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    फिलिस्तीन इस्लामी जगत की एक बड़ी समस्या

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    मध्यपूर्व में तेज़ी से होने वाले परिवर्तन और सीरिया में संकट और उसे हवा देने हेतु पश्चिमी एवं क्षेत्र में उनकी घटक सरकारों के प्रयास,अतिग्रहित फिलिस्तीन

    के भुला देने का कारण बने हैं जबकि फिलिस्तीन इस्लामी जगत की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण समस्या है। यह एसी स्थिति में है जब ६५ वर्षों से फिलिस्तीनी भूमियों पर जायोनियों ने अतिग्रहण कर रखा है परंतु तुर्की के साथ मिलकर कुछ अरब सरकारें समस्त संभावनाओं व संसाधनों के साथ इस्राईल के हित में सीरिया संकट को हवा देने में लगी हुई हैं। लाखों फिलिस्तीनी दसियों वर्षों से दूसरे देशों में शरणार्थी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं और वे स्वदेश वापस लौटने की आस लगाये बैठे हैं। एसी स्थिति में क़तर और सऊदी अरब जैसी राजशाही,अलोकतांत्रिक और तानाशाही सरकारें सीरिया में आज़ादी न होने से चिंतित हैं और वे सीरिया की सरकार को गिराने के लिए जायोनी शासन के समर्थकों के साथ, जो मुसलमानों के वास्तविक शत्रु हैं, मिल गयी हैं।

    इन सरकारों ने इसी को पर्याप्त नहीं समझा और वे फिलिस्तीनियों की आकांक्षा से भी ध्यान हटाने की चेष्टा में हैं। फिलिस्तीनियों की आकांक्षाओं से विश्वास घात करने वालों के मुखिया क़तर के शासक शेख हमन बिन ख़लीफा हैं जो यह सोचते हैं कि तेल और गैस से प्राप्त होने वाले डालर से वह जो चाहें कर सकते हैं। पश्चिमी सरकारें उनमें सर्वोपरि अमेरिका भी क़तर नरेश को क्षेत्रीय भूमिका अदा करने के लिए प्रयोग कर रहे हैं और क़तर के पैसों एवं संभावनाओं का प्रयोग मध्यपूर्व में अपनी वर्चस्ववादी नीतियों को आगे बढाने में कर रहे हैं।

    क़तर की तानाशाही सरकार ने अपने नवीनतम प्रयास में फिलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए एक प्रस्ताव पेश किया है जिसमें गत ६० वर्षों के बहुत से फिलिस्तीनी सिद्धांतों एवं राष्ट्र संघ के प्रस्तावों की अनदेखी कर दी गयी है। फिलिस्तीन के इस्लामी प्रतिरोध आंदोलन हमास ने क़तर के इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। फिलिस्तीन के क़ानूनी प्रधानमंत्री इस्माईल हनिया ने ग़ज़्ज़ा पट्टी में इस प्रस्ताव की प्रतिक्रिया में कहा” फिलिस्तीनी भूमियों की पूर्ण स्वतंत्रता तक हमास अपना हथियार नहीं रखेगा” उन्होंने बल देकर कहा “ मैं घोषणा करता हूं कि हम फिलिस्तीनी भूमि की एक इंच से भी पीछे नहीं हटेंगे” यद्यपि फिलिस्तीन के प्रतिरोधक गुट हमास ने कतर नरेश के प्रस्ताव का मुखर विरोध किया है परंतु फार्स खाड़ी की अलोकतांत्रिक सरकारों के समर्थन से क़तर नरेश के प्रस्ताव के पेश किये जाने से फिलिस्तीन की आकांक्षों के प्रति अरब शासकों का विश्वासघात पहले से अधिक स्पष्ट हो गया है।

