो एक बदमाश था और मक्के के पूंजीपतियों में शुमार होता था, उसने जो सामान खरीदा उसका पैसा नहीं दिया, वह अजनबी जिसके पास भी गया, कोई उसकी मदद नहीं कर सका, आखिरकार वह अबूक़ैस नामक पहाड़ के ऊपर गया और वहां से गुहार लगाई कि मेरे ऊपर ज़ुल्म हुआ है. “यह गुहार रसूले इस्लाम (स.) और आपके चाचा ज़ुबैर इब्ने अब्दुल मुत्तलिब ने सुनी। उन्होंने लोगों को इकट्ठा किया और उस आदमी के अधिकार की रक्षा करने का फैसला किया. वह आस इब्ने वाइल के पास गए और उससे कहा कि उसके पैसे दो, वह डर गया और मजबूर होके उसके पैसे दिए। यह समझौता उनके बीच बाकी रहा और इसमें तय हुआ था कि जो अजनबी भी मक्का आए और अगर मक्का के लोग उस पर अत्याचार करें, आमतौर पर अजनबियों और मक्का से बाहर वालों पर अत्याचार करते थे, तो वह उसकी रक्षा करेंगे। इस्लाम आने के बरसों बाद भी रसूले इस्लाम (स.) कहा करते थे कि “मैं अब भी खुद को उस समझौते का पाबन्द समझता हूँ। “कई बार आप अपने हारे हुए दुश्मनों के साथ ऐसा व्यवहार करते जो उनके भी समझ से परे था। आठवीं हिजरी में जब पैग़म्बरे इस्लाम (स.) ने बड़ी महानता और शान व शौकत के साथ मक्के को जीता तो आम ऐलान कि “الیوم یوم المرحمۃ” आज माफ़ कर देने का दिन है इसलिए इंतेक़ाम और बदले की भावना से काम का न लेना। यह हज़रत रसूले अकरम (स.) की अताह कृपा और संयम को दर्शाता है।

    रसूल इस्लाम की ईमानदारी
    रसूले इस्लाम (स.अ) ईमानदार थे। जाहेलियत के समय में आप व्यापार करते थे, सीरिया और यमन जाते थे। व्यापारियों के क़ाफ़िले में शामिल होते थे। जाहेलियत के समय में आपके प्रतिद्वंदियों में से एक बाद में कहता है कि आप सबसे अच्छे साथियों में से थे, न जिद करते थे, न बहस करते थे, न अपना बोझ साथियों के कंधों पर डालते थे, न ग्राहक के साथ छेड़छाड़ करते थे, न महंगा बेचते थे और न ही झूठ बोलते थे, ईमानदार थे। यह हज़रत की ईमानदारी ही थी कि जिसने जनाब ख़दीजा को आपका प्रशंसक बनाया। खुद जनाबे ख़दीजा मक्के की पहले दर्जे की महिला (मलीकतुल अरब) और हसब, परिवार और माल व दौलत के लिहाज से बहुत ही अलग हस्ती थी।

    पैग़म्बरे इस्लाम की पवित्रता
    पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ) बचपन से ही बहुत सफ़ाई पसंद इंसान थे। मक्का और अरब जनजाति के बच्चों के विपरीत, आप हमेशा साफ और पाक व पाकीज़ा रहते थे। जवानी से पहले के समय में भी (सफ़ाई का ख़्याल रखते थे) बालों में कंघी करते थे और जवानी में भी आपके बाल कंघी किए हुए होते थे, इस्लाम के ऐलान के बाद इस दौर में जब जवानी का दौर बीत चुका था और आप बुढ़ापे की ओर अग्रसर थे, पचास साल साठ साल की उम्र मैं भी सफ़ाई और पवित्रता का पूरा ध्यान रखते थे, आपकी ज़ुल्फ़े मुबारक हमेशा साफ, मुबारक दाढ़ी हमेशा सुलझी और सुगंधित रहती थी। मैंने एक रिवायत में देखा है कि बैतुश शरफ में पानी का एक बर्तन था, जिसमें आप अपना मुबारक चेहरा देखा करते थे। उस समय आईने का अधिक रिवाज नहीं था।

    “کان یسوّی عمامتہ ولحیتہ اذا اراد ان یخرج الی اصاحبہ”

    हज़रत (स.) जब मुसलमानों, दोस्तों और असहाब के पास जाना चाहते थे तो अमामे और सिर के बालों और मुबारक दाढ़ी को बहुत अच्छे ढ़ंग के साथ ठीक करते थे उसके बाद घर से बाहर आते थे।
    आप हमेशा पर्फ़्यूम और खुशबू से खुद को सुगंधित कहते थे। आप संयासी और ज़ाहिदाना ज़िंदगी के बावजूद, मैं कहूंगा कि पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ) की ज़िंदगी आईडियल थी, सफ़र में कंघी और परफ़्यूम और सुरमा अपने साथ रखते थे। उस ज़माने में मर्द लोग आँखों में सुरमा लगाते थे। आप दिन में कई बार दांतों की सफ़ाई करते थे। दूसरों को सफाई, दांतों की सफ़ाई और खुद को साफ रखने की हिदायत कहा करते थे। पैगम्बर का लिबास पुराना और उसमें पेवंद लगे थे, लेकिन आपका लिबास, सिर और चेहरा हमेशा साफ़ रहता था। यह बातें, समाज में, ज़ाहरी हालत और स्वास्थ्य में बहुत प्रभावी है। यह बज़ाहिर छोटी बातें, लेकिन बहुत प्रभावी है।

