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    बाल सिनेमा

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    ईरान में बाल सेनेमा का आरंभ ६० के दशक में हुआ किंतु ईरान में इस्लामी क्रांति के बाद, बाल सेनेमा के क्षेत्र में असाधारण रूप से परिवर्तन देखने में आया। बजट, सुविधाओं, सेनेमा हाल तथा बाल सेनेमा के विशेष फिल्मी मेले, फिल्म निर्माण में युवा निर्माताओं की सक्रियता के कारण इस प्रकार की फिल्मों की निर्माण प्रक्रिया में असाधारण रूप से विकास हुआ और विदेशों में ईरान में बाल फिल्म उद्योग चर्चा का विषय बन गया। वर्तमान युग में घर परिवार और शैक्षिक संस्थान, बच्चों के मानसिक विकास व प्रशिक्षण के दो मुख्य स्तंभ हैं और भविष्य के लिए बच्चों में शक्ति भरना विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षणों द्वारा संभव होता है। भाषा, नाटक, चित्र और चित्रकला का प्रयोग उन प्रचलित शैलियों में से है जो बच्चों का मनोरंन करने के अलावा उन्हें विभिन्न विषयों से परिचित भी कराती हैं। फिल्म उन प्रभावी साधनों में से है जो वास्तव में कहानी को चित्रों के माध्यम से बयान करती है और चूंकि फिल्म देखते समय मनुष्य की अधिक इंद्रियां इसमें व्यस्त होती हैं इस लिए उसका प्रभाव भी अधिक होता है। फिल्म, अपने विभिन्न रूपों में बच्चों के लिए उपयोगी हो सकती है और इसमें फिल्में, टीवी सीरियल तथा एनीमेशन फिल्म सब कुछ शामिल हैं। इस प्रकार की सभी फिल्में बच्चों पर बहुत अधिक प्रभाव डालती हैं इस लिए इस प्रकार की फिल्मों के निर्माण के समय किशोरों और बच्चों की आयु पर ध्यान देना बहुत ज़रूरी होता है। एक आदर्श फिल्म, बच्चों की जिज्ञासा को बढ़ाती है और उसके बहुत से प्रश्नों का उत्तर दे सकती है। सृष्टि की रचनाओं को अचरज से देखने वाला बच्चा, फिल्म द्वारा कैमरे की सहायता से सृष्टि की खोज में निकल पड़ता है और इस मार्ग में उसका मनोरंजन भी हो जाता है। काल्पनिक जगत में मनोरंजन, यद्यपि बच्चों के जीवन का एक मुख्य आयाम है किंतु यदि यह मनोरंजन प्रशिक्षण के साथ हो तो उसका महत्व बढ़ जाता है। इस भूमिका के बाद अब हम ईरान में बाल सेनेमा की विशेषताओं पर चर्चा करेंगे। ईरानी सेनेमा, बालावस्था के सभी संवेदनशील चरणों से भलीभांति परिचित है और अपनी रचनाओं में प्रशिक्षण व शिक्षक के आयामों पर बल देता है। ईरान में बाल सेनेमा सदैव ही विकसित व जीवंत प्रक्रिया के रूप में प्रशिक्षण की डगर पर आगे बढ़ा है और उसका सदैव से यह प्रयास रहा है कि उसे बच्चों के प्रशिक्षण में प्रभावी एक अध्याय के रूप में देखा जाए। यह हो सकता है कि कुछ अवसरों पर उसे अपने इस उद्देश्य में विफलता मिली हो किंतु इसका कारण, कुछ तत्वों की अनुपयोगिता और कुछ वास्तिवकताओं से अनभिज्ञता ही रही है। यहां पर हम यह भी कहना चाहेंगे कि यह पंरपरा ईरानी कलाकारों में बहुत पहले से प्रचलित रही है और प्राचीन काल के लोगों की रचनाओं और लेखों में भी बच्चों के प्रशिक्षण पर गंभीरता के साथ ध्यान दिया गया है। उदाहरण स्वरूप सातवीं सदी के प्रसिद्ध ईरानी कवि, सादी ने अपनी बहुमूल्य किताब, गुलिस्तान के सातवें अध्याय को, बच्चों के प्रशिक्षण से विशेष किया है और उस अध्याय में उन्होंने बच्चों के प्रशिक्षण के बारे में अत्यन्त बारीक विषयों की ओर ध्यान आकर्षित कराया है। बच्चों के प्रशिक्षण का महत्व इस बात का कारण बना है कि कविता और नाटकों जैसी अतीत की साहित्यिक रचनाओं में असंख्य शिक्षाप्रद कहावतें व कहानियां नज़र आएं तो पढ़ने, सुनने और देखने वालों के ज्ञान में वृद्धि का कारण बनती हैं। सेनेमा, नयी कला होने के बावजूद कलाकारों के मध्य प्रचलित इस प्रथा से प्रभावित हुआ और उसकें शिक्षा का पहलु अधिक उजागर हुआ। यहां तक कि एसी फिल्मों में भी जो विदित रूप से मनोरंजक थीं, शिक्षा व संदेश की झलक देखने को मिल जाती हैं। यदि में बाल फिल्मों में हम शिक्षा व प्रशिक्षण के लिए हानिकारक आयामों पर चर्चा करना चाहें तो हम यह कह सकते हैं कि संदेश पहुंचाने में सीमाओं का उल्लंघन तथा बच्चों की दुनिया से अज्ञानता कभी कभी इस प्रकार की फिल्मों के हानि पहुंचाती है और उन्हें उनके मूल उद्देश्य से काफी दूर कर देती है। उदारहण स्वरूप, दुज़्दे अरूसकहा अर्थात, गुड़ियों का चोर नामक फिल्म में वयस्कों की