    क़तर ने फिलिस्तीन के संबंध में अपना प्रस्ताव सबसे पहले अरब संघ में पेश किया। क़तर नरेश ने सऊदी अरब की सहायता से अरब संघ के अधिकांश सदस्यों का समर्थन प्राप्त कर लेने के बाद अपने विदेशमंत्री की नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल वाशिंग्टन भेजा ताकि जायोनी शासन से सांठगांठ के अपने प्रस्ताव को अमेरिकी अधिकारियों के समक्ष पेश कर सकें। फिलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए क़तर नरेश के नये प्रस्ताव की ओर संकेत करने से पहले हम आवश्यक समझते हैं कि अरबों की शांति योजना की ओर संकेत करते चलें। वर्ष २००२ में सऊदी अरब के तत्कालीन युवराज अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसे अरब संघ के नेताओं ने पारित भी कर दिया। यह प्रस्ताव अरब शांति योजना के नाम से प्रसिद्ध हो गयी।

    अलबत्ता जायोनी शासन ने इस प्रस्ताव व योजना को भी स्वीकार नहीं किया और उसे अपने हितों व अपेक्षाओं के विपरीत समझा और उसका मानना था कि इससे उसकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी और उसने इस प्रस्ताव के कई अनुच्छेदों को समाप्त करने की मांग की। तीन सिद्धांत अरब शांति प्रस्ताव के आधार थे। पहला आधार व प्रस्ताव यह था कि अतिग्रहणकारी जायोनी शासन गोलान की पहाड़ियों सहित फिलिस्तीन की अतिग्रहित भूमियों से पूर्णरूप से पीछे हट जाये और दक्षिणी लेबनान की अतिग्रहित भूमियों को वापस दे दे और १९६७ की सीमा पर वापस चला जाये। अरब शांति प्रस्ताव का दूसरा आधार यह था कि राष्ट्रसंघ की महासभा के प्रस्ताव नम्बर १९४ के आधार पर फिलिस्तीनी शरणार्थियों की समस्याओं का न्यायपूर्ण समाधान किया जाये। राष्ट्रसंघ की महासभा के इस प्रस्ताव में फिलिस्तीनी शरणार्थिंयों को स्वदेश वापसी का अधिकार दिया गया है।

    इसी प्रकार राष्ट्र संघ के इस प्रस्ताव में फिलिस्तीनी शरणार्थियों के संबंध में राष्ट्रसंघ को रिपोर्ट पेश करने के लिए एक समिति के गठन, युद्ध विराम के प्रति कटिबद्ध रहने और बैतुल मुकद्दस में इस्लामी मान्यताओं के सम्मान के प्रति वचनबद्ध रहने पर बल दिया गया है। इसी प्रकार राष्ट्र संघ के इस प्रस्ताव में इस बिन्दु को भी स्पष्ट किया गया है कि फिलिस्तीनी राष्ट्र को चाहिये कि वह विदेशियों के हस्तक्षेप के बिना अपने भविष्य का निर्धारण स्वयं करे। सऊदी अरब के पूर्व युवराज के तथाकथित शांति प्रस्ताव का तीसरा आधार यह था कि एक एसे स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश को स्वीकार किया जाये जिसकी राजधानी पूर्वी बैतुल मुक़द्दस हो परंतु तथाकथित शांति के इस प्रस्ताव को जायोनी शासन ने रद्द कर दिया और सऊदी अरब एवं क़तर के शासकों ने इस प्रस्ताव को संतुलित करने का प्रयास किया ताकि इस प्रस्ताव के प्रति जायोनी शासन की सहमति प्राप्त की जाये। क़तर ने जो तथाकथित शांति प्रस्ताव पेश किया है वह इसी संतुलित प्रस्ताव के परिप्रेक्ष्य में है।

