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    “बिल्ली का न्याय”

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    कुछ पक्षी एक पर्वत के आंचल में रहते थे। एक कौए ने भी दूसरे पक्षियों के समीप एक पेड़ पर अपना घोंसला बना रखा था। एक तीतर का भी वहां घोंसला था। यह दोनों पड़ोसी पक्षी एक दूसरे के मित्र थे और अधिकांश समय एक दूसरे के साथ बिताते थे। एक दिन तीतर अकेले जंगल में गया परंतु वह लौटकर नहीं आया।

     

    जब तीतर कई दिनों तक अनुपस्थित व लापता रहा तो कौए ने सोचा कि संभव कि तीतर के लिए जंगल में कोई घटना पेश आ गयी है। एक सप्ताह या उससे अधिक समय के बाद एक खाकी रंग का दूसरा तीतर वहां आ गया जहां कौआ जिन्दगी करता था। जब उसने पहले वाले तीतर के घोसले को खाली पाया तो उसने उसे साफ किया और वहीं रहने लगा। कौए ने जब वहां पर दूसरे तीतर को देखा तो वह बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि वह पहले वाले तीतर के चले जाने के बाद से अकेला हो गया था और अकेले रहते रहते वह थक गया था। अगले दिन कौआ तीतर के घोंसले के पास गया ताकि उससे यह कहे कि उसका यहां आना बहुत अच्छा हुआ और उसके आने से वह बहुत प्रसन्न है। कौआ जब तीतर के घोसले के पास पहुंचा तो उसने कहा जब से तीतर यहां से जंगल में गया है मैं अकेला रह गया हूं और मुझे आशा है कि तुम इस घोसले में रहकर प्रसन्न होगे। छोटे और नये तीतर ने बड़े शिष्टाचारिक अंदाज़ में कौए का उत्तर दिया और एक दिन वह भी कौए के पास गया। कुछ समय बीता था कि कौए और छोटे तीतर में मित्रता हो गयी यहां तक कि एक दिन बड़ा व पहला तीतर जंगल से वापस आ गया और उसने खाकी रंग के छोटे तीतर को अपने घोसले में देखा। उसने इस पर आपत्ति जताई और पूछा तुमको किसने मेरे घोसले में रहने की अनुमति दी है? छोटे और खाकी रंग के तीतर ने कहा इसका तुमसे क्या संबंध है?

     

    मैं अपने घर में रह रहा हूं तुम्हें किसने अनुमति दी है कि तुम मुझसे इस तरह की बात करो और चिल्लाओ? बड़ा तीतर क्रोधित हो गया और कहा यह मेरा घोसला है तुम इसी समय यहां से बाहर निकल जाओ। इस पर छोटे तीतर ने कहा परंतु अब मेरा इस घोसले पर पर कब्ज़ा है और यह मेरा है और मैं इसका मालिक हूं। दोनों में बात बढ़ गयी। कौआ और दूसरे पक्षी भी उनके इर्द गिर्द एकत्रित हो गये परंतु उन लोगों को यह नहीं पता नहीं चल सका कि सच कौन बोल रहा है। कौए ने दोनों तीतरों के मध्य शांति कराने का प्रयास किया परंतु वह दोनों तीतरों को शांत व सहमत नहीं कर पाया। दूसरे पक्षियों ने भी समाधान का सुझाव पेश किया परंतु दोनों तीतरों ने उसे स्वीकार नहीं किया। अंत में यह सुझाव पेश किया गया कि दोनों पक्ष अपने विवाद को एक निष्पक्ष के पास जायें ताकि वास्तविकता स्पष्ट हो सके। दोनों तीतरों में से कोई भी कौए को न्यायधीश के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। अंत में एक पक्षी ने प्रस्ताव दिया कि दोनों तीतर बिल्ली के पास जायें क्योंकि बिल्ली को घोसले की कोई आवश्यकता नहीं है। उसने कहा कि बिल्ली एसा जानवर है जो मनुष्यों के साथ रहती है और वह जानती है कि किस तरह फैसला करना चाहिये। वह कष्ट पहुंचाने वाला जानवर नहीं है और वह न्यायपूर्ण ढंग से फैसला कर सकती है। दोनों तीतर इस प्रस्ताव पर सहमत हो गये और वे दोनों बिल्ली के पास गये। कौआ भी उनके साथ गया ताकि देखे कि होता क्या है। बिल्ली अपने घर में बैठी थी और वह इस सोच में थी कि किस प्रकार खाने का प्रबंध करे। उसने जैसे ही तीतरों के आने की आवाज़ सुनी वैसे ही सोने का नाटक करके लेट गयी और स्वयं से कहा क्या बात है!

     

    पक्षी की महक आ रही है। दोनों तीतरों ने जब यह देखा कि बिल्ली घर में है तो वे बहुत प्रसन्न हुए। वे बिल्ली के जागने की प्रतीक्षा करने लगे। बिल्ली ने कुछ ही क्षणों में अपनी आंखे खोल दी। उन दोनों ने बिल्ली को सलाम किया और उससे अपनी समस्या बयान की तथा उससे फैसला करने के लिए कहा। बिल्ली ने उन दोनों के बीच फैसला करने की बात स्वीकार कर ली। बिल्ली ने उन दोनों से सारी बात पूछी। जब दोनों तीतरों ने सारा मामला बताया तो बिल्ली ने चीखकर कहा मैं जैसा सोच रही थी वैसा ही है तुम लोगों का विवाद सांसारिक वस्तु को लेकर है और संसार की चीज़ों को लेकर सदैव विवाद होता है। उसके बाद उसने कहा मैं बूढ़ी हो गयी हूं और मुझे ऊंचा सुनाई देता है। बड़े खेद के साथ कहना पड़ता है कि तुम लोगों ने जो कुछ कहा है उसे मैं सही तरह से सुन व समझ नहीं पायी हूं। थोड़ा निकट आओ और एक बार फिर जो कुछ कहा है उसे ऊंची आवाज़  में कहो ताकि मैं अच्छी तरह से सुन लूं और तुम्हारे बीच न्याय करूं। तीतर बिल्ली की बात सुनकर और निकट आ गये। दोनों तीतरों ने अलग अलग सारी बात बताई और बिल्ली से न्याय का अनुरोध किया। बिल्ली ने कहा मुझे बताओ कि तुम दोनों में से घोसले का वास्तविक मालिक कौन है?

     

    परंतु थोड़ा ऊंची आवाज़ में कहना ताकि तुम्हारी बात अच्छी तरह सुन सकूं। तीतरों ने जब बिल्ली की यह बात सुनी तो वे बिल्ली के न्याय के प्रति और आशान्वित हो गये और वे बिल्ली के और निकट आ गये। वे बिल्ली की बात का जवाब दे ही रहे थे कि अचानक बिल्ली झपटी और उसने दोनों को अपने पंजे में दबाकर उन दोनों को एक एक करके खा गयी। इसके बाद उसने अपनी ज़बान से अपना मुंह साफ किया और आराम से स्वयं से कहा जब दो कमज़ोर प्राणी अपने अधिकारों की सुरक्षा न करें  और अपनी शिकायत एक अजनबी शक्तिशाली के पास ले जायें तो वे विदित धोखे में आ गये और उन्हें न्यायपूर्ण फैसले की अपेक्षा है! क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है? इस स्थिति में न्याय यह है कि सबसे पहले मैं अपना पेट भरूं।
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