ओर से अत्याधिक उपदेश, वह भी पारंपरिक शैली में, फिल्म में काल्पनिक वातावरण को हानि पहुंचाती है हालांकि इस फिल्म का आरंभ आकर्षक है। इस संदर्भ में फिल्मकार और फिल्मी समीक्षक, ईरज करीमी कहते हैं कि फिल्म के ढांचे और विषय में संतुलन बहुत आवश्यक है। विश्व की श्रेष्ठ बाल फिल्मों के अध्ययन से पता चलता है कि कल्पना व घटनाक्रम को जीवंत रूप में एक दूसरे से जोड़ना चाहिए और संदेश, फिल्म के घटनाक्रम का स्वाभाविक परिणाम होना चाहिए। वे अपनी बात जारी रखते हुए एसी फिल्मों का उदाहरण पेश करते हैं कि जिनमें घटनाक्रम, अपने स्वाभाविक रूप में आगे बढ़ता है और पूरी फिल्म के वातावरण से दर्शक निष्कर्ष निकालता है। उनकी दृष्टि में मुसाफिर नामक फिल्म उन रचनाओं में से है जिसमें फिल्म का संदेश फिल्म की कहानी में निहित है और उसे खोजना नन्हें मुन्ने दर्शकों के ऊपर छोड़ दिया गया है। इस फिल्म में एक एसे किशोर की कहानी का वर्णन है जो एक फुटबाल मैच देखने के लिए ईरान के एक छोटे से नगर से, राजधानी तेहरान की यात्रा करता है। वह विभिन्न प्रकार की समस्याओं का सामना करते हुए अन्ततः स्टेडियम तक पहुंचने में सफल हो जाता है किंतु अत्याधिक थकन के कारण वहीं सो जाता है और जब जागता है तो फुटबाल मैच ख़त्म हो चुका होता है और दर्शक स्टेडियम से जा चुके होते हैं। मुसाफिर नामक इस फिल्म में किसी को उपदेश नहीं दिया गया है किंतु सही रूप से घटनाक्रम को दिखाने और चुस्त पटकथा के कारण दर्शक स्वंय ही उससे शिक्षा प्राप्त कर लेता है और इसी लिए इस फिल्म को अपनी श्रेणी में अत्याधिक सफल फिल्म कहा जाता है। ८० और नब्बे के दशक में ईरानी फिल्म निर्माताओं ने बच्चों के लिए आकर्षक कहानियों पर अधिक ध्यान दिया और एसी एसी फिल्में बनायी कि उन्हें विश्व स्तर पर सराहा गया। इन वर्षों में बनने वाली असंख्य ईरानी फिल्मों में बाल फिल्मों की संख्या सब से अधिक रही है और यही विषय, बच्चों के लिए फिल्म बनाने में ईरानी फिल्मकारों की सफलता का प्रतीक है। यह एसा विषय है जिसका ईरान में इस्लामी क्रांति की सफलता से पूर्व, असंख्य फिल्में बनने के बावजूद हीं पता नहीं था और उस काल की फिल्मों में बच्चों के लिए कोई आकर्षण नहीं था। ८० के दशक में फीचर फिल्मों के रूप में बच्चों के लिए फिल्मों का निर्माण अपने चरम पर पहुंचा और ईरानी सेनेमा की अत्याधिक सफल बल्कि बाक्स आफिस पर सब से अधिक हिट बहुत से सी फिल्में इसी काल में बनी और उनमें से अधिकांश बाल फिल्म थीं। इसी लिए फज्र विश्व फिल्म मेले के आरंभ के बाद बाल फिल्मों के लिए विशेष एक अन्य अंतरराष्ट्रीय फिल्म मेले का आरंभ किया गया। पहले बाल फिल्म मेले का आयोजन वर्ष १९८२ में किया गया और धीरे धीरे बच्चों से विशेष ईरानी फिल्मों के प्रदर्शन के कारण इस मेले को विश्व ख्याति प्राप्त हो गयी और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वस्नीय समझा जाने लगा। आज भी हर वर्ष ईरान के केन्द्र में स्थित इस्फहान नगर में यह फेस्टिवल आयोजित होता है जिसमें विश्व भर से बच्चों के लिए बनायी जाने वाली फिल्में दिखायी जाती हैं और इस क्षेत्र में काम करने वाले निर्माता व निर्देशक इस फिल्मी मेले में भाग लेते हैं। इस्फहान के बाल व किशोर फिल्म फेस्टिवल के साथ ही रूश्द प्रशिक्षण अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का भी उल्लेख आवश्यक है। यदयपि इस फेस्टिवेल को क्रांति से पूर्व आरंभ किया गया था किंतु उसका विकास क्रांति की सफलता के बाद हुआ। इस फेस्टिवेल के दौरान, बच्चों के लिए शिक्षाप्रद फिल्में, अभिभावकों को स्कूलों में दिखायी जाती हैं और जिस फिल्म को सब से अधिक पसन्द किया जाता है उसे इनाम दिया जाता है। बच्चों और किशोरों के लिए बनायी जाने वाली फिल्मों के बारे में यह कहना चाहिए कि ईरान में इस प्रकार की फिल्मों में प्रशिक्षण व शिक्षा को मूल स्तंभ समझा जाता है किंतु यह चीज़ उसी समय महत्वपूर्ण है जो कलात्मक रूप से और मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुसार उसे फिल्म में रखा जाए । रंगे खुदा, बच्चहाए आसेमान, नियाज़, क़िस्सहाए मजीद, और खुमरे जैसी प्रसिद्ध ईरानी बाल फिल्में इसी प्रकार की सफल व प्रभावशाली फिल्मों की श्रेणी में समझी जाती हैं।

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