    अतिग्रहणकारी जायोनी शासन के साथ क़तर नरेश ने जो तथाकथित संतुलित शांति प्रस्ताव दिया है उसमें फिलिस्तीनी शरणार्थियों की स्वदेश वापसी के प्राथमिक अधिकार की अनदेखी कर दी गयी है। इसी प्रकार इस संतुलित प्रस्ताव में जायोनी शासन द्वारा सीरिया की गोलान की पहाड़ियों तथा लेबनान की अतिग्रहित भूमियों से पीछे हटने की बात भी बुला दी गयी है। यानी वास्तव में इन भूमियों को अतिग्रहणकारी जायोनी शासन के हवाले कर दिया गया है। सऊदी अरब के पूर्व युवराज द्वारा संतुलित तथाकथित शांति प्रस्ताव का दूसरा आधार, जिसे क़तर नरेश ने पेश किया, यह है कि फिलिस्तीनी शरणार्थियों की समस्या का एक समाधान खोजना है। इस संतुलित प्रस्ताव में न्यायपूर्ण ढंग से समाधान खोजने की बात हटा दी गयी है जबकि राष्ट्रसंघ की महासभा के प्रस्ताव में फिलिस्तीनी शरणार्थियों की स्वदेश वापस की बात कही गयी है। फिलिस्तीनी शरणार्थियों की स्वदेश वापस का विरोध गत २० वर्षो से तथाकथित शांतिवार्ताओं में जायोनी शासन की नीति रही है।

    वास्तव में क़तर नरेश के संतुलित प्रस्ताव में अपनी मातृभूमि से दूसरे देशों में शरणार्थी का जीवन बिता रहे ५० लाख से अधिक फिलिस्तीनियों के अधिकारों की अनदेखी कर दी गयी है। सऊदी अरब के पूर्व युवराज के तथाकथित शांति प्रस्ताव का तीसरा आधार एक एसे स्वतंत्र फिलिस्तीनी देश की स्थापना से संबंधित था जिसकी राजधानी बैतुल मुक़द्दस हो। क़तर नरेश के संतुलित प्रस्ताव में इस प्रकार आया है” अतिग्रहित फिलिस्तीनी भूमियों में एक फिलिस्तीनी देश का गठन उस समय स्वीकार्य है जब इस देश के पास हथियार न हों और वर्ष १९६७ से पहले जिन भूमियों पर अतिग्रहण किया गया है साथ में उनका आदान प्रदान भी हो” क़तर नरेश के संतुलित प्रस्ताव में एक स्वतंत्र व स्वाधीन फिलिस्तीनी देश के शब्द को हटा दिया गया और उसमें भूमियों के आदान- प्रदान शब्द की वृद्धि कर दी गयी है।

    इसी प्रकार संतुलित प्रस्ताव में पूर्वी बैतुल मुक़द्दस फिलिस्तीनी देश की राजधानी हो इस शब्द को भी हटा दिया गया है और उसके स्थान पर यह कहा गया है कि समाधान का एसा मार्ग खोजा जाये जिस पर दोनों पक्ष सहमत हों। इस प्रस्ताव के आधार पर यह जायोनी शासन है जो तथाकथित शांति वार्ता प्रक्रिया को निर्धारित करेगा और फिलिस्तीनियों को चाहिये कि वे स्वयं को जायोनी शासन की शर्तों व मांगों के अनुसार बनायें। रोचक बात यह है कि क़तर नरेश के संतुलित प्रस्ताव में जायोनी शासन को बहुत अधिक विशिष्टता दी गयी है परंतु इसके बावजूद इस्राईल ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया है।

