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    बिस्मिल्लाह के प्रभाव 2

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    पुस्तक का नामः कुमैल की प्रार्थना का वर्णन

    लेखकः आयतुल्लाह अनसारियान

    اَللَّهُمَّ إِنِّى أَسْأَلُكَ بِرَحْمَتِكَ الَّتِى وَسِعَتْ كُلَّ شَىْء

    अल्लाहुम्मा इन्नी असअलोका बेराहमतेकल लति वसेअत कुल्लो शैएन

    हे ईश्वर, मै तुझ से अनुरोध करता हूँ, कि तेरी कृपा ने सभी चीजो को घेर रखा है

    मलाकूती कलाम, उत्कृष्ट ख़ज़ाने तथा नभमंडली वाक्य का प्रत्येक शब्द रहस्य, संकेत और राज़ रखता है, जहाँ तक उसकी आवश्यकता है हम उसका वर्णन करेंगे।

    (अल्लाहुम्मा) का मूल एंव अस्ल या अल्लाह (हे ईश्वर) है ईश्वर के उच्च स्थान एवं श्रेष्ठ गरिमा और उसकी महानता को दर्शाने के हेतु (या) को हटा कर उसके स्थान पर (मीम) को डबल कर दिया गया, जिस प्रकार ईश्वर का पवित्र अस्तित्व सभी प्राणीयो अस्तित्व पर पूर्वगामिता रखता है, इस बात का हक़दार है कि इस तत्थ की (अल्लाह) शब्द मे पुष्ठि की हो तथा इस को दूसरे शब्दो और अक्षरो पर प्रायर (मुक़द्दम) करे, ताकि वास्तविक अस्तित्व और काइंडनेसी (लुत्फ़ी) अस्तित्व के बीच समझौता हो तथा वास्तविक और लुत्फ़ी गरिमा के बीच का अंतर शेष ना रहे।

    प्रार्थी अल्लाह को ध्यान मे रखता है तथा उसके अस्तित्व को आवाज़ देता है और (अल्लाहुम्मा) कहता है, यह बात ध्यान रहेः यदि ईश्वर के यहा गुरूत्वाकर्षण इजाज़त और अनुमति नही होती तो दास (बंदा) ईश्वर से एक शब्द कहने की भी शक्ति नही रखता तथा दुआ के क्षेत्र मे उसका क़दम बढ़ाना वियर्थ होता, और ऐसी स्थिति मे हाल का आना असंभव होता।