    पैग़म्बरे इस्लाम की लोगों से दोस्ती
    हज़रत (स.) हमेशा लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करते थे। लोगों के बीच हमेशा ख़ुश रहते थे। जब अकेले होते थे तो आपका ग़म और पीड़ा जाहिर होती थी। आप अपने ग़म को लोगों के सामने अपने मुबारक चेहरे पर ज़ाहिर नहीं होने देते थे। हमेशा चेहरे पर शादाबी और ख़ुशी रहती थी। सबको सलाम करते थे। अगर कोई आपको तकलीफ देता था तो चेहरे पर पीड़ा के आसार दिखाई देते थे लेकिन ज़बान पर शिकवा नहीं आता था। आप इस बात की इजाज़त नहीं देते थे कि आपके सामने किसी को गालियाँ दी जाएं और बुरा भला कहा जाए। बच्चों से प्यार करते थे, महिलाओं से मेहरबानी से पेश आते थे, कमज़ोरों के साथ बहुत अच्छा व्यवहार करते थे, अपने साथियों के साथ हंसी मजाक कहते थे और उनके साथ घुड़ सवारी के मुक़ाबले में हिस्सा लेते थे।

    पैगंबर मोहम्मद का खाना और कपड़े
    आपका बिस्तर चटाई का था, तकिया चमड़े का था जिसमें खजूर के पत्ते भरे हुए थे. आपका खाना अधिकांश जौ की रोटी और खजूर होता था। लिखा है कि हज़रत (स.) कभी भी तीन दिन तक लगातार गेहूं की रोटी या रंगारंग खाने नहीं खाते थे। जनाब आएशा कहती हैं कि कई बार एक महीने तक हमारे रसोई से धुआं नहीं उठता था। (यानी चूल्हा नहीं जलता था) आपकी सवारी बिना काठी और पालान के होती थी। जिस समय लोग कीमती घोड़ों पर अच्छी काठी और पालान के साथ बैठते थे और उस पर गर्व करते थे, हज़रत (स.अ) अक्सर अवसरों पर गधे पर बैठ के जाते थे, नम्रता से पेश आते थे, अपने जूते खुद सीते थे।

    पैग़म्बरे इस्लाम स. की इबादत
    आपकी इबादत ऐसी थी कि इबादत की हालत में खड़े रहने के कारण आपके मुबारक पैरों में सूजन आ जाती थी। रात का बड़ा हिस्सा जाग कर गुज़ारते थे, इबादत रोना और बिलकना, इस्तेगफार (माफ़ी मांगना) और दुआ में बिताते थे। ख़ुदा वन्दे आलम से राज़ो नियाज और इस्तेग़फ़ार करते थे। रमज़ान के अलावा शाबान और रजब में भी रोज़ा रखते थे और बाक़ी दिनों में, और वह भी गर्मी के मौसम में, एक दिन छोड़ के रोज़ा रखते थे। असहाब आपसे कहते थे या रसूलल्लाह आप से तो कोई गुनाह नहीं हुआ है

    “غفر اللہ لک ما تقدم من ذنبک وما تاخّ”

    सूरह फ़त्ह में भी आया है

    “لیغفرلک اللہ ما تقدم ذنبک و ما تاخّر”

    तो इतनी दुआ, इबादत और इस्तेग़फार किस लिए? तो आप कहते थे

    “افلا اکون عبدا شکورا”

    क्या अल्लाह का आभारी बंदा न रहूं जिसने मुझे इतनी नेअमतें दी हैं?