    अब प्रश्न यह उठता है कि क्यों क़तर नरेश कुछ दूसरी अरब सरकारों के साथ मिलकर इस समय फिलिस्तीन समस्या के समाधान के लिए अपना ध्यान केन्द्रित किये हुए हैं और वह वही कार्य कर रहे हैं जो अमेरिका एवं जायोनी शासन चाह रहे हैं? प्रतीत यह हो रहा है कि इस विषय की समीक्षा व विश्लेषण मध्यपूर्व में होने वाले परिवर्तनों के परिप्रेक्ष्य से बाहर नहीं किया जा सकता। क्या अरब संघ में सीरिया की सीट को उसके विरोधियों को दे देना और उसके बाद अरब सरकारों की ओर से अमेरिकी प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए की जाने वाली कार्यवाहियों के मध्य कोई संबंध नहीं है? क्या मध्यपूर्व में जो घटनाएं घट रही हैं और परिवर्तन हो रहे हैं उनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है? यदि फिलिस्तीन समस्या के संबंध में अरब संघ के क्रिया -कलापों पर दृष्टि डाली जाये तो इस प्रश्न के उत्तर को समझा जा सकता है। सीरिया संकट उत्पन्न होने से पहले तक यह सीरिया था जो अरब देशों में फिलिस्तीन समस्या के संबंध में एक प्रभावी देश की भूमिका निभा रहा था और वह फिलिस्तीन समस्या के संबंध में अरब जगत की प्रतिष्ठा से किसी प्रकार के खिलवाड़ की अनुमति नहीं दे रहा था और वह सदैव इस बात पर बल देता था कि फिलिस्तीन समस्या का समाधान न्यायपूर्ण ढंग से होना चाहिये। अब जब कि अरब संघ में सीरिया की सीट को उसके विरोधियों को दे दी गयी है तो कुछ अरब सरकारें बड़े आराम व संतोष के साथ फिलिस्तीन के प्रतिरोधक गुटों की मांगों की उपेक्षा करके इस समस्या का समाधान इस्राईल और उसके पश्चिमी समर्थकों के दृष्टिकोणों के अनुसार करना चाहती हैं और साथ ही वे सीरिया की सरकार को भेंट चढ़ते देखना चाहती हैं। सीरिया की सदस्यता को अरब संघ से समाप्त कर देने के दीर्घावधि लक्ष्य हैं जिसके परिणाम अभी से दिखाई देने लगे हैं।

    क़तर नरेश ने फिलिस्तीन समस्या के समाधान के संबंध में जो प्रस्ताव पेश किया है वास्तव में वह अमेरिका के साथ एक समझौता व सांठगांठ है इस प्रकार कि हम फिलिस्तीन को दे रहे हैं,तुम सीरिया को समाप्त करो। वास्तविकता यह है कि अरब सरकारें फिलिस्तीन समस्या के समाधान से अधिक सीरिया की वर्तमान सरकार को उखाड़ फेंकने की जुगत व चेष्टा में हैं इसके लिए चाहे उन्हें निर्दोष फिलिस्तीनियों को जायोनी अपराधियों के हवाले क्यों न करना पड़े। ध्यान योग्य बिन्दु यह है कि पिछलग्गू अरब शासकों को विशिष्टता देने के बारे में जायोनी अधिकारी दो धड़ों में बंटे हुए हैं फिर भी जायोनी शासन के अधिकारियों ने अरब शासकों के प्रस्ताव को रद्द कर दिया है। इस प्रकार अतिग्रहणकारी जायोनी शासन के मुकाबले में फिलिस्तीनियों के अधिकारों की अनदेखी से नेतेनयाहू की मांगें और बढ़ गयी हैं तथा अरब सरकारों को आम जनमत में एक बार फिर अपमान के सिवा कुछ और हाथ नहीं लगेगा।

    पिछले ढाई वर्षों से अधिक समय से सीरिया संकट जारी है और अमेरिका तथा पश्चिम सहित क्षेत्र के उनके घटक व पिछलग्गू देश सीरिया में डेमोक्रेसी के बहाने विद्रोहियों व आतंकवादियों का भरपूर समर्थन कर रहे हैं इस मध्य क़तर नरेश के प्रस्ताव से यह बात पहले से अधिक स्पष्ट हो गयी है कि अतिग्रहणकारी इस्राईल को बचाने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए सीरिया संकट जारी है। क्योंकि इस्राईल के विस्तारवादी लक्ष्यों की दिशा में सीरिया ही सबसे बड़ी रुकावट है और इसी रुकावट को दूर करने के लिए इस्राईल भी सीरिया में लड़ने वाले विद्रोहियों व आतंकवादियों के समर्थन में किसी प्रकार के संकोच से काम नहीं ले रहा है। अभी हाल में ही इस्राईल द्वारा सीरिया पर आक्रमण को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।