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    बिस्मिल्लाह से आऱम्भ करने का कारण – 2

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    पुस्तक का नामः दुआए कुमैल का वर्णन

    लेखकः आयतुल्लाह अनसारीयान

     

    इस से पूर्व लेख मे यह बात स्पष्ट की थी कि बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम कहने से कार्य पूरे होते है अधूरे नही रहते तथा उसका दूसरा लाभ यह भी है कि यदि कोई व्यक्ति क्रोधित है तो बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम कहने से क्रोध समाप्त हो जाता है और ईश्वर उसकी परेशानी को दूर तथा उसके क्रोध को समाप्त कर देता है। इस लेख मे आप दो लाभो का और अध्ययन करेगे।

    3. एक महत्वपूर्ण हदीस मे आया हैः

     

    لَا یُردُّ دُعَاءُ أَوَّلُہُ (بِسمِ أللہ ألرَّحمٰنِ ألرَّحِیم)

    ला योरद्दो दोआओहू अव्वलोहू (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम)[1]

    जिस प्रार्थना का आरम्भ (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम) से हो ईश्वर उस प्रार्थना को अस्वीकृत नही करता।

    4. पैग़म्बर (सललललाहो अलैहे वआलेहि वसल्लम) ने नरक की अग्नि से 19 प्रकार के यातना (अजाब) बताते हुए कहाः

    जो व्यक्ति चाहता है कि ईश्वर उसे नरक के इन 19 प्रकार के यातनाओ से स्वतंत्र करे तो उसे चाहिए कि वह (बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम) का जपन करे जिसमे 19 अक्षर है, ताकि ईश्वर प्रत्येक अक्षर को 19 यातना हेतु ढाल बनाए।[2]

     


    [1] अद्दावात, पेज 52, हदीस 131; मुस्तदरकुल वसाएल, भाग 5, पेज 304, अध्याय 16, हदीस 5929

    [2]  مَن أَرَادَ أَن یُنَجِّیَہُ أللہُ مِنَ الزَّبَانِیَۃِ ألتِّسعَۃَ عَشَرَ فَلیَقرَأُ بِسمِ أللہ ألرَّحمٰنِ ألرَّحِیم فَاِنَّھَا تِسعَۃَ عَشَرَ حَرفاً لِیَجعَلَ أللہُ کُلَّ حَرف مِنھَا جُنَّۃً مِن وَاحِد مِنھُم

    (मन अरादा अय्योनज्जेयहुल्लाहो मिनज़्ज़बानियतित्तिसअता अशरा फ़ल्यक़रओ बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम फ़इन्नहा तिस्अता अशरा हरफ़न लेयजअलल्लाहो कुल्ला हरफ़िन मिनहा जुन्नतन मिन वाहेदिन मिनहुम) जामेउल अख़बार, पेज 42, अध्याय 22; मुस्तदरकुल वसाएल, भाग 4, पेज 387, अध्याय 45, हदीस 4989; बिहारुल अनवार, भाग 89, पेज 257, अध्याय 29, हदीस 53