    पैगंबर मुहम्मद स.अ. का व्यवहार
    हज़रत रसूले अकरम (स.अ) आदिल और समझदार थे। जो हज़रत (स.) के मदीने आने के इतिहास की स्टडी करे, वह आदिवासी जंगें, वह हमले, वह दुश्मन को मक्के से रेगिस्तान के बीच में लाना, वह लगातार वार, वह दुश्मन से मुकाबला, इस इतिहास में ऐसी पालीसियों का अनुभव करता है जो आश्चर्यजनक है। आप कानून और नियमों के अधीन और संरक्षक थे। न खुद कानून के खिलाफ काम करते थे और न ही दूसरों को कानून तोड़ने की इजाज़त देते थे। खुद भी नियमों का पालन करते थे, कुरआन की आयतें भी इसकी गवाही देती हैं. जिन कानूनों का पालन लोगों के लिए ज़रूरी था, हज़रत ख़ुद भी सख्ती के साथ पालन करते थे और ज़रा भी कानून के उल्लंघन की इजाज़त नहीं देते थे।
    आपकी दूसरी आदतों और तरीकों में एक चीज़ यह भी थी कि वादे का पालन करते थे, कभी वादा नहीं तोड़ा। क़ुरैश ने आपके साथ वादा तोड़ा लेकिन आपने नहीं। यहूदियों ने कई बार वादा तोड़ा लेकिन हज़रत (स.अ) ने नहीं।
    इस तरह राज़दारी करते थे कि जब मक्के को जीतने के लिए चल रहे थे तो कोई न समझ सका कि पैगम्बर कहाँ जाना चाहते हैं, पूरी फ़ौज को जमा किया और कहा बाहर चलते हैं, कहा कहां? तो आपने कहा बाद में पता चलेगा। किसी को भी यह न समझने दिया कि मक्के की ओर जा रहे हैं, आपने ऐसी पालीसी से काम लिया कि मक्के के पास पहुंच गए और क़ुरैश को यह पता नहीं चल सका कि रसूले इस्लाम (स.अ) मक्का आ रहे हैं।
    जब आप लोगों में बैठे होते थे तो मालूम नहीं होता था कि पैगम्बर और इस बड़ी पार्टी के कमांडर हैं। आपकी सामाजिक और सैनिक लीडरशिप कमाल की थी और हर काम पर नज़र रखते थे। लेकिन समाज छोटा था, मदीना और आसपास के क्षेत्र इसमें शामिल थे, बाद में मक्का और दूसरे शहर इसमें शामिल हो गए लेकिन संगठित रूप से लोगों के मामलों का ख्याल रखते थे। इस प्रारंभिक समाज में आपने प्रबंधन, हिसाब किताब प्रोत्साहन को लोगों के बीच प्रचलित किया।

    इस्लाम के दुश्मनों से पैगंबर मुहम्मद (स.अ.) का व्यवहार
    पैग़म्बरे इस्लाम (स.अ) सारे दुश्मनों को बराबर नहीं समझते थे, यह आपके जीवन का एक महत्वपूर्ण पहलू है। कुछ दुश्मन ऐसे थे जिनकी दुश्मनी गहरी थी, लेकिन पैग़म्बर स.अ. देखते थे कि उनसे ज़्यादा ख़तरा नहीं है तो पैग़म्बर उनसे अधिक सरोकार नहीं रखते थे और उनसे ज़्यादा सख्ती से पेश नहीं आते थे।
    कुछ दुश्मन ऐसे थे जिनकी तरफ़ से खतरा था, पैगम्बर स. उनकी तरफ़ से सावधान रहते थे और उन पर नज़र रखते थे। जैसे अब्दुल्ला इब्ने अबी, एक बहुत बड़ा मुनाफ़िक़ था और रसूले इस्लाम (स.अ) के खिलाफ साजिश रचता रहता था, लेकिन पैग़म्बर स.अ. केवल उस पर नज़र रखते थे और उससे कोई सरोकार नहीं रखते थे। वह पैगम्बर स.अ. के जीवन के अंत तक ज़िंदा था। रसूल इस्लाम (स.अ) की रेहलत से थोड़ा पहले दुनिया से गया। पैगम्बर उसे बर्दाश्त करते थे, यह ऐसे दुश्मन थे जिनकी तरफ़ से इस्लामी सिस्टम, इस्लामी सरकार और इस्लामी समाज को कोई गंभीर खतरा नहीं था. लेकिन जिन दुश्मनों से खतरा था पैगम्बर के साथ सख्ती से पेश आते थे। इसी मेहरबान, रहेमदिल, कृपालू, अनदेखी करने और क्षमा व माफ़ कर देने वाली हस्ती ने हुक्म दिया और बनी क़ुरैज़ः के खियानतकारों को जो कई सौ थे, एक दिन में क़त्ल कर दिया गया और बनी नज़ीर और बनी कैनकाह को बाहर निकाल दिया गया और ख़ैबर को जीत लिया गया।
    क्योंकि यह खतरनाक दुश्मन थे, मक्के में आने के बाद शुरू में पैगम्बर स. ने उनके साथ बहुत कृपा व मेहरबानी से काम लिया लेकिन उन्होंने खियानत व विश्वासघात किया और पीठ में ख़ंजर घोंपा, साजिशें रचीं और जोखिम पैदा किये। पैगम्बर ने अब्दुल्ला इब्ने अबी को बर्दाश्त किया, मदीने के यहूदियों को बर्दाश्त किया. जो कुरैशी आपकी शरण में आ गए या जिनसे कोई नुक़सान नहीं था उन्हें सहन किया। जब आपने मक्का जीत लिया तो चूंकि अब उसकी ओर से कोई खतरा नहीं था इसलिए यहाँ तक अबू सुफ़यान और कुछ दूसरे लोगों के साथ मेहरबानी से पेश आए; लेकिन ग़द्दार, खतरनाक दुश्मनों को सख्ती के साथ कुचल दिया।