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    बिस्मिल्लाह के प्रभाव 3

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    पुस्तक का नामः कुमैल की प्रार्थना का वर्णन

    लेखकः आयतुल्लाह अनसारियान

     

    आप ने इस के पूर्व लेख मे इस बात का पठन किया कि यदि ईश्वर के यहा गुरूत्वाकर्षण इजाज़त और अनुमति नही होती तो दास (बंदा) ईश्वर से एक शब्द कहने की भी शक्ति नही रखता तथा दुआ के क्षेत्र मे उसका क़दम बढ़ाना वियर्थ होता, और ऐसी स्थिति मे हाल का आना असंभव होता। आज हम इस लेख मे यह बात प्रस्तुत कर रहे है कि ईश्वर को आवाज़ देने वाली की ज़बान उसकी दया के साथ खुलती है।

    ईश्वर को आवाज़ देने वाली की ज़बान (अल्लाहुम्मा) कहने की शक्ति के साथ ही दुआ का पठन करने वाले की  ज़बान उसके लुत्फ़ और दया के साथ खुलता है।

    प्रार्थना करने वालो को इस तत्थ को जानना चाहिएः कि जब तक महबूब ना चाहे उस समय तक प्रार्थना करने वाले की अर्जी सम्भव नही है, तथा जब तक ईश्वर ना चाहे तो उसका सेवक (बंदा) प्रार्थना करके अपनी आवश्यकता को पूरा कराने की विनती के लिए उसके पास नही जाता है।

    हां, दुआ उसकी शिक्षा है। दुआ करने वाले का जीवन उसी के आदेश से है। प्रार्थना करने वाली की जबान और हालत उसी के इरादे से है, बस सभी कार्य उसी की समंपत्ति सत्ता तथा प्रभुत्